





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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जाबिर- रज़यल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा गया कि कौन सी नमाज़ सबसे उत्तम है? तो फ़रमायाः "देर तक खड़ा रहना"।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथियों ने आपसे पूछा कि कौन-सी नमाज़ सबसे उत्तम है? उनकी ओर से अक्सर इस प्रकार के प्रश्न इसलिए हुआ करते थे, क्योंकि वे अधिक से अधिक मात्रा में नेकी प्राप्त करना चाहते थे। फिर, उनके इस प्रश्न का मतलब है, किस प्रकार की नमाज़ सबसे उत्तम है? या फिर यह कि नमाज़ का कौन-सा कार्य सबसे उत्तम है? क़याम, रुकू या सजदा? आपने उत्तर दिया कि उसमें लंबे समय तक खड़ा रहना।
शुरैह बिन हानी से रिवायत है, वह कहते हैं : मैंने आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से पूछा कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब घर आते, तो सबसे पहले कौन-सा काम करते थे? उन्होंने उत्तर दिया : आप सबसे पहले मिसवाक किया करते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का मामूल था कि घर में प्रवेश करने के बाद सबसे पहले मिस्वाक करते। समय चाहे जो भी हो। रात हो कि दिन।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के यहाँ एक व्यक्ति के बारे में बताया गया कि वह रात को सुबह होने तक सोया रहा। यह सुनकर आपने कहा : "वह एक ऐसा व्यक्ति है कि शैतान ने पेशाब कर दिया जिसके दोनों कानों में, या फ़रमाया: जिसके कान में।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के यहाँ एक व्यक्ति का ज़िक्र हुआ कि वह सूरज निकलने तक सोया रहा और फ़र्ज़ नमाज़ के लिए उठा ही नहीं। अतः आपने फ़रमाया : दरअसल वह ऐसा व्यक्ति है कि शैतान ने जिसके कान में पेशाब कर दिया है।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "दस कार्य प्राकृतिक हैं; मूँछ काटना, दाढ़ी बढ़ाना, मिसवाक करना, नाक में पानी चढ़ाना, नाखून काटना, जोड़ों को धोना, बगल के बाल उखेड़ना, पेड़ू के बाल साफ़ करना और पानी से इस्तिंजा अर्थात पेशाब एवं शोच करने के बाद सफाई, करना।" वर्णनकर्ता कहते हैं कि मैं दसवाँ कार्य भूल गया, परन्तु यह कि वह कु्ल्ली करना हो सकता है। इस हदीस के एक वर्णनकर्ता वकी ने 'انْتِقَاص الماء' का अर्थ इस्तिंजा बताया है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हवाले से मानव प्रकृति से जुड़ी हुई कुछ बातें बयान की हैं। दरअसल "प्रकृति" से मुराद इनसान की वह संरचना है, जो अल्लाह की बनाई हुई है और जो शुभ एवं मंगल हुआ करती है। याद रहे कि यहाँ मुराद बिगड़ी हुई प्रकृति नहीं, बल्कि स्वच्छ प्रकृति है। क्योंकि बिगड़ी हुई प्रकृति का कोई एतबार नहीं है। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का फ़रमान है : "हर जन्म लेने वाला बच्चा मूल प्रकृति पर जन्म लेता है। फिर उसके माता-पिता उसे यहूदी, ईसाई या मजूसी बना देते हैं।" इनमें से पहली चीज़ है "मूँछ काटना" कि होंठ दिखता हो। इसमें स्वच्छता भी है और नाक से निकलने वाली चीज़ों से बचाव भी। क्योंकि मूँछ के बाल जब होंठ पर लटकने लगते हैं, तो उससे खाने-पीने की चीज़ें लग जाती हैं। इसी तरह मूँछ बढ़ाना दरअसल अल्लाह की संरचना को बिगाड़ना भी है। यह सही है कि कुछ लोग इसे अच्छा भी समझते हैं, लेकिन इस प्रकार के लोग किसी गिनती में नहीं आते। अतः मुसलमान को अपनी मूँछ को काटते अथवा मूँड़ते रहना चाहिए और चालीस दिन से अधिक समय तक रहने नहीं देना चाहिए। क्योंकि अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "हमारे लिए मूँछ तथा नाखून काटने, बगल के बाल उखाड़ने और पेड़ू के बाल साफ़ करने का समय निर्धारित कर दिया गया है कि हम चालीस दिन से अधिक न छोड़ें।" "दाढ़ी बढ़ाना" दाढ़ी उन बालों को कहते हैं, जो ठुड्डी एवं दोनों दाढ़ों पर उगते हैं। यहाँ बढ़ाने से आशय यह है कि उन्हें पूरा का पूरा छोड़ दिया जाए। न मूँड़ा जाए और न काटा जाए। न कम न ज़्यादा। क्योंकि इस आशय को बताने के लिए प्रयुक्त अरबी शब्द "الإعفاء" अधिक करने तथा पूरा देने के मायने में आता है। अतः आपके शब्दों का अर्थ है, दाढ़ी को अधिक करो और पूरा रहने दो। जैसा कि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "حتى عَفَوا" यानी जब वे सुखी हो गए। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की बुहत-सी हदीसों में विभिन्न शब्दों द्वारा दाढ़ी बढ़ाने का आदेश आया है। कहीं "وفروا" का शब्द आया है, तो कहीं "أرخوا" का और कहीं "أعفوا" का। ये सारे शब्द दाढ़ी को बाक़ी रखने, बढ़ने देने और उससे छेड़छाड़ न करने को प्रमाणित करते हैं। अतः किसी मुसलमान के लिए दाढ़ी मूँड़ना किसी भी अवस्था में वैध नहीं है। अगर किसी ने यह कृत्य किया, तो उसने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के तरीक़े की मुख़ालफ़त की, आपके आदेश की अवहेलना की और मुश्रिकों जैसा काम किया। "मिसवाक करना" यानी मिसवाक करना उन मानव प्रकृति का पता देने वाले कार्यों में से एक है, जिनकी प्रेरणा शरीयत ने दी है। क्योंकि मिसवाक मुँह स्वच्छ रखने वाली और अल्लाह को प्रसन्न रखने वाली चीज़ है। यही कारण है कि मिसवाक किसी भी समय की जा सकती है। लेकिन विशेष रूप से वज़ू के समय, नमाज़ से पहले, नींद से जागने के बाद, मुँह का स्वाद ख़राब होने पर और दाँतों के पीले हो जाने आदि पर उसपर अधिक ज़ोर दिया गया है। "नाक में पानी चढ़ाना" यानी नाक में पानी चढ़ाना भी मानव प्रकृति से निकले हुए कार्यों में से एक है। क्योंकि यह स्वच्छता प्राप्त करने और नाक के अंदर की उन गंदगियों को हटाने का साधन है, जो हानिकारक सिद्ध हो सकती हैं। नाक में पानी चढ़ाने का काम वज़ू के अंदर भी हो सकता है और उसके बाहर भी। जब भी नाक साफ़ करने की आवश्यकता महसूस हो, उसमें पानी चढ़ाइए और उसकी सफ़ाई कीजिए। इसकी ज़रूरत अलग-अलग लोगों को अलग-अलग हुआ करती है। कुछ लोगों को इसकी ज़रूरत केवल वज़ू के समय पड़ती है और कुछ लोगों को उसके अतिरिक्त भी बहुत बार पड़ती है। मानव प्रकृति से निकले हुए कार्यों में से एक कार्य कुल्ली करना भी है। क्योंकि मुँह एवं नाक में बहुत-से मैलकुचैल एकत्र होते रहते हैं। अतः उनकी सफ़ाई पर ध्यान देना भी मानव प्रकृति को मूर्त रूप देने वाले कार्यों में से एक है। "नाख़ून काटना" यानी नाखून काटना भी मानव प्रकृति को सामने लाने वाले कार्यों में से है। यहाँ मुराद हाथ एवं पाँव की उंगलियों के नाखून हैं। अतः उन्हें चालीस दिन से अधिक नहीं रहने देना चाहिए। चालीस दिन का प्रमाण वह हदीस है, जो इससे पहले गुज़र चुकी है। "जोड़ों को धोना" यानी उंगलियों के जोड़ों के अंदरूनी एवं बाहरी भागों को धोना। क्योंकि इन स्थानों के सिकुड़न एवं संकुचन के कारण उनके अंदर मैल जमा हो जाता है, जिसकी वजह से त्वचा तक पानी पहुँच नहीं पाता। लेकिन जब उनका ख़याल रखते हुए उन्हें रगड़ दिया जाए और उनपर दूसरी बार हाथ फेर दिया जाए, तो पानी पहुँच जाता है। अतः मानव प्रकृति का तक़ाज़ा है कि इनसान इन्हें धोने पर विशेष ध्यान दे। उंगलियों के जोड़ों के ही हुक्म में शरीर का हर वह अंग होगा, जिसमें मैल जमा हो जाता हो, जैसे कानों के छिद्र और रानों के भीतरी भाग, जो आम तौर पर छिपे रहते हैं। "बगल के बाल उखाड़ना" इन बालों को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात इसलिए कही गई है कि ये बाल ऐसे स्थान में होते हैं, जहाँ अत्यधिक मात्रा में पसीना आता है, मैल जमा हो जाता है तथा बदबू पैदा हो जाती है। इन बालों को चालीसे दिन से अधिक रहने नहीं देना चाहिए। इसका प्रमाण अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- की वह हदीस है, जो पीछे गुज़र चुकी है। अगर हो सके तो इन बालों को उखाड़ देना ही उत्तम है। लेकिन यदि उखाड़ना कठिन हो, तो मूंडने अथवा अनावश्यक बाल हटाने वाले क्रीम आदि का प्रयोग करने में कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि असल उद्देश्य उन्हें हटाना और उस स्थान को साफ़ करना है और इससे भी उद्देश्य पूरा हो जाता है। "पेड़ू के बाल साफ़ करना" यानी पेड़ू के बाल साफ़ करना भी मानव प्रकृति को उजागर करने वाले कार्यों में से एक है। ज्ञात हो कि पेड़ू के बाल से मुराद वह खुरदरे बाल हैं, जो पुरुष तथा स्त्री की अगली शर्मगाह के आसपास उगते हैं। इन बालों को साफ़ करते रहना चाहिए। इसके लिए इन्हें मूड़ा भी जा सकता है, उखाड़ा भी जा सकता है, काटा भी जा सकता है और आधुनिक आविष्कारों का प्रयोग भी किया जा सकता है। क्योंकि उद्देश्य सफ़ाई करना है और इन सारे तरीक़ों से उद्देश्य पूरा हो जाता है। इन बालों को भी अनस -रज़ियल्लाहु अनहु- की उक्त हदीस में आए निर्देश के कारण चालीस दिनों से अधिक छोड़ा नहीं जा सकता। फ़ितरत के कार्यों में से एक कार्य है "انْتِقَاصُ الماء"। इसका अर्थ इस्तिंजा बताया गया है, जिसकी पुष्टि अबू दाऊद एवं इब्न-ए-माजा में अम्मार बिन यासिर -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित उस हदीस से होती है, जिसमें है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "फ़ितरत के कार्य हैं, कुल्ली करना, नाक में पानी चढ़ाना... और इस्तिंजा करना।" याद रहे कि इस्तिंजा नाम है पेशाब अथवा पाखाना के रास्तों में से किसी रास्ते से निकलने वाली किसी चीज़ को पानी, पत्थर, कपड़ा एवं रूमाल आदि ऐसी चीज़ों से साफ़ करने का, जिनके अंदर साफ़ करने का गुण पाया जाता हो। वर्णनकर्ता कहते हैं कि मैं दसवीं वस्तु भूल गया। हो सकता है कि वह कुल्ली करना हो। यह दरअसल एक वर्णनकर्ता का संदेह है, जो यहाँ बयान किया गया है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "शैतान तुममें से हर व्यक्ति के सर के पीछ रात में सोते समय तीन गाँठ लगा देता है और हर गाँठ पर यह कहकर फूँक मारता है कि सो जा, अभी रात बहुत बाक़ी है। फिर अगर आदमी जागकर अल्लाह को याद करने लगे, तो एक गाँठ खुल जाती है। फिर अगर वज़ू कर ले तो एक और गाँठ खुल जाती है। फिर अगर नमाज़ पढ़ ले तो एक और गाँठ भी खुल जाती है। इस तरह सुबह के समय आदमी चुस्त और प्रफुल्लित रहता है। वरना, उदास और सुस्त रहता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब इन्सान तहज्जुद या फ़ज्र की नमाज़ के लिए उठना चाहता है, तो किस तरह शैतान उसे रोकने का प्रयास करता है। एक मोमिन जब सोता है, तो शैतान उसके सर के पिछले भाग में तीन गाँठ लगा देता है। ऐसे में जब वह जाग कर अल्लाह को याद करता है और शैतान द्वारा डाले गए ख़्यालों को रास्ता रोकने नहीं देता, तो एक गाँठ खुल जाती है। उसके बाद अगर वज़ू करता है, तो दूसरी गाँठ खुल जाती है। फिर अगर उठकर नमाज़ पढ़ता है, तो तीसरी गाँठ भी खुल जाती है। फलस्वरूप इन्सान भरपूर ऊर्जा के साथ और प्रसन्नचित होकर सुबह करता है कि उसे अल्लाह की ओर से इबादत का सुयोग प्राप्त हुआ, वह प्रतिफल एवं क्षमा के अल्लाह के किए हुए वादा और इस बात से ख़ुश रहता है कि शैतान द्वारा उसे इबादत से रोकने के प्रयास नाकाम हो गए। इसके विपरीत अगर वह इबादत के लिए खड़ा नहीं हुआ, तो उसकी सुबह उदासी एवं सुस्ती के साथ होती है। अच्छे कामों में उसका मन नहीं लगता। क्योंकि दरअसल वह शैतानी की ज़ंजीर में जकड़ा हुआ है और कृपावान् अल्लाह की दया से दूर हो जाता है।
मादान बिन अबू तल्हा यामुरी से वर्णित है, वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आज़ाद किए हुए दास स़ौबान से मुलाक़ात की और कहा : मुझे किसी ऐसे कार्य के बारे में बताइए, जिसे करूँ, तो अल्लाह मुझे जन्नत में प्रवेश करा दे। उनका कहना है कि या मैंने यह कहा था : मुझे कोई ऐसा काम बताइए, जो अल्लाह के निकट सबसे महबूब हो। मेरी बात सुनकर वह चुप रहे। मैंने फिर प्रश्न किया, तो वह चुप रहे। मैंने तीसरी बार प्रश्न दोहराया, तो उन्होंने कहा : मैंने इसके बारे में अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा, तो आपने कहा : ''अधिक से अधिक अल्लाह के लिए सजदा करो, इसलिए कि तुम्हारे हर एक सजदे के बदले अल्लाह तुम्हारा एक दर्जा ऊँचा करता है और तुम्हारे एक गुनाह को मिटा देता है।'' मअदान कहते हैं : फिर मैं अबू दरदा से मिला और उनसे पूछा, तो उन्होंने भी उसी तरह कहा, जिस तरह सौबान ने कहा था।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कोई ऐसा अमल पूछा गया, जो जन्नत में प्रवेश का सबब बन जाए या फिर जो अल्लाह को सबसे प्रिय हो। तो जवाब में आपने पूछने वाले से कहा : तुम बहुत ज़्यादा नमाज़ में सजदे किया करो। क्योंकि जब तुम अल्लाह के लिए एक सजदा करोगे, तो उसके बदले में अल्लाह तुम्हारा स्थान एक दर्जा ऊँचा कर देगा और तुम्हारा एक गुनाह मिटा देगा।
मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अनहा का वर्णन है कि : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रमज़ान महीने के अंतिम दस दिनों में दूसरे दिनों की तुलना में कहीं अधिक इबादत में लीन रहा करते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का मामूल यह था कि जब रमज़ान के अंतिम दस दिन आते, तो अन्य दिनों की तुलना में कहीं ज़्यादा इबादत और विभिन्न प्रकार के नेकी के कामों में व्यस्त हो जाते थे। आप ऐसा उन रातों के महत्व को सामने रखते हुए और लैलतुल क़द्र की तलाश में किया करते थे।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हुा- कहती हैं कि हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के लिए मिसवाक और वज़ू का पानी तैयार रखते थे। फिर अल्लाह जितनी रात को चाहता आपको जगाता। तो आप उठते, वज़ू करते और नमाज़ पढ़ते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- कहती हैं कि वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के लिए मिसवाक एवं वज़ू का पानी तैयार रखतीं, फिर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह रात को जब चाहता, आपको जगा देता। जब जाग जाते, तो सबसे पहले अपने दाँतों को मिसवाक से रगड़-रगड़ कर साफ़ करते, ताकि सामान्यतः नींद के कारण पैदा होने वाली दुर्गंध दूर हो जाए। फिर नमाज़ के लिए वज़ू करते और उसके बाद रात की नमाज़ पढ़ते।
अबू अब्स अब्दुर रहमान बिन जब्र रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जिस बंदे के क़दम अल्लाह के रास्ते में धूल धूसरित हो गए, उसे (जहन्नम की) आग नहीं छूएगी।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने खुशखबरी दी है कि जहन्नम की आग उस व्यक्ति को नहीं छू सकती जिसके पैर अल्लाह के मार्ग में लड़ते हुए धूल से सन गए।