





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबु दरदा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो सूरा कहफ़ की आरंभ की दस आयतें याद करेगा, दज्जाल से सुरक्षित रहेगा। एक रिवायत में हैः सूरा कहफ़ की अंतिम आयतें।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।जिसने सूरा कह्फ़ के आरंभ या अंत की, जैसा कि दो अलग-अलग रिवायतों में उल्लिखित है, दस आयतें याद कर लीं, अल्लाह उसे दज्जाल की बुराई और उसके फ़ितने से सुरक्षित रखेगा। अतः दज्जाल न उसपर हावी हो सकेगा और न उसकी हानि कर सकेगा।
अबू लुबाबा बशीर बिन अब्दुल मुनज़िर (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो क़ुरआन को मधुर आवाज़ से न पढ़े, वह हम में से नहीं है।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस हदीस में मधुर आवाज़ में क़ुरआन पढ़ने की प्रेरणा दी है। दरअसल हदीस में आए हुए शब्द "مَن لَم يَتَغنَّ بِالقُرآنِ" के दो अर्थ हैं : एक, जो मधुर आवाज़ में क़ुरआन न पढ़े और दुसरा, जो क़ुरआन से संतुष्ट होकर अन्य स्थानों में मार्गदर्शन ढूँढना न छोड़े, वह हम में से नहीं है। दरअसल यह बड़ी सख़्त चेतावनी है, जो इस बात को प्रमाणित करती है कि यह एक बड़ा गुनाह है, जो चेतावनी एवं धमकी का हक़दार है। इस बात में कोई संदेह है भी नहीं कि जो क़ुरआन को छोड़ कहीं और मार्गदर्शन ढूँढे, उसे अल्लाह गुमराह कर देगा। हम इस तरह के पापों से अल्लाह की शरण माँगते हैं। इस हदीस से मालूम हुआ कि इन्सान को मधुर आवाज़ में क़ुरआन पढ़ना चाहिए और उसी से संतुष्ट रहना चाहिए।
अबू सईद राफ़े बिन मुअल्ला (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मुझसे फ़रमाया: क्या मैं तुम्हें, तुम्हारे मस्जिद से निकलने से पहले- पहले क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ? आपने मेरा हाथ पकड़ लिया। जब हम मस्जिद से निकलने लगे, तो मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहा था कि आप हमें क़ुरआन की महानतम सूरा सिखाएँगे? तो फ़रमाया: यह सूरा है: अल- हमदु लिल्लाहि रब्बिल- आलमीन, यह सब-अल-मसानी (बार- बार दोहराई जाने वाली सात आयतें) और महान क़ुरआन का सार है, जो मुझे दिया गया है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।अबू सईद राफ़े बिन मुअल्ला -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुझसे फ़रमाया : "ألا", यह शब्द मुख़ातब का आकर्षण बाद में आने वाली बात की ओर केंद्रित करने के लिए कहा जाता है। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का कथन; "क्या मैं तुम्हें, तुम्हारे मस्जिद से निकलने से पहले-पहले क़ुरआन की महानतम सूरा न सिखाऊँ?", आपने उनको सीधा सिखा देने के बजाय सिखाने से पहले यह बात इसलिए कही, ताकि उनका ज़ेहन उसे ग्रहण करने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाए और वह उसकी ओर अच्छी तरह मुतवज्जेह हो जाएँ। "आपने मेरा हाथ पकड़ लिया।" यानी इसके पश्चात कि आपने यह बात कही और हम चल पड़े। "जब हम मस्जिद से निकलने लगे, तो मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! आपने कहा था कि आप हमें क़ुरआन की महानतम सूरा सिखाएँगे? तो फ़रमाया: यह सूरा है: अल- हमदु लिल्लाहि रब्बिल- आलमीन" यानी सूरा फ़ातिहा। इसे क़ुरआन की महानतम सूरा इसलिए कहा गया है कि इसमें क़ुरआन के सारे उद्देश्य समाहित हैं। इसी बिंदु को ध्यान में रखते हुए इसे उम्म अल-क़ुरआन भी कहा जाता है। फिर आपने क़ुरआन की उस विशेषता को चिह्नित कर दिया, जिसके कारण वह क़ुरआन की शेष सूरों से भिन्न है। फ़रमाया : "यह सब्अ-अल-मसानी (बार- बार दोहराई जाने वाली सात आयतें) है" यानी इसका नाम सब-अल-मसानी है। इसमें प्रयुक्त "المثاني" शब्द "مثناة" का बहुवचन है, जो "التثنية" से लिया गया है। इस सूरा को "सब्अ अल-मसानी" इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह नमाज़ की हर रकात में दोहराई जाती है। या फिर इसलिए कि इसके साथ एक दूसरी सूरा मिलाई जाती है। या फिर इसलिए कि इसके अंदर प्रशंसा एवं दुआ जैसी दो प्रकार की चीज़ें हैं। या फिर इसलिए कि इसमें प्रवाहशील भाषा एवं सुगम वर्णन शैली दोनों एकत्र हैं। या फिर इसलिए कि इसे उस समय से आज तक बार-बार दोहराया जा रहा है और यह सिलसिला टूटता नहीं है तथा इसका पठन-पाठन किया जा रहा है और यह ख़त्म नहीं होती। या फिर इसलिए कि समय के साथ इसके नए-नए लाभ सामने आते रहते हैं, जिसका कोई अंत नहीं है। जबकि ऐसा भी हो सकता है कि "المثاني" शब्द "مثناة" का बहुवचन हो, जो "الثناء" से लिया गया है। ऐसा इसलिए कि यह उच्च एवं महान अल्लाह की प्रशंसा पर आधारित है। गोया यह सूरा अल्लाह के सुंदर एवं अद्भुत नामों एवं गुणों के द्वारा उसकी प्रशंसा करती है। जबकि ऐसा भी संभव है "الثنايا" से लिया गया हो। ऐसा इसलिए कि अल्लाह ने इसे अपनी उम्मत के लिए चुन लिया है। आपके शब्द "और महान क़ुरआन है।" यानी उसका एक नाम यह भी है। आपके शब्द "जो मुझे दिया गया है।" यानी जो मुझे प्रदान किया है। इस सूरा को "महान क़ुरआन" का नाम इसलिए दिया गया है कि इसके अंदर लोक एवं परलोक तथा अहकाम एवं अक़ाइद आदि सारी चीज़ों का विवरण मौजूद है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: जो व्यक्ति क़ुरआन पढ़ता है और वह उसमें निपुण है, वह सम्मानित और नेक फ़रिश्तों के साथ होगा, तथा जो अटक- अटक कर क़ुरआन पढ़ता है और उसे क़ुरआन पढ़ने में कठिनाई होती है, उसके लिए दोहरा सवाब है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- की इस हदीस में है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जो व्यक्ति क़ुरआन पढ़ता है और वह उसमें निपुण है, वह सम्मानित और नेक फ़रिश्तों के साथ होगा।" यानी जो व्यक्ति क़ुरआन की अच्छी तिलावत करता है और उसे अच्छी तरह याद रखता है, वह सम्मानित एवं नेक फ़रिश्तों के साथ होगा। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया है : "माननीय शास्त्रों में है। जो ऊँचे तथा पवित्र हैं। ऐसे लेखकों (फ़रिश्तों) के हाथों में है, जो सम्मानित और आदरणीय हैं।" (सूरा अबसा , आयत संख्या : 13-16) अतः क़ुरआन पढ़ने में निपुण व्यक्ति फ़रिश्तों के साथ होगा। क्योंकि अल्लाह ने उसपर उसी तरह क़ुरआन पढ़ना आसान कर दिया है, जैसे सम्मानित एवं नेक फ़रिश्तों पर इस कार्य को आसान किया है। लिहाज़ा वह क़ुरआन पढ़ने के मामले में उन्हीं की तरह होगा और अल्लाह के निकट दर्जे में भी उनके समान होगा। लेकिन जो अटक-अटक कर क़ुरआन पढ़ता हो और कठिन होने के बावजूद हिज्जा करके उसका पाठ करता हो, उसके लिए दोगुना प्रतिफल है। एक तिलावत का और एक अपने आपको थकाने और परेशानी उठाने का।
उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: क्या तुम्हें मालूम नहीं कि जो आयतें आज रात उतरी हैं, उन जैसी आयतें कभी नहीं देखी गईं! ये आयतें हैं: क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिल फ़लक़ और क़ुल अऊज़ु बि-रब्बिन्नास।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।उक़बा बिन आमिर -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "ألم تر" यानी क्या तुम नहीं जानते? यह है तो वर्णनकर्ता के लिए विशेष संबोधन, लेकिन इससे मुराद सभी लोग हैं। यह आश्चर्य प्रकट करने वाला शब्द है। आगे आपने आश्चर्य के कारण की ओर इशारा करते हुए कहा : "لم ير مثلهن" यानी अल्लाह की शरण माँगने के संबंध में इनकी जैसी कोई सूरा देखी नहीं गई। आपके द्वारा प्रयुक्त शब्द "قط" इनकार की पुष्टि करने के लिए है। आपके शब्द : "قل أعوذ برب الفلق و قل أعوذ برب الناس" का अर्थ यह है कि जिस तरह इन दोनों सूरों की सारी आयतें पाठक को सारी बुराइयों से अल्लाह की शरण प्रदान करने का काम करती है, उस तरह किसी और सूरा की सारी आयतें नहीं करतीं। इन दोनों सूरों के द्वारा जो व्यक्ति ईमान एवं निष्ठा के साथ अल्लाह की शरण माँगेगा, उसे सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह शरण देने का काम करेगा। सारांश यह है कि इन्सान को इन दोनों सूरों के द्वारा अल्लाह की शरण माँगनी चाहिए।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से वर्णित है, वह कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर सर्दी की सुबह को भी वह्य उतरती, तो आपके ललाट पर पसीना बह पड़ता।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।मुसलमानों की मता आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- इस हदीस में बता रही हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- पर ठंडी सुबह में वह्य आती, तो आपकी पेशानी से भारी मात्रा में पसीना बहने लगता। ऐसा वह्य की तीव्रता के कारण हुआ करता था।
बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमायाः “क़ुरआन को अपनी आवाज़ के द्वारा सँवारकर पढ़ो।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।क़ुरआन पढ़ते समय अपनी आवाज़ को सुंदर बनाकर उसकी शोभा बढ़ाओ। क्योंकि सुंदर आवाज़ से सुंदर वाणी की सुंदरता एवं शोभा और बढ़ जाती है। इस आदेश का उद्देश्य क़ुरआन के अर्थ पर अच्छी तरह ग़ौर व फिक्र करना तथा उसकी आयतों में निहित आदेशों, निषेधों, वचनों एवं चेतावनियों को समझना है। क्योंकि अच्छी आवाज़ से प्रेम इन्सान की प्रकृति में मौजूद है। फिर जब आवाज़ अच्छी होती है, तो इन्सान का चिंतन इधर-उधर से हटकर उसी पर केंद्रित हो जाता है, और जब चिंतन केंद्रित हो जाता है, तो वांछित विनीति एवं विनम्रता भी प्राप्त हो जाती है। याद रहे कि यहाँ आवाज़ सुंदर बनाने से मुराद ऐसी सुंदरता लाना है, जिससे विनीति एवं विनम्रता पैदा हो। गानों की धुनों की आवाज़ नहीं, जो क़िरात के दायरे ही में न आती हो।
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से वर्णित है कि एक जमात नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के द्वार के पास बैठी थी कि उनमें से किसी ने कहाः क्या अल्लाह ने ऐसा-ऐसा नहीं फ़रमाया है? फिर किसी ने कहाः क्या अल्लाह ने ऐसा-ऐसा नहीं फ़रमाया है? अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इन बातों को सुना, तो घर से निकले। ऐसा लग रहा था कि आपके चेहरे पर अनार का रस निचोड़ दिया गया हो। फ़रमाया : “क्या तुम्हें इसी का आदेश दिया गया है? अथवा क्या तुम्हें इसीलिए इस धरा पर भेजा गया है कि एक आयत का खंडन दूसरी आयत से करो? तुमसे पूर्व की उम्मतें तो इन्हीं जैसी चीज़ों के कारण तबाह हुई हैं। तुम्हारा इन बातों से कोई लेना-देना नहीं है। देखो कि तुम्हें क्या आदेश दिया गया है, तो उसपर अमल करो और किस बात से रोका गया है, तो उससे रुक जाओ।“
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है ।कुछ सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के द्वार के पास बैठे हुए थे। इस बीच किसी मसले पर उनका मतभेद हो गया। कुछ रिवायतों में है कि उनका मतभेद भाग्य के मसले पर हुआ था। उनमें से किसी ने अपने मत के प्रमाण के रूप में अल्लाह की किताब की कोई आयत प्रस्तुत की, तो किसी ने अपनी बात को सिद्ध करने के लिए कोई अन्य आयत सामने रख दी। उनकी यह बातें अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सुनीं, तो घर से निकलकर उनके पास आए। आप क्रोधित थे और चेहरा बहुत ज़्यादा लाल था। ऐसा मालूम होता था कि आपके चेहरे पर अनार का रस निचोड़ दिया गया हो। आपने उनसे फ़रमाया : क्या क़ुरआन के बारे में यह मतभेद, बहस और झगड़ा ही तुम्हारी रचना का उद्देश्य है? या फिर अल्लाह ने तुम्हें इसी का आदेश दिया है? आप कहना यह चाहते थे कि दोनों में से कोई भी बात नहीं है और इन बहसों की कोई आवश्यकता भी नहीं है। फिर बताया कि पिछले समुदायों की गुमराही का सबब यही मतभेद था। फिर उन्हें उनकी भलाई तथा लाभ की बात बताते हुए फ़रमाया : जिस बात का आदेश तुम्हें अल्लाह दे, उसे करो और जिस बात से रोके, उससे रुक जाओ। इसी के लिए अल्लाह ने तुम्हारी रचना की है और इसी में तुम्हारी भलाई एवं मुक्ति है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः “कुरआन के संबंध में वाद-विवाद न करो, क्योंकि इसके विषय में वाद-विवाद करना कुफ़्र है।”
इसे अबू दाऊद तयालिसी ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने क़ुरआन के बारे में वाद-विवाद करने से मना किया है, क्योंकि यह कुफ़्र की ओर ले जाता है। इसका कारण यह है कि कभी-कभी इन्सान क़ुरआन की कोई आयत या कोई शब्द सुनात है, जिसकी जानकारी उसके पास नहीं होती। ऐसे में वह जल्दबाज़ी से काम लेते हुए उसे पढ़ने वाले को गलत ठहरा देता है और उसे क़ुरआन मानने से इनकार कर देता है। या किसी से किसी ऐसी आयत के बारे में बहस करता है, जिसके बारे में वह कुछ नहीं जानता और इसके बावजूद उसे पथभ्रष्ट कहता है। यह वाद-विवाद कभी-कभी इन्सान को सत्य से दूर कर देता है, यद्यपि उसे वह उचित दिखाई देता हो। यही कारण है कि इसे हराम घोषित किया गया और कुफ़्र कहा गया है। लेकिन यदि किसी इन्सान के अंदर इस तरह की बातें न पाई जाएँ, तो उसका वाद-विवाद करना वैध अथवा प्रशंसनीय है। जैसे कोई सीखने और सत्य को सामने लाने के लिए पूछे। इसी की ओर इशारा करते हुए उच्च एवं महान अल्लाह ने कहा है : "और उनसे ऐसे ढंग से वाद-विवाद करो, जो उत्तम हो।"