





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः शहीद क़त्ल की व्यथा केवल उतनी ही महसूस करता है, जितनी तुममें से कोई चींटी के डंक मारने से महसूस करता है।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।हदीस : जब कोई इनसान अल्लाह के मार्ग में शहीद होता है, तो उसे वध किए जाने की व्यथा केवल उतनी ही होती है, जितनी हममें से किसी को चींटी के काटने से होती है। दारिमी की रिवायत में "من ألم القتل" और "من ألم القرصة" के शब्द आए हैं। यानी शहीद को अन्य लोगों की भाँति मृत्यु की कठिनाइयों और परेशानियों का सामना करना नहीं पड़ता। उसे मृत्य के समय अधिक से अधिक वही कष्ट होता है, जो हमें चींटी के काटने से होता है, जो कुछ ही क्षणों में दूर हो जाता है और फिर लगता ही नहीं कि कहीं कुछ हुआ था। यह दरअसल शहीद पर अल्लाह की अनुकंपा है। जब उसने उच्च एवं महान अल्लाह के मार्ग में अपने प्राण को प्रस्तुत कर दिया, तो अल्लाह ने उसके लिए मृत्यु के कष्ट को आसान कर दिया।
अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि वह अपने एक क़र्ज़दार की तलाश में थे। और वह छुपते फिर रहा था। एक बार मिल गया, तो बोला कि मैं अभाव का शिकार हूँ। उन्होंने अल्लाह की क़सम खाने को कहा, तो उसने अल्लाह की क़सम खा ली। तब अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : "जिसे यह पसंद हो कि अल्लाह उसे क़यामत के दिन की परेशानियों से मुक्त कर दे, उसे चाहिए कि किसी अभावग्रस्त व्यक्ति को मोहलत दे या उसका क़र्ज़ माफ़ कर दे।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअबू क़तादा अंसारी रज़ियल्लाहु अनहु एक व्यक्ति की तलाश में थे, जिसने उनसे क़र्ज़ लिया था और उनसे छुपता फिरता था। अंततः उन्होंने उसे ढूँढ ही लिया। लेकिन उसने कहा : मैं इस समय कठिन परिस्थितियों से गुज़र रहा हूँ और आपका क़र्ज़ चुकाने के लिए मेरे पास कोई साधन नहीं है। चुनांचे अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने उसे अल्लाह की क़सम खाने को कहा कि क्या सच-मुच उसके पास क़र्ज़ चुकाने का कोई साधन नहीं है? उसने अल्लाह की क़सम खाकर बताया कि वह सच बोल रहा है। इसपर अबू क़तादा रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया कि उन्होंने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुना है : जिसे यह बात प्रसन्न करती हो कि अल्लाह उसे क़यामत के दिन की परेशानियों, कठिनाइयों और भयावहताओं से मुक्ति प्रदान करे, उसे चाहिए कि कठिनाई में पड़े हुए व्यक्ति के साथ उदारता बरते। यानी क़र्ज़ अदा करने के लिए कुछ समय दे, अदायगी का मुतालबा कुछ समय के लिए रोक दे अथवा क़र्ज़ का कुछ भाग या पूरा क़र्ज़ ही माफ़ कर दे।
अबू मूसा अशअरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जिसने दो ठंडे समय की नमाज़ें पढ़ीं, वह जन्नत में जाएगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने दो ठंडे समयों में पढ़ी जाने वाली नमाज़ों यानी फ़ज्र और अस्र का ख़ास ध्यान रखने की प्रेरणा दी है, और उनको सुचारू रूप से यानी समय पर और जमात के साथ पढ़ने वाले को सुसमाचार दिया है कि यह दोनों नमाज़ें उसके लिए जन्नत में प्रवेश का सबब बनेंगी।
अबू क़तादा हारिस बिन रिबई- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उनके बीच खड़े हुए और बताया कि अल्लाह के मार्ग में जिहाद करना और अल्लाह पर ईमान लाना सबसे उत्तम कार्य हैं। यह सुन एक व्यक्ति खड़ा हुआ और कहने लगा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आपका क्या ख़्याल है कि यदि मैं अल्लाह के मार्ग में जिहाद करते हुए मारा जाऊँ तो क्या मेरे गुनाह माफ़ हो जाएँगे? अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जवाब दियाः हाँ, यदि तुम अल्लाह के मार्ग में जिहाद करते हुए मारे जाओ और सब्र से काम लो, नेकी की आस रखो, आगे बढ़ते रहो और पीठ दिखाकर न भागो तो तुम्हारे गुनाह माफ़ हो जाएँगे। हाँ, क़र्ज़ माफ़ नहीं होगा। जिबरील- अलैहिस्सलाम- ने मुझसे ऐसा कहा है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपने साथियों के बीच उन्हें संबोधित करने के लिए खड़े हुए और बताया कि अल्लाह के पताका को ऊँचा करने के लिए जिहाद करना और अल्लाह पर ईमान रखना सबसे उत्तम कार्य हैं। यह सुन एक व्यक्ति खड़ा हुआ और अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा : मुझे ज़रा यह बताएँ कि यदि अल्लाह के पताका को ऊँचा करने के लिए युद्ध करते हुए मेरा वध होजाए, तो क्या मेरे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे? अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उत्तर दिया : हाँ, लेकिन शर्त यह है कि तुम धैर्यवान रहो, कष्ट के समय सहन करो, अल्लाह के प्रति निष्ठावान रहो और युद्ध के मैदान से भागने की बजाय डटकर मुक़ाबला करो। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक और चीज़ यानी क़र्ज़ का ज़िक्र किया, यह दर्शाने के लिए कि अल्लाह के मार्ग में युद्ध करने और प्राण की आहुति देने से भी अन्य इनसानों के अधिकार माफ़ नहीं होते।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रात के प्रथम भाग में सोते और अंतिम भाग में उठकर नमाज़ पढ़ते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने बताया है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- इशा की नमाज़ के बाद रात के प्रथम भाग में सोते थे और अंतिम भाग यानी रात के दूसरे तिहाई भाग में उठकर नमाज़ पढ़ते थे। फिर जब नमाज़ पढ़ लेते, तो दोबारा सोने के लिए बिस्तर में चले जाते थे। दोबारा सोने के लिए बिस्तर में जाने का यह कार्य रात के अंतिम छठे भाग में करते थे। ताकि रात की नमाज़ की थकान से शरीर को आराम मिल जाए। इसके अंदर कई और हिकमतें भी हैं। मसलन यह कि इससे पूरी चुस्ती और तवज्जो के साथ फ़ज्र की नमाज़ और दिन के अज़कार का स्वागत किया जा सकता है और यह दिखावे से बचने का भी एक साधन है। क्योंकि जो व्यक्ति रात के अंतिम छठे भाग में सो जाएगा, सुबह उसका चेहरा खिला हुआ और उसका शरीर चुस्त-दुरुस्त रहेगा। अतः इससे उसकी रात की इबादत से पर्दा भी नहीं उठेगा। इसी के मद्देनज़र एक हदीस में कहा गया है कि पहली अज़ान इसलिए दी जाती है, ताकि सोए हुए लोग जाग जाएँ और नमाज़ में व्यस्त लोग सो जाएँ। ताकि नमाज़ में व्यस्त व्यक्ति के शरीर को चुस्ती और शक्ति प्राप्त हो जाए और सोया हुआ व्यक्ति जागकर नमाज़ के लिए तैयारी करने लगे और यदि रात के प्रथम भाग में वित्र नहीं पढ़ी है, तो उसे पढ़ ले।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- का वर्णन है कि उन्होंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मेरे दो पड़ोसी हैं। मैं दोनों में से किसे कोई वस्तु भेंट- के रूप में दूँ? आपने कहाः जिसका द्वार तेरे द्वार से अधिक निकट हो।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा कि मेरे दो पड़ोसी हैं और मुझे पड़ोसी के सम्मान का आम आदेश दिया गया है। लेकिन मैं दोनों को एक साथ उपहार नहीं दे सकती। अतः मैं किसे उपहार दूँ कि पड़ोसी का सम्मान करने वाले लोगों में शामिल हो जाऊँ? अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसका द्वार तुम्हारे द्वार से अधिक निकट हो।"
आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : “दूध पीने से वह रिश्ते हराम हो जाते हैं, जो जन्म के कारण से हराम होते हैं।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि रज़ाअत (बचपन में अपनी माँ के अतिरिक्त किसी और स्त्री का दूध पीने) से वह सारे रिश्ते हराम हो जाते हैं, जो जन्म एवं नसब के आधार पर हराम होते हैं। जैसे चचा, मामा और भाई आदि। इसी तरह रज़ाअत से वह सारी चीज़ें हलाल हो जाया करती हैं, जो जन्म के आधार पर हलाल हुआ करती हैं।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैह व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुनाः तुममें से कोई व्यक्ति जुमा के दिन हरगिज़ रोज़ा न रखे, मगर यह कि उससे पहले या उसके बाद भी एक दिन रोज़ा रख ले।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जुमा के दिन रोज़ा रखने से मना किया है। लेकिन, यदि उससे पहले या उसके बाद एक दिन रोज़ा रख ले अथवा किसी का नियमित नफ़ली रोज़ा उसी दिन पड़ जाए, तो रख सकता है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का विजय के दिन फ़रमायाः मक्का विजय के बाद हिजरत नहीं रही, लेकिन जिहाद और नीयत बाक़ी हैं। तथा जब जिहाद के लिए निकलने को कहा जाए तो अविलंब निकल पड़ो। तथा मक्का विजय के दिन ही फ़रमायाः इस नगरी को अल्लाह ने आकाश एवं धरती की सृष्टि के दिन हरम बनाया है। अतः, यह क़यामत के दिन तक हरम ही रहेगा। मुझसे पहले किसी को इसमें युद्ध की अनुमति नहीं दी गई थी और मुझे भी कुछ समय के लिए ही दी गई थी। यह अल्लाह के निर्णय के अनुसार क़यामत के दिन तक हरम ही रहेगा। यहाँ के काँटों को काटा नहीं जाएगा, शिकार का पीछा नहीं किया जाएगा, गिरी हुई चीज़ को उठाया नहीं जाएगा, यह और बात है कि कोई उसका एलान करना चाहे और हरी घास को भी काटा नहीं जाएगा। यह सुनकर अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हु- ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! इज़खिर (एक प्रकार की सुगंधित घास) को छोड़ कर, क्योंकि यह लोहारों तथा घरों के काम आती है? आपने फ़रमायाः हाँ, इज़खिर को छोड़कर।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- कहते हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मक्का विजय के दिन संबोधन के लिए खड़े हुए, तो फ़रमाया : अब मक्का से हिजरत नहीं रही। क्योंकि यह अब इसलामी नगर बन चुका है। हाँ, अल्लाह की राह में जिहाद बाक़ी है। अतः, जिसे जिहाद के लिए निकलने को कहा जाए, वह अल्लाह तथा उसके रसूल और अमीर की बात मानते हुए जिहाद के लिए ज़रूर निकले। फिर आपने मक्के के सम्मान एवं आदर का उल्लेख किया और बताया कि इसका यह आदर एवं सम्मान उसी दिन से है, जिस दिन अल्लाह ने आकाशों एवं धरती की रचना की थी। यह भी बताया कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पहले किसी के लिए यहाँ युद्ध करना हलाल नहीं किया गया था और आपके बाद भी किसी के लिए हलाल नहीं किया जाएगा। बल्कि, आपके लिए भी कुछ देर के लिए ही हलाल हुआ था और फिर उसकी हुरमत लौट आई है। फिर आपने मक्का के सम्मान का उल्लेख करते हुए बताया कि हरम के काँटे काटे नहीं जाएँगे, उसकेे जानवरों का शिकार नहीं किया जाएगा, वहाँ गिरी हुई चीज़ उस व्यक्ति के सिवा कोई उठा नहीं सकता, जो उसका ऐलान करना चाहता हो और उसकी घास उखाड़ी नहीं जा सकती। अलबत्ता, मक्का वालों के हित के मद्देनज़र इज़खिर को इस आदेश से अलग रखा गया है, क्योंकि लोहार लोग भट्टी जलाने के लिए उसका इस्तेमाल करते हैं।