





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "जब तुम वस्त्र धारण करो अथवा वज़ू करो, तो दाहिने ओर से प्रारंभ करो।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- की यह हदीस सभी अच्छे कार्यों को दाएँ हाथ से करने पर ज़ोर देती है। उनका वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब तुम वस्त्रधारण करो" यानी जब कपड़ा पहनने का इरादा करो। "तथा जब तुम वज़ू करो" यानी जब वज़ू करने का इरादा करो। "तो दाहिने ओर से प्रारंभ करो।" इस हदीस में आया हुआ शब्द 'أيامن' बहुवचन है 'أيمن' का। यह बाएँ के विपरीत को कहते हैं। इस हदीस का आशय यह है कि कुर्ता आदि पहनते समय दाएँ हाथ को पहले घुसाया जाएगा और वज़ू करते समय दाएँ हाथ एवं पाँव को बाएँ हाथ एवं पाँव से पहले धोया जाएगा। याद रहे कि वज़ू के कुछ अंग ऐसे भी हैं, जिनमें दाएँ-बाएँ का ख़याल रखना मुसतहब नहीं है। वह हैं, दोनों कान, दोनों हथेलियाँ और दोनों गाल। इन्हें एक साथ पाक किया जाएगा। यदि ऐसा संभव न हो, मसलन किसी का एक हाथ कटा हुआ हो, तो वह दाएँ अंग से आरंभ करेगा।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा कि अल्लाह के निकट सबसे अधिक कौन-सा कर्म प्रिय है? आपने उत्तर दिया : "समय पर नमाज़ पढ़ना।" मैंने पूछा : फ़िर काैन-सा? फ़रमाया : "माँ-बाप के साथ अच्छा व्यवहार करना।" मैंने पूछा : फ़िर कौन-सा? फ़रमाया : "अल्लाह के रास्ते में जिहाद करना।" अब्दुल्लाह बिन मसऊद कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुझे यह बातें बताईं। यदि मैं और पूछ्ता, तो आप और बताते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से पूछा गया कि अल्लाह के निकट कौन-सा अमल सबसे ज़्यादा प्रिय है? तो आपने उत्तर दिया : फ़र्ज़ नमाज़ को उसके शरीयत द्वारा निर्धारित समय पर पढ़ना। फिर माता-पिता का आज्ञापालन करते हुए उनके साथ अच्छा व्यवहार करना, उनको उनका अधिकार देना और उनकी नाफ़रमानी न करना। फिर अल्लाह के पताका को ऊँचा करने, इस्लाम तथा मुसलमानों की रक्षा और इस्लामी प्रतीकों का वर्चस्व स्थापित करने के लिए तन एवं धन के साथ अल्लाह के मार्ग में युद्ध करना। अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मेरे पूछने पर यह कार्य बताए और अगर में आगे पूछता, तो आप और भी बताते।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिस दिन भी बंदे सुबह करते हैं, दो फ़रिश्ते उतरते हैं; एक कहता है : ऐ अल्लाह ख़र्च करने वाले को उत्तम प्रतिफल प्रदान कर। जबकि दूसरा कहता है : ऐ अल्लाह, रोकने वाले (कंजूस) का विनाश कर।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि हर दिन, जिसमें सूरज निकलता है, दो फ़रिश्ते उतरकर पुकारते हैं। एक कहता है : ऐ अल्लाह! नेकी के कामों में, बाल-बच्चों पर और अतिथियों पर खर्च करने वालों को बेहतर बदला प्रदान कर और उसके धन में बरकत दे। जबकि दूसरा कहता है : ऐ अल्लाह! ख़र्च करने से हाथ रोक कर रखने वाले के माल को, जिसे उसने हक़दारों को देने से रोक रखा है, नष्ट कर दे।
हुसैन बिन अब्दुर्रहमान कहते हैंः मैं सईद बिन जुबैर के पास बैठा था कि उन्होंने कहाः किसने आज रात तारा टूटते देखा है? मैंने कहाः मैंने देखा है। फिर मैंने कहाः उस समय मैं नमाज़ में नहीं था, बल्कि मुझे किसी चीज़ ने डस लिया था। उन्होंने कहाः फिर तुमने क्या किया? मैंने कहाः मैंने दम किया। उन्होंने कहाः तुमने ऐसा क्यों क्या? मैंने कहाः एक हदीस, जो हमने शाबी से सुनी है। उन्होंने कहाः शाबी ने तुम्हें कौन-सी हदीस सुनाई है? मैंने कहाः उन्होंने हमें बुरैदा बिन हुसैब (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित एक हदीस सुनाई है कि "बुरी नज़र लगने अथवा किसी ज़हरीले कीड़े के काटने के अतिरिक्त किसी और मामले में दम करना उचित नहीं है।" उन्होंने कहाः सुनी हुई हदीस पर अमल करना बड़ी अच्छी बात है। परन्तु हमें अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के हवाले से बताया है कि आपने फ़रमायाः "मेरे सामने बहुत-सी उम्मतें लाई गईं। मैंने देखा कि किसी नबी के साथ बहुत बड़ा समूह है, किसी नबी के साथ एक-दो लोग हैं और किसी नबी के साथ एक भी आदमी नहीं है। इसी बीच मेरे सामने एक विशाल जनसमूह प्रकट हुआ। मैंने समझा कि यह मेरी उम्मत के लोग हैं। लेकिन मुझसे कहा गया कि यह मूसा और उनकी उम्मत के लोग हैं। फिर मैंने देखा तो और एक बड़ा जनसमूह था। मुझसे कहा गया कि यह आपकी उम्मत के लोग हैं। इनमें सत्तर हज़ार लोग ऐसे हैं, जो बिना किसी हिसाब और अज़ाब के जन्नत में प्रवेश करेंगे।" इतना कहने के बाद आप उठे और अपने घर के अंदर चले गए। इधर, लोग उन सत्तर हज़ार लोगों के बारे में बातें करने लगे कि वे कौन हो सकते हैं? किसी ने कहा कि शायद वह लोग होंगे, जो मुस्लिम घराने में पैदा हुए और कभी किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया। उनके अंदर इसी तरह की बातें चल रही थीं कि रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बाहर आए। लोगों ने आपको उस चर्चे से अवगत कराया, तो फ़रमायाः "यह वह लोग हैं, जो न दम करवाते हैं, न अपने शरीर दागते हैं और न अपशगुन लेते हैं, बल्कि अपने रब पर भरोसा रखते हैं।" इतना सुनने के बाद उक्काशा बिन मेहसन (रज़ियल्लाहु अंहु) खड़े हो गए और कहाः अल्लाह से दुआ कीजिए कि मुझे उन लोगों में से बना दे। तो आपने फ़रमायाः "तुम उन लोगों में से हो।" फिर एक अन्य व्यक्ति खड़ा होकर कहने लगा कि मेरे बारे में भी दुआ करें कि अल्लाह मुझे उन लोगों में से बना दे। परन्तु आपने फ़रमायाः "इस मामले में तुमपर उक्काशा बाज़ी ले गया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।हुसैन बिन अब्दुर रहमान -अल्लाह की रहमत हो उनपर- ने दम करने से संबंधित एक वार्तालाप के बारे में बताया है, जो उनके और सईद बिन जुबैर -उनपर अल्लाह की रहमत हो- के बीच हुई थी। विवरण इस प्रकार है कि हुसैन को एक बिच्छू ने डस लिया था, जिसपर उन्होंने शरीयत के अनुसार दम किया। जब सईद -अल्लाह की रहमत हो उनपर- ने उनसे प्रमाण माँगा, तो शाबी की हदीस प्रस्तुत की, जो बुरी नज़र लगने तथा किसी ज़हरीले कीड़े के डसने पर दम करने को जायज़ ठहराती है। इसपर सईद ने उनकी प्रशंसा की, लेकिन साथ ही उन्हें एक हदीस सुनाई, जो दम न करने की प्रशंसा करती है। वह अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- की हदीस है, जिसमें है कि जिस बंदे के अंदर चार विशेषताएँ होंगी, वह बिना किसी हिसाब और अज़ाब के जन्नत का हक़दार होगा। वो चार विशेषताएँ हैं : दम न करवाना, दागने से बचना, अपशगुन न लेना तथा अल्लाह के ऊपर पूर्ण विश्वास रखना। फिर, जब उकाशा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अनुरोध किया कि अल्लाह से उन्हें ऐसे लोगों में शामिल करने की दुआ करें, तो फ़रमाया कि वह उन लोगों में से हैं। लेकिन जब एक अन्य व्यक्ति ने खड़े होकर यही अनुरोध किया, तो उन्हें प्यार से मना कर दिया, ताकि यह सिलसिला और आगे न बढ़े।
सह्ल बिन साद रज़ियल्लाहु अनहु से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने खैबर के दिन फ़रमाया : "कल मैं झंडा एक ऐसे आदमी को दूँगा, जिसके हाथ पर अल्लाह विजय प्रदान करेगा। उसे अल्लाह तथा उसके रसूल से प्रेम है तथा अल्लाह एवं उसके रसूल को भी उससे प्रेम है।" सहाबा रात भर यह अनुमान लगाते रहे कि झंड़ा किसे दिया जा सकता है? सुबह सब लोग नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास पहुँचे। हर व्यक्ति आशान्वित था कि झंडा उसे ही दिया जाएगा। लेकिन आपके मुँह से निकला : "अली बिन अबू तालिब कहाँ हैं?" कहा गया कि ऐ अल्लाह के रसूल! उनकी आँखें दुख रही हैं। आपने कहा : "उसे बुला भेजो।" उन्हें उपस्थित किया गया, तो आपने उनकी आँखों में अपना मुखस्राव डाल दिया और दुआ कर दी। नतीजे में वह ऐसे ठीक हो गए, जैसे उन्हें कोई परेशानी थी ही नहीं। आपने उन्हें झंडा थमा दिया। ऐसे में अली रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा : क्या मैं उनसे उस समय तक लड़ूँ, जब तक वे हम जैसे न हो जाएँ? आपने कहा : "आराम से चल पड़ो। जब ख़ैबर के मैदान में पहुँच जाओ, तो उन्हें इस्लाम ग्रहण करने का आमंत्रण देना और उनपर अल्लाह के जो अधिकार हैं, उन्हें उनसे अवगत करना। अल्लाह की क़सम, अल्लाह तुम्हारे द्वारा यदि एक भी व्यक्ति को हिदायत दे दे, तो यह तुम्हारे लिए लाल ऊँटों से उत्तम है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा को बताया कि आने वाले कल मुसलमानों को ख़ैबर के यहूदियों पर विजय प्राप्त होगी। विजय एक ऐसे व्यक्ति के हाथों प्राप्त होगी, जिसे आप झंडा थमाएँगे। यहाँ आए हुए अरबी शब्द "अर-रायह" से मुराद वह झंडा है, जिसका उपयोग सेना प्रतीक के तौर पर करती है। झंडा प्राप्त करने वाले व्यक्ति की विशेषताएँ बताते हुए आपने फ़रमाया कि वह अल्लाह और उसके रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से मुहब्बत रखता है, और अल्लाह तथा उसका रसूल उससे मुहब्बत रखते हैं। तब सहाबा ने रात इस बात पर सोचते हुए गुज़ारी कि सुबह झंडा किसे मिलेगा? हर व्यक्ति चाहता था कि यह गौरव उसे प्राप्त हो। सुबह हुई तो सब लोग अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के पास अपने-अपने मन में यह लालसा लिए हुए पहुँचे कि यह सम्मान प्राप्त हो जाए। लेकिन अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अली बिन अबू तालिब के बारे में पूछ डाला। बताया गया कि वह बीमार हैं और उनकी आँखों में परेशानी है। आपने उनको बुला भेजा। वह लाए गए, तो उनकी आँखों पर अपने मुँह की राल लगा दी, तथा उनके लिए दुआ कर दी। फिर ऐसे ठीक हो गए, जैसे कोई परेशानी थी ही नहीं। अब उनको झंडा दे दिया और आदेश दिया कि आराम से चलते जाएँ। जब दुश्मन के क़िले के निकट पहुँच जाएँ, तो उनके सामने इस्लाम ग्रहण कर लेने का प्रस्ताव रखें। अगर ग्रहण कर लेते हैं, तो इस्लाम के अनिवार्य कार्य सिखाएँ। उसके बाद अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहु को अल्लाह की ओर बुलाने की महत्ता समझाई और बताया कि किसी के द्वारा एक व्यक्ति भी सच्चे मार्ग पर चलने वाला बन जाए, तो लाल ऊँटों से बेहतर है, जिनका मालिक बनने के बाद इन्सान चाहे तो उन्हें अपने पास रखे और चाहे तो सदक़ा कर दे। यहाँ यह याद रहे कि अरबों के यहाँ लाल ऊँटों का शुमार मूल्यवान धनों में होता है।
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "जिसने अल्लाह के रास्ते में युद्ध करने वाले किसी व्यक्ति को युद्ध के सामान देकर तैयार किया, उसने युद्ध किया और जिसने किसी युद्ध पर गए हुए व्यक्ति के घर वालों की अच्छी तरह देख-रेख की, उसने युद्ध किया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया कि जिसने अल्लाह की राह में लड़ रहे योद्धा के लिए युद्ध का आवश्यक साधनों, जैसे हथियार, सवारी एवं रसद आदि का प्रबंध किया, वह योद्धा के समान है और उसे भी युद्ध करने का सवाब मिलेगा। इसी तरह जिसने योद्धा की अनुपस्थिति में उसके घर वालों की बेहतर अंदाज़ में देखभाल की, वह भी योद्धा के समान है।
यह्या बिन उमारा माज़िनी से रिवायत है, वह कहते हैं : मैंने अम्र बिन अबू हसन को देखा कि उन्होंने अब्दुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहु से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वज़ू के बारे में पूछा, तो उन्होंने एक बरतन पानी मँगवाया और उन्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की तरह वज़ू करके दिखाया। चुनांचे सबसे पहले दोनों हथेलियों पर बरतन से पानी उंडेला और उन्हें तीन बार धोया। फिर बरतन में हाथ डालकर पानी लिया और कुल्ली की, नाक में पानी डाला और नाक झाड़ा। तीन चुल्लू पानी से तीन बार ऐसा किया। फिर बरतन में हाथ डालकर पानी लिया और तीन बार अपने चेहरे को धोया। फिर बरतन में हाथ डालकर पानी लिया और अपने दोनों हाथों को कोहनियों समेत दो बार धोया। फिर बरतन में हाथ डालकर पानी लिया और अपने सर का मसह किया; पहले दोनों हाथों को आगे से पीछे ले गए, फिर पीछे से आगे ले आए। ऐसा एक ही बार किया। फिर अपने दोनों पैरों को टखनों समेत धोया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैयहाँ अब्दुल्लाह बिन ज़ैद रज़ियल्लाहु अनहु ने व्यवहारिक रूप से अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के वज़ू का तरीक़ा बयान किया है। अतः उन्होंने पानी का एक छोटा-सा बर्तन मँगवाया। सबसे पहले अपनी दोनों हथेलियों को धोया। वह इस तरह कि बर्तन को झुका कर दोनों हथेलियों पर पानी डाला और उनको तीन बार बर्तन से बाहर धोया। फिर अपना हाथ बर्तन में डालकर तीन चुल्लू पानी लिया और हर चुल्लू से कुल्ली की, नाक में पानी चढ़ाया और नाक झाड़ी। फिर बर्तन से तीन चुल्लू पानी लेकर तीन बार अपने चेहरे को धोया, फिर उससे पानी लेकर अपने हाथों को कोहनियो समेत दो-दो बार धोया। फिर बर्तन में हाथ डाला और दोनों हाथों से अपने सर का मसह (स्पर्श) किया। मसह करने का आरंभ अपने सर के अगले भाग से किया और हाथों को गर्दन की ऊपरी भाग में स्थित गुद्दी तक पहुँचाया। फिर दोनों हाथों को वापस वहीं ले आए, जहाँ से आरंभ किया था। फिर दोनों पैरों को टखनों समेत धोया।
बिन शुमासा महरी कहते हैं कि हम लोग अम्र बिन आस (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास उस समय पहुँचे, जब वह मृत्युशय्या पर थे। वह देर तक रोते रहे और अपना चेहरा दीवार की ओर फेर लिया। यह देख उनका बेटा कहने लगाः ऐ मेरे पिता जान, क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आपको यह ख़ुशख़बरी नहीं दी थी? क्या अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आपको यह ख़ुशख़बरी नहीं दी थी? तो उन्होंने अपना चेहरा उसकी ओर फेरा और फ़रमायाः हम अपने जिस अमल को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, वह इस बात की गवाही देना है कि अल्लाह के सिवा कोई पूज्य नहीं है और मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अल्लाह के रसूल हैं। दरअसल, मैं अब तक तीन परिस्थितियों से गुज़रा हूँ; मैंने ख़ुद को उस परिस्थिति में भी देखा है, जब मेरे निकट कोई अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से अधिक घृणित नहीं था। उस समय मेरे निकट सबसे प्रिय बात यह थी कि मैं आपपर क़ाबू पा लूँ और आपका वध कर दूँ। अगर मैं उस परिस्थिति में मर गया होता, तो जहन्नम में होता। फिर जब अल्लाह ने मेरे दिल में इसलाम को डाल दिया, तो मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और कहाः आप अपना दाहिना हाथ बढ़ाएँ, ताकि मैं आपकी बैअत करूँ। चुनांचे आपने अपना दाहिना हाथ बढ़ाया, तो मैंने अपना हाथ खींच लिया। आपने फ़रमायाः "तुमने ऐसा क्यों किया ऐ अम्र?" मैंने कहाः मैं एक शर्त रखना चाहता हूँ। फ़रमायाः "तुम कौन-सी शर्त रखना चाहते हो?" मैंने कहाः यह कि मुझे क्षमा कर दिया जाए। फ़रमायाः "क्या तुम नहीं जानते कि इसलाम पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है, हिजरत पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है और हज पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है?" उस समय मेरे निकट न कोई अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रिय था और न मेरी आँखों में कोई आपसे अधिक सम्मानित था। आपके प्रताप तथा सम्मान के कारण मैं कभी आपको आँख भरकर देख भी नहीं सकता था। यदि मुझे आपका हुलिया बयान करने को कहा जाए, तो मैं बयान नहीं कर सकता। इसलिए कि मैंने कभी आपको आँख भरकर देखा ही नहीं। यदि मेरी मृत्यु उसी हाल में हो गई होती, तो आशा करता हूँ कि मैं जन्नत में प्रवेश कर जाता। फिर हमने कुछ ज़िम्मेवारियाँ संभालीं। मैं नहीं जानता कि उन मामलों में मेरा क्या हाल रहा। देखो, जब मैं मर जाऊँ, तो मेरे साथ न कोई नौहा-मातम करने वाली स्त्री जाए और न आग। फिर जब मुझे दफ़न कर दो, तो मुझपर थोड़ी-थोड़ी करके मिट्टी डालना और मेरी क़ब्र के आस-पास उतनी देर रुकना, जितनी देर में एक ऊँट ज़बह करके उसके मांस को बाँटा जासके, ताकि मैं तुमसे घुला-मिला रहूँ और देखूँ कि अपने रब के भेजे हुए फ़रिश्तों को क्या उत्तर देता हूँ।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।सुसमाचार तथा बधाई देने के विषय पर आधारित अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- की इस हदीस से एक कहानी जुड़ी हुई है। इस महत्वपूर्ण कहानी का सार यह है कि अम्र -रज़ियल्लाहु अनहु- मृत्युशैया पर थे और दुनिया छोड़ जाने ही वाले थे कि उनके पास उनके कुछ साथी आए, तो वह बहुत ज़्यादा रोने लगे और अपना मुँह दीवार की ओर कर लिया। यह देख उनके बेटे ने उनसे कहा : आख़िर आप रो क्यों रहे हैं, जबकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आपको जन्नत का सुसमाचार सुनाया है? उन्होंने उत्तर दिया : ऐ मेरे बेटे! मैं अब तक तीन परिस्थितियों से गुज़र चुका हूँ। फिर तीनों परिस्थितियों को बयान करते हुए कहा कि पहले वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से बहुत ज़्यादा नफ़रत करते थे। उनको धरती के ऊपर रहने वाले किसी व्यक्ति से उतनी नफ़रत नहीं थी, जितनी आपसे थी। उनकी चाहत तो यह थी कि यदि बस चलता, तो आपका वध कर देते। यह सबसे परले दर्जे का कुफ़्र था। यहाँ तक कि यह परिस्थिति बदली और अल्लाह ने उनके दिल में इस्लाम को डाल दिया। फिर वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आप अपना हाथ बढ़ाइए, मैं इस्लाम पर आपसे बैअत करना चाहता हूँ। चूँकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सर्वोत्तम चरित्र के मालक थे, इसलिए अपना हाथ बढ़ा दिया। लेकिन अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अपना हाथ खींच लिया। उन्होंने ऐसा अभिमान के तौर पर नहीं, बल्कि अपनी आशंकाओं को दूर करने के लिए किया था। चुनांचे आपने उनसे पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो उत्तर दिया कि मैं एक शर्त के साथ मुसलमान होना चाहता हूँ। आपने पूछा कि तुम्हारी शर्त किया है, तो उन्होंने जवाब दिया कि अल्लाह मेरे अब तक के अविश्वास एवं गुनाहों को माफ़ कर दे। उनकी सबसे बड़ी चिंता यही थी कि उनके गुनाह माफ़ हो जाएँ, क्योंकि उन्हें लगता था कि उन्होंने इतने बड़े-बड़े पाप किए हैं कि अल्लाह उन्हें माफ़ नहीं करेगा। अतः अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनसे फ़रमाया : "क्या तुम नहीं जानते कि इस्लाम पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है, हिजरत पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देती है और हज पहले के गुनाहों को ख़त्म कर देता है?" इस तरह आपने तीन बातों का ज़िक्र किया। इस्लाम पहले के गुनाहों को नष्ट कर देता है, इसका उल्लेख खुद पवित्र क़ुरआन में भी हुआ है। सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने फ़रमाया : "(हे नबी!) इन काफ़िरों से कह दो कि यदि वे रुक गए, तो जो कुछ हो गया है, वह उनसे क्षमा कर दिया जाएगा और यदि पहले जैसा ही करेंगे, तो अगली जातियों की दुर्गत हो चुकी है।" इसी तरह जब कोई व्यक्ति अपना नगर, जहाँ वह रह रहा था और जो कुफ़्र का नगर था, त्याग कर निकल जाता है, तो उसके पहले के गुनाह माफ़ कर दिए जाते हैं। इसी प्रकार हज भी पहले के गुनाहों को नष्ट कर देता है। अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक अन्य हदीस में फ़रमाया है : "जिसने हज किया और इस दौरान कोई गंदी बात या गुनाह का काम नहीं किया, वह उस दिन की तरह गुनाहों से पवित्र होकर लौटेगा, जिस दिन उसकी माँ ने उसे जन्म दिया है।" इसके बाद उन्होंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हाथ पर बैअत की और आपसे इतना अधिक प्रेम किया कि आप उनके यहाँ दुनिया के सबसे प्रिय व्यक्ति बन गए और उनके दिल में आपका इतना सम्मान पैदा हो गया कि वह कभी आपको आँख भर कर देख नहीं सके। वह पाक प्रभु कितना महान है, जो दिलों को फेरता है। कल तक वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से अशेष नफ़रत करते थे और अवसर मिलने पर आपका वध करने तक की इच्छा रखते थे और आज दिल में आपका इतना सम्मान उठाए फिरते हैं कि आपको आँख भर कर देख भी नहीं सकते और बाद में आपका हुलिया इसलिए बयान नहीं कर पाते थे कि आपके प्रभाव के कारण वह आपको ठीक से देख नहीं सके थे। उनका कहना है कि यदि वह पहली अवस्था में मर जाते, तो जहन्नमी होते। जबकि अगर दूसरी अवस्था में मरते, तो उन्हें आशा है कि उन्हें जन्नत मिल जाती। उनकी सावधानी देखिए। वह विश्वास के साथ कहते हैं कि यदि पहली अवस्था में मर जाते, तो जहन्नमी होते, लेकिन दूसरी अवस्था के बारे में ऐसा नहीं कहते। यहाँ वह भय महसूस करते हैं और कहते हैं कि आशा करता हूँ कि जन्नत मिल जाती। क्योंकि जन्नत के बारे में विश्वास के साथ कुछ कहना बहुत मुश्किल है। फिर उसके बाद उनके जीवन में तीसरी परिस्थिति आई। वह कई क्षेत्रों के अमीर तथा कई युद्धों के सेना नायक बने। मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु-वगैरा वाली युद्ध के दौरान कई घटनाएँ घटीं। फिर, वह अरब के एक चतुर व्यक्ति के रूप में भी प्रसिद्ध थे। वह कहते हैं कि बीच की अवस्था के बाद जो घटनाएँ घटीं, उन्हें देखते हुए डर लगता है कि कहीं उनके कारण मेरे सारे अच्छे कार्य दाँव पर न लग जाएँ। फिर उन्होंने वसीयत की कि जब वह मर जाएँ, तो उनके साथ कोई नौहा-मातम करने वाली न जाए। उसके बाद आदेश दिया कि जब उनको दफ़न कर दिया जाए, तो वे उनकी क़ब्र के पास एक ऊँट ज़बह कर उसका मांस बाँटने के बराबर समय तक रुके रहें। ताकि वह इतनी देर में उन फ़रिश्तों का उत्तर दे लें, जो मुर्दे को दफ़न कर दिए जाने के बाद उसके पास आते हैं। क्योंकि मुर्दे को दफ़न कर दिए जाने के बाद उसके पास दो फ़रिश्ते आते हैं और उसे उसकी क़ब्र में बिठाने के बाद उससे तीन प्रश्न करते हैं। उससे पूछते हैं कि तेरा रब कौन है, तेरा धर्म क्या है और तेरा नबी कौन है? यहाँ अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अपने परिवार के लोगों को आदेश दिया कि उनको दफ़न करने के बाद उनकी क़ब्र के पास एक ऊँट ज़बह करके उसका मांस बाँटने के बराबर समय तक रुके रहें, ताकि वह उनसे इतनी देर घुले-मिले रहें। इससे मालूम होता है कि मरा हुआ व्यक्ति अपने परिवार की उपस्थिति को महसूस करता है। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की एक अन्य हदीस में आया है कि मरा हुआ व्यक्ति दफ़ने के बाद लौटने वाले लोगों के जूतों की चाप सुनता है। एक हसन हदीस से साबित है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब मरे हुए व्यक्ति को दफ़न कर देते, तो उसकी क़ब्र के पास खड़े हो जाते और कहते : "अपने भाई के लिए क्षमायाचना करो और सुदृढ़ रहने की दुआ करो, क्योंकि इस समय उससे प्रश्न हो रहे हैं।" अतः मुसतहब यह है कि मुर्दे को दफ़न करने के बाद आदमी उसकी क़ब्र के पास खड़ा हो जाए और कहे : "ऐ अल्लाह! इसे सुदृढ़ रख, ऐ अल्लाह! इसे सुदृढ़ रख, ऐ अल्लाह! इसे सुदृढ़ रख, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे, ऐ अल्लाह! इसे क्षमा कर दे।" क्योंकि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जब सलाम करते, तो तीन बार सलाम करते थे और जब दुआ करते, तो तीन बार दुआ करते थे। सारांश यह कि अम्र बिन आस -रज़ियल्लाहु अनहु- के बेटे ने उनसे कहा कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने आपको जन्नत का सुसमाचार सुनाया है, जो अच्छी बात की खुशख़बरी देने और मुबारकबाद पेश करने के दायरे में आता है।
अबू मूसा अशअरी (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास उस समय पहुँचा, जब आप एक ताज़ा मिसवाक से दाँत साफ़ कर रहे थे। वह कहते हैंः मिसवाक का एक किनारा आपकी ज़ुबान पर था और आप उसे मुँह में लेकर ओ, ओ कर रहे थे। ऐसा प्रतीत हो रहा था, जैसे आप उलटी कर रहे हों।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू मूसा अशअरी कहते हैं कि वह नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए, तो देखा कि आप ताज़ा मिसवाक से दाँत साफ़ कर रहे हैं, क्योंकि इससे सफ़ाई अधिक होती है। वह मुँह के भीतर टूटती भी नहीं है कि किसी प्रकार का कष्ट हो। आप मिसवाक को जीभ पर रखकर इस तरह मिसवाक करने में अत्युक्ति कर रहे थे कि लग रहा था कि जैसे उल्टी कर रहे हों।