





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “जिसका वज़ू नहीं, उसकी नमाज़ नहीं और जिसने वज़ू करने से पहले अल्लाह का नाम नहीं लिया, उसका वज़ू नहीं।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस में अबू हुरैरा - रज़ियल्लाहु अनहु - अल्लाह के रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - के हवाले से बता रहे हैं कि आपने उस व्यक्ति की नमाज़ सही न होने की बात कही है, जिसने वुज़ू नहीं किया और इसी तरह उस व्यक्ति का वुज़ू सही न होने की बात कही है, जिसने वुज़ू से पहले बिस्मिल्लाह नहीं कहा। इस तरह यह हदीस इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वुज़ू करते समय अल्लाह का नाम लेना ज़रूरी है। जिसने जान-बूझकर बिस्मिल्लाह छोड़ दिया, तो उसका वुज़ू नहीं होगा। लेकिन यदि कोई वुज़ू करते समय अल्लाह का नाम लेना भूल गया या शरई आदेश से अनजान होने के कारण अल्लाह का नाम नहीं लिया, तो उसका वुज़ू सही है।
जाबिर रज़ियल्लाहु अनहु से रिवायत है, वह कहते हैं कि मुझे उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु ने बताया है : एक आदमी ने वज़ू किया और पैर में नाखून के बराबर जगह सूखी छोड़ दी। अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उसे देखा, तो फ़रमाया : “जाओ और अच्छी तरह वज़ू कर लो।” अतः, वह वापस गया और फिर उसने बाद में नमाज़ पढ़ी।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैउमर रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने देखा कि एक व्यक्ति पूरा वज़ू कर चुका है, लेकिन उसके क़दम पर एक नाखून के बराबर जगह सूखी रह गई है, जहाँ वज़ू का पानी पहुँचा नहीं है। अतः आपने वज़ू में रह जाने वाली कमी की ओर इशारा करते हुए उससे कहा कि वापस जाओ, अच्छी तरह और संपूर्ण रूप से वज़ू करो और वज़ू के सारे अंगों तक पानी पहुँचाओ। तो वह व्यक्ति वापस गया, संपूर्ण रूप से वज़ू किया और उसके बाद नमाज़ पढ़ी।
अनस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : “अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक साअ से पाँच मुद तक पानी से स्नान करते और एक मुद पानी से वज़ू करते थे।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जनाबत का स्नान एक साअ से पाँच मुद और वज़ू एक मुद पानी से कर लिया करते थे। साअ चार मुद का होता है और मुद एक मध्यम शरीर वाले इन्सान की दोनों हथेलियों भर का होता है।
उक़बा बिन आमिर रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं कि हमारे ज़िम्मे ऊँट चराने का काम था। जब मेरी बारी आई और मैं शाम को उन्हें वापस ले आया, तो देखा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खड़े होकर लोगों को हदीस सुना रहे हैं। मैंने सुना, आप फ़रमा रहे थे : “जो मुसलमान अच्छी तरह वज़ू करता है, फिर खड़े होकर मन तथा तन के साथ दो रकात नमाज़ पढ़ता है, उसके लिए जन्नत अनिवार्य हो जाती है।” वह कहते हैं कि मैंने कहा : कितनी अच्छी बातें हैं। यह सुनकर एक व्यक्ति मेरे सामने से कहता है : इससे पहले की बातें इससे भी अच्छी थीं। मैंने देखा, तो वह उमर रज़ियल्लाहु अनहु थे। उन्होंने कहा : मैंने देखा है कि तुम अभी-अभी आए हो। आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने -इससे पहले- फ़रमाया था : “तुममें से जो भी सम्पूर्ण तरीक़े से वज़ू करता है और फिर कहता है : " أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَهَ إِلَّا اللهُ وَأَنَّ مُحَمَّدًا عَبْدُ اللهِ وَرَسُولُهُ" (मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं और मुहम्मद अल्लाह के बंदे तथा रसूल हैं) उसके लिए जन्नत के आठों दरवाज़े खोल दिए जाएँगे। वह जिससे चाहेगा, प्रवेश करेगा।”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों से बात करते हुए दो बड़ी फ़ज़ीलतें बयान की हैं : 1- जिसने सुन्नत के अनुसार संपूर्ण रूप से वज़ू किया और हर अंग तक पूरे तौर पर पानी पहुँचाया, फिर यह दुआ पढ़ी जिसका अर्थ है : "इस बात की गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुहम्मद अल्लाह के बंदे और रसूल हैं, उसके लिए जन्नत के आठों द्वार खोल दिए जाते हैं। जिस द्वार से चाहे, अंदर दाख़िल हो जाए।" 2- जिसने इस तरह संपूर्ण वज़ू किया और उसके बाद दो रकात नमाज़ पूरी तवज्जो, विशुद्धता एवं विनम्रता के साथ पढ़ी और अपने शरीर के सारे अंगों को अल्लाह के सामने झुकाया, उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाएगी।
अब्द-ए-ख़ैर, अली -रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णन करते हैं कि उन्होंने कहा : यदि धर्म का आधार राय होता, तो मोज़े के ऊपरी भाग के बजाय निचले भगा का मसह करना अधिक उचित होता। हालाँकि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मोज़े के ऊपरी भाग का मसह करते हुए देखा है।”
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।अली -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि यदि धर्म का आधार अल्लाह की वाणी एवं उसके रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की सुन्नत के बजाय अक़्ल होता, तो मोज़े के ऊपरी भाग के बजाय निचले भाग का मसह करना अधिक उचित होता। क्योंकि उसके निचले भाग का संपर्क धरती से रहता है और उसमें गंदगियाँ एवं धूल-मिट्टी आदि लगती हैं। अतः विवेक यही कहता है कि मसह उसी का होना चाहिए। लेकिन शरीयत का आदेश इससे भिन्न है। अतः अमल उसी पर करना है और सुन्नत के विपरीत राय को छोड़ देना है। अली -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मोज़े के ऊपरी भाग का मसह करते देखा है और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का अमल एक अन्य दृष्टिकोण से अक़्ल के अनुरूप भी है। क्योंकि पानी से निचले भाग का मसह उससे नजासत के चिपकने का सबब बनेगा। अतः ऊपरी भाग के मसह का आदेश दिया गया, ताकि उससे लगी हुई धूल साफ़ हो जाए। क्योंकि नज़र तो ऊपरी भाग ही आता है। अतः मसह भी उसी का होना चाहिए। याद रहे कि शरई आदेश एवं निर्देश, सारे के सारे, स्वस्थ विवेक के अनुरूप हैं। लेकिन कभी-कभी यह बात कुछ लोगों की पहुँच से बाहर रह जाती है।
अनस रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जब तुममें से कोई वज़ू करे और उसके बाद मोज़े पहने, तो उनको पहनकर नमाज़ पढ़े और उनपर मसह करे और चाहे तो उन्हें जुनबी हो जाने के सिवा किसी परिस्थिति में न उतारे।"
इसे दाराक़ुतनी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि जब कोई मुसलमान वज़ू करने के बाद मोज़े पहने और उसके बाद वज़ू टूट जाने के कारण दोबारा वज़ू करना चाहे, तो इस बात की अनुमति है कि अगर चाहे तो एक निर्धारित अवधि तक मोज़ों को उतारने के बजाय उनपर मसह कर लिया करे। परन्तु, जुनबी हो जाने की अवस्था में मोज़े उतारकर पैरों को धोना पड़ेगा।
उरवा बिन ज़ुबैर, आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) से मरफूअन रिवायत करते हैं कि : अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी किसी पत्नी का चुंबन लिया, फिर नमाज़ के लिये गए और वज़ू नहीं किया। उरवा कहते हैं कि मैंने (आइशा रज़ियल्लाहु अनहा से) कहा: वह आप ही होंगी? तो वह हंस पड़ीं।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- बताती हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपनी किसी पत्नी का चुंबन लिया और फिर वज़ू किए बिना ही नमाज़ के लिए चल पड़े। इस हदीस को आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- से वर्णन करने वाले वर्णनकर्ता उरवा को इस बात का अंदाज़ा हो गया कि इस हदीस में जिस पत्नी का नाम अस्पष्ट रखा गया है, वह स्वयं आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- ही हैं। अतः, जब उन्होंने आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- को अपने इस अनुमान के बारे में बताया, तो उन्होंने उनके अनुमान की पुष्टि के रूप में हँस दिया। "और वज़ू नहीं किया।" असल यही है कि पति के पत्नी को छूने या उसका चुंबन लेने से वज़ू नहीं टूटता। चाहे ऐसा काम-वासना के साथ किया जाए या बिना काम वासना के। क्योंकि असल, वज़ू एवं तहारत का सुरक्षित रहना है। अतः किसी भी चीज़ से वज़ू टूटने की बात कहने के लिए ऐसी दलील चाहिए, जिसके मुक़ाबले में अन्य कोई दलील न हो। अब, चूँकि स्त्री को छूने से वज़ू टूटने का कोई विश्वस्त प्रमाण नहीं है, इसलिए तहारत बाकी रहेगी। रही बात अल्लाह के फ़रमान "أو لامستم النساء" की, तो सही बात यह है कि इससे मुराद संभोग है। यही हाल इसकी एक अन्य पठन-शैली "أو لمستم النساء" का भी है। इससे मुराद भी संभोग ही है। यह बात अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- और विद्वानों के एक समूह ने कही है। चूँकि आम तौर पर आदमी अपनी पत्नी का चुंबन काम-वासना के साथ ही लेता है, अतः यह इस बात का प्रमाण है कि काम-वासना के साथ पत्नी को स्पर्श करने से वज़ू नहीं टूटता है, हाँ, यदि इससे वीर्य-स्खलन हो जाए, तो वीर्य-स्खलन के कारण वज़ू टूट जाएगा।
तल्क़ बिन अली (रज़ियल्लाहु अनहा) कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए, तो एक देहाती व्यक्ति आया और कहने लगा: ऐ अल्लाह के नबी! उस व्यक्ति के प्रति आपका क्या आदेश है जो वज़ू के पश्चात अपने गुप्तांग को छू लेता है? आपने फ़रमाया: वह तो उसी का एक टुकड़ा है। या यह फ़रमाया: उसका एक अंग है।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।"उस व्यक्ति के बारे में आपका क्या आदेश है, जो वज़ू के पश्चात अपने लिंग को छू लेता है?" यानी यदि कोई व्यक्ति वज़ू के बाद अपने लिंग को छू लेता है, तो उसके बारे में शरीयत का क्या निर्देश है? क्या उसे वज़ू करना है? जबकि मुसनद-ए-अहमद की एक रिवायत में है : "एक व्यक्ति नमाज़ की अवस्था में अपने लिंग को छू लेता है, तो क्या उसे वज़ू करना है? आपने उत्तर दिया : नहीं! वह तो तुम्हारे शरीर ही का एक अंग है।" आपने फ़रमाया : "वह तो उसी का एक टुकड़ा है। या यह फ़रमाया: उसी का एक अंग है।" यानी लिंग भी शरीर के अन्य अंगों के समान एक अंग है। अतः जब किसी वज़ू किए हुए व्यक्ति के अपने हाथ, पाँव, नाक या सर को छूने से वज़ू नहीं टूटता, तो लिंग के छूने से भी नहीं टूटेगा। याद रहे हदीस या तो निरस्त हो गई है या फिर इससे मुराद इस तरह लिंग को छूना है कि बीच में कोई वस्तु हो। रही बात बिना किसी रुकावट के हाथ से छूने की, तो उससे वज़ू टूट जाता है, जैसा कि अन्य हदीसों में इसका स्पष्ट उल्लेख है।
अनस (रज़ियल्लाहु अनहु) से रिवायत है कि लोग एक जनाज़ा लेकर गुज़रे तो सहाबा ने उसकी तारीफ की । इस पर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: इसके लिए वाजिब हो गई। उसके बाद दूसरा जनाज़ा लेकर गुज़रे तो सहाबा ने उसकी बुराई की तो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: इसके लिए अनिवार्य हो गई। इस पर उमर (रज़ियल्लाहु अनहु) ने कहा कि क्या वाजिब हो गई? अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: इसकी तुमने प्रशंसा की, तो इसके लिए जन्नत अनिवार्य हो गई और उसकी तुमने बुराई की, तो उसके लिए जहन्नम वाजिब हो गई। वास्तव में, तुम लोग धरती पर अल्लाह के गवाह हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।कुछ सहाबा एक जनाज़े के पास से गुज़रे और उसके लिए भलाई एवं अल्लाह की शरीयत पर मज़बूती से अमल करके दुनिया से जाने की गवाही दी। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जब उनकी प्रशंसा सुनी, तो फ़रमाया : "वाजिब हो गई।" फिर दूसरे जनाज़े के पास से गुज़रे और उसके बारे में बुराई की गवाही दी। इसपर भी अल्लाह के रसूल -सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "वाजिब हो गई।" यह सुन उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- ने पूछा कि दोनों स्थानों में 'वाजिब हो गई' के क्या मायने हैं? उनके उत्तर में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : जिस व्यक्ति के बारे में तुमने भलाई, नेकी और सुदृढ़ता की गवाही दी, उसके लिए जन्नत वाजिब हो गई और जिसके बारे में तुमने बुराई की गवाही दी, उसके लिए जहन्नम वाजिब हो गई। हो सकता है कि वह निफ़ाक़ एवं इस तरह की किसी और चीज़ के लिए मशहूर रहा हो। फिर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि जिस व्यक्ति के बारे में सत्यवादी, प्रतिष्ठित और सत्कर्मी लोग जन्नत अथवा जहन्नम के हक़दार होने की गवाही दें, तो वह सचमुच वैसा ही होगा।