





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- बयान करती हैं कि हमज़ा बिन अम्र असलमी ने- जो कि एक बहुत रोज़ा रखने वाले व्यक्ति थे- अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा कि क्या मैं सफ़र में रोज़ा रखूँ? तो आपने फ़रमाया: यदि चाहो तो रोज़ा रखो और यदि चाहो तो न रखो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- बताती हैं कि हमज़ा बिन अम्र असलमी -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- ने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से यात्रा के दौरान रोज़ा रखने के संबंध में पूछा, तो नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें रोज़ा रखने और छोड़ने का विकल्प देते हुए फ़रमाया : "चाहो तो रोज़ा रखो और चाहो तो रोज़ा तोड़ दो।" याद रहे कि यहाँ रोज़े से मुराद फ़र्ज़ रोज़ा है। क्योंकि आपका फ़रमान है : "यह अल्लाह की ओर से छूट है।" इससे यह भी पता चलता है कि उन्होंने फ़र्ज़ रोज़े के बारे में ही पूछा था। इसकी पुष्टि अबू दाऊद की रिवायत से भी होती है, जिसमें है कि उन्होंने कहा : "ऐ अल्लाह के रसूल, मेरे पास एक सवारी है। मैं उसी से रोज़ी रोटी का बंदोबस्त करता हूँ। उसी पर यात्रा करता हूँ और लोगों का सामान ढोता हूँ। कभी-कभी यात्रा के दौरान रमज़ान का महीना आ जाता है और मैं रोज़ा रखने की क्षमता भी रखता हूँ ...।" लेकिन इस बात की भी संभावना है कि उन्होंने मुतलक रोज़े के बारे में पूछा हो, चाहे फ़र्ज़ हो या नफ़ल। क्योंकि आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ने कहा है : "वह एक बहुत रोज़ा रखने वाले व्यक्ति थे।" इससे यह साफ़ हो जाता है कि यात्रा में रोज़ा न रखना अल्लाह की ओर से मिली हुई एक छूट है। जिसने उसे ग्रहण किया, उसने अच्छा किया और जिसने रोज़ा रखा, उसका रोज़ा रखना जायज़ है और वह वाजिब अदा करने वाला समझा जाएगा।
आइशा और उम्मे सलमा- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है कि कभी-कभी इस हाल में फ़ज्र की नमाज़ का समय आ जाता कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी पत्नियों से संभोग के कारण नापाकी की अवस्था में होते। फिर इसके बाद स्नान करते और रोज़ा रखते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा और उम्म-ए-सलमा -अल्लाह उन दोनों से प्रसन्न हो- बताती हैं कि कभी-कभी ऐसा होता कि अल्लाह के -रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- रात को हमबिस्तरी (संभोग) करते और स्नान किए बिना जनाबत की अवस्था ही में फ़ज़्र हो जाती। लेकिन इसके बावजूद आप रोज़ा पूरा करते और उसकी क़ज़ा नहीं करते थे। दरअसल यह बात दोनों ने उस समय कही थी, जब मरवान बिन हकम ने उनके पास आदमी भेजकर इस संबंध में पूछा था। यह हुक्म रमज़ान तथा गैर-रमज़ान दोनों के लिए है।
अबू सईद खुदरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दो दिन, अर्थात ईद अल-फ़ित्र एवं ईदुल-अज़हा के दिन रोज़ा रखने, एक कपड़े को सारे बदन पर इस तरह लपेटने कि हाथ आदि कुछ भी बाहर न निकल सके, पिंडलियों को खड़ा करके एक ही कपड़ा लपेटकर चूतड़ के बल बैठने और फ़ज्र एवं अस्र के बाद नमाज़ पढ़ने से मना किया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने दो दिनों के रोजों, दो तरह से कपड़ा पहनने और दो नमाज़ों से मना किया है। जिन दो दिनों में रोज़ा रखना हराम है, उनसे मुराद ईद अल-फ़ित्र और ईद अल-अज़हा के दिन हैं। इन दो दिनों में रोज़ा रखने की मनाही की हिकमत यह है कि यह खाने-पीने और ख़ुशी मनाने के दिन हैं और इस तरह के दिनों में रोज़ा रखना उचित नहीं है। रही बात दो तरह से कपड़ा पहनने की मनाही की, तो उनमें से एक यह है कि आदमी अपने दोनों चूतड़ों के बल पर बैठे और दोनों पिंडलियों को खड़ा रखे और उन्हें अपने हाथों से मज़बूती से पकड़े रहे या एक कपड़े से बाँध ले। जबकि दूसरा यह है कि आदमी एक कपड़े को इस तरह से ओढ़ ले कि शरीर का कोई अंग बाहर निकालने की गुंजाइश बाक़ी न रहे। जबकि बुखारी की रिवायत में यह शर्त लगाई गई है कि "उसके गुप्तांग पर कोई कपड़ा न हो।" जहाँ तक दो नमाज़ों की बात है, तो उनसे मुराद फ़ज्र की नमाज़ के बाद एवं अस्र की नमाज़ के बाद पढ़ी जाने वाली नमाज़ें हैं। यह मनाही दरअसल उन काफिरों के साथ समानता ग्रहण करने के रास्तों को बंद करने के लिए है, जो सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सूरज को सजदा करते हैं। परन्तु, यदि किसी ने फ़र्ज़ नमाज़ न पढ़ी हो, उसे इन दो समयों में अदा करना और इसी तरह सबब वाली नमाज़ों को अदा करना जायज़ है।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मुझे मेरे दोस्त (नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने तीन चीज़ों की वसीयत की है : हर महीना तीन दिन रोज़ा रखने, चाश्त की दो रकात नमाज़ पढ़ने और सोने से पहले वित्र पढ़ने की।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु बता रहे हैं कि उनके दोस्त और साथी यानी अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनको तीन बातों की वसीयत की है : 1- हर महीने तीन दिन रोज़ा रखने की। 2- हर रोज़ चाश्त की दो रकात नमाज़ पढ़ने की। 3- सोने से पहले वित्र की नमाज़ पढ़ने की। यह वसीयत विशेष रूप से उस व्यक्ति के लिए है, जिसे अंदेशा हो कि रात के अंतिम भाग में जाग नहीं सकेगा.
उमर बिन ख़त्ताब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जब रात्रि इधर से आ जाए और दिन उधर से चला जाए, तो जान लो कि इफ़तार का समय हो गया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।शरीयत के अनुसार रोज़े का समय फ़ज्र निकलने से सूरज डूबने तक है। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपनी उम्मत को बताया कि जब पूरब की ओर रात आ जाए और पश्चिम की ओर से दिन विदा हो जाए, यानी सूरज डूब जाए, जैसा कि एक रिवायत में है : "जब इधर से रात आ जाए और उधर से दिन विदा हो जाए और सूरज डूब जाए, तो रोज़ा तोड़ने का समय हो जाता है।" तो रोज़ादार इफ़तार के समय में प्रवेश कर जाता है, जिससे विलंब न केवल यह कि उचित नहीं है, बल्कि दोषपूर्ण भी है। इफ़तार में जल्दी करना चाहिए, ताकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के आदेश का पालन हो सके, संपूर्ण रूप से आपका अनुसरण हो सके, इबादत के समय तथा बिना इबादत के समय के बीच अंतर हो सके और नफ़्स को उसका हक़ यानी हलाल वस्तुओं को भोग करने का अवसर दिया जा सके। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के शब्द "فقد أفطر الصائم" के दो अर्थ हो सकते हैं : क- या तो इसका मतलब यह है कि समय हो जाने के कारण रोज़ेदार ने इफ़तार कर लिया, यद्यपि उसने कुछ खाया-पिया न हो। ऐसे में कुछ हदीसों में इफ़तार जल्दी करने की जो प्रेरणा आई है, उसका अर्थ है अमली रूप से रोज़ा इफ़तार करने में जल्दी करना, ताकि शरई अर्थ के मुवाफ़िक़ हो जाए। ख- या फिर इसका अर्थ यह है कि रोज़ादार इफ़तार के समय के अंदर प्रवेश कर गया। इस सूरत में भी इफ़तार जल्दी करने की प्रेरणा का अर्थ वही होगा। यही अर्थ बेहतर मालूम होता है और इसकी पुष्टि बुख़ारी की इस रिवायत से भी होती है : "इफ़तार हलाल हो गया।"
अबू सईद खुदरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः पाँच ओक़िया से कम (चाँदी) में ज़कात नहीं है, पाँच से कम ऊँट में ज़कात नहीं है और पाँच वसक़ से कम (अन्न) में ज़कात नहीं है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।ज़कात दरअसल धनवानों की ओर से निर्धनों को दिया जाने वाला एक सहारा और सहयोग है। यही कारण है कि ज़कात ऐसे लोगों से नहीं ली जाती, जिनके पास थोड़ा बहुत धन हो और जो धनी न समझे जाते हों। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने ज़कात वाजिब होने के लिए धन की निम्न सीमा निर्धारित कर दी है। जो उससे कम धन का मालिक हो, वह निर्धन है और उससे कुछ नहीं लिया जाएगा। सोने के मालिक पर उस समय तक ज़कात वाजिब नहीं होगी, जब तक उसके पास पाँच ऊक़िया सोना न हो। याद रहे कि एक ऊक़िया चालीस दिरहम का होता है। इस तरह, सोने का निसाब दो सौ दिरहम हुआ, जो पाँच सौ नव्वे ग्राम के बराबर होता है। ऊँट के मालिक पर उस समय तक ज़कात वाजिब नहीं है, जब तक उसके पास पाँच या उससे अधिक ऊँट न हों। इससे कम ऊँटों में ज़कात नहीं है। जबकि अनाज तथा फल के मालिक पर उस समय तक ज़कात वाजिब नहीं है, जब तक पाँच वसक़ अनाज अथवा फल न हो। एक वसक़ साठ साअ का होता है। इस तरह गल्ला एवं फल का निसाब तीन सौ साअ हुआ।
उमर बिन ख़त्ताब- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैंने जाहिलीयत के ज़माने में मन्नत मानी थी कि मैं मस्जिदे हराम में एक रात (एक रिवायत के मुताबिक एक दिवसीय) ऐतिकाफ़ करुँगा, इसके बारे में आप क्या कहते हैं? आपने फ़रमायाः अपनी मन्नत पूरी करो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उमर बिन खत्ताब -रज़ियल्लाहु अन्हु- ने जाहिलियत के युग में मस्जिदे हराम में एक रात एतेकाफ़ करने की मन्नत मानी थी। उन्होंने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से इस मन्नत के हुक्म के बारे पूछा, तो आपने मन्नत पूरी करने का आदेश दिया।
अब्दुल्लाह बिन उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब तुम (रमज़ान का) चाँद देखो, तो रोज़ा रखो और जब (शव्वाल का) चाँद दखो, तो रोज़ा रखना बंद कर दो। (और) अगर आकाश बादल से ढका हुआ हो, तो उसका अंदाज़ा लगा लो। (यानी महीने के तीस दीन पूरे कर लो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने रमज़ान महीना दाख़िल होने और उसके निकलने की निशानी बयान करते हुए फ़रमाया है : जब तुम रमज़ान महीने का चाँद देख लो, तो रोज़ा रखो। अगर बादल छाए रहने या बीच में कोई रुकावट होने के कारण चाँद नज़र न आ सके, तो शाबान महीने के तीस दिन पूरे कर लो। इसी तरह जब शव्वाल का चाँद देखो, तो रोज़ा रखना बंद कर दो। अगर बादल छाए रहने या बीच में कोई रुकावट होने के कारण चाँद नज़र न आ सके, तो रमज़ान महीने के तीस दिन पूरे कर लो।
अबुल हौरा सादी कहते हैं : मैंने हसन बिन अली रज़ियल्लाहु अनहुमा से पूछा : आपने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से क्या याद किया है? उन्होंने उत्तर दिया : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से यह याद किया है : "जो चीज़ तुम्हें संदेह में डाले, उसे छोड़कर वह अख़्तियार करो, जो संदेह में न डाले। क्योंकि सच्चाई इत्मीनान है और झूठ शक व शुबह है।"
इसे तिर्मिज़ी, नसई और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ऐसे कार्यों एवं कथनों से दूर रहने का आदेश दिया है, जिनके बारे में संदेह हो कि वर्जित हैं या नहीं? हलाल हैं या हराम? इन्सान को ऐसी चीज़ें अपनानी चाहिए, जिनके अच्छे एवं हलाल होने का यक़ीन हो। क्योंकि उनसे इन्सान का दिल संतुष्ट रहता है। जबकि संदेह वाली चीज़ें इन्सान के दिल को बेचैन और परेशान रखती हैं।