





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फलों को प्रयोग के लायक़ होने से पहले बेचने से मना किया है। आपने बेचने वाले और ख़रीदने वाले दोनों को मना किया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फलों को उस समय तक बेचने से मना फऱमाया है, जब तक उनके पकने के लक्षण दिखने न लगें। आपने इससे बेचने तथा ख़रीदने वाले दोनों को मना किया है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जो व्यक्ति हलाल की कमाई से खजूर के बराबर भी कोई वस्तु सदक़ा करता है और वैसे भी अल्लाह केवल हलाल वस्तु ही को स्वीकार करता है, तो अल्लाह उसे अपने दाहिने हाथ से ग्रहण करता है और फिर उसे सदक़ा करने वाले के लिए उसी प्रकार बढ़ाता जाता है, जिस प्रकार तुममें कोई घोड़े के बच्चे की परवरिश करता है, यहाँ तक कि वह पहाड़ के समान हो जाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जिसने खजूर के मूल्य के बराबर भी कोई हलाल चीज़ दान की, जो मिलावट एवं धोखाधड़ी से पवित्र हो, हालाँकि अल्लाह केवल स्वच्छ एवं हलाल वस्तु ही को ग्रहण करता है, तो उसे अल्लाह अपने दाएँ हाथ से ग्रहण करता है। ज्ञात हो कि दाएँ हाथ से ग्रहण करने की बात उसी तरह मान ली जाएगी, जैसे बयान हुई है। पवित्र एवं महान अल्लाह यह काम अपने प्रताप एवं महिमा के अनुरूप करेगा। हम हदीस के इन शब्दों तथा इनके अर्थ से कोई छेड़छाड़ नहीं करेंगे। ज्ञात हो कि यहाँ ग्रहण करने से मुराद दान करने वाले से लेना है, जैसा कि मुस्लिम की रिवायत में है। फिर उसे अल्लाह उसी प्रकार बढ़ाता और उसके प्रतिफल को गुना दर गुना बढ़ाता रहता है, जैसा तुममें से कोई अपने घोड़े का लालन-पालन करता है, यहाँ तक कि वह बड़ा हो जाता है।
अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : हम लोग अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ थे कि इसी दौरान आपने फ़रमाया : "तुममें से जो शादी की शक्ति रखता है, वह शादी कर ले। क्योंकि शादी निगाहों को नीचा रखने तथा शर्मगाह की सुरक्षा का एक प्रमुख कारण है। और जो शादी न कर सके, वह रोज़ा रख लिया करे, क्योंकि रोज़ा कामवासना को दुर्बल करने का काम करता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने संभोग एवं निकाह के खर्च उठाने की शक्ति रखने वाले सभी लोगों को शादी करने की प्रेरणा दी है। क्योंकि निकाह कर लेने के बाद इन्सान की नज़र एवं शर्मगाह हराम चीज़ों से अधिक सुरक्षित हो जाती है और बेहयाई के कामों में पड़ने की संभावना घट जाती है। अगर किसी के पास निकाह का खर्च उठाने की शक्ति न हो और वह संभोग की क्षमता रखता हो, तो उसे रोज़ा रखना चाहिए, क्योंकि रोज़ा काम-वासना को घटाने का काम करता है।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जब तुममें से कोई लोगों को नमाज़ पढ़ाए, तो हल्की पढ़ाए। क्योंकि उनके अंदर दुर्बल, रोगी तथा ज़रूरतमंद भी होते हैं। हाँ, जब अकेला नमाज़ पढ़े, तो जितनी चाहे, लंबी करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इमामों को आदेश दिया है कि सुन्नत पर अलम करते हुए नमाज़ हल्की पढ़ाया करें। आपने इसका कारण यह बयान किया कि उनके पीछे शारीरिक रूप से दुर्बल, निर्बल, बीमार और हाजतमंद लोग भी हुआ करते हैं। हाँ, यदि अकेले नमाज़ पढ़ें, तो चाहें तो लंबी नमाज़ पढ़ें या चाहें तो हल्की पढ़ें।
उक़बा बिन आमिर जुहनी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "तुम लोग औरतों के यहाँ प्रवेश करने से बचो।" यह सुन एक अंसारी व्यक्ति ने पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! पति के निकट के रिश्तेदार (पति के भाई एवं चचेरे भाई आदि) के बारे में आप क्या फ़रमाते हैं? आपने फ़रमाया : "पति का निकट का रिश्तेदार तो मौत है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अजनबी औरतों के साथ घुलने-मिलने से मना फ़रमाया है। फ़रमाया कि खुद को इस बात से बचाओ कि औरतों के पास जाओ और औरतें तुम्हारे पास आएँ। यह सुन एक अंसारी व्यक्ति ने पूछा : पति के रिश्तेदारों, जैसे उसके भाई, भतीजे, चचा, चचेरे भाई, भांजे आदि, जिनसे शादीशुदा न होने की अवस्था में उसकी शादी जायज़ होती, के बारे में आपका क्या ख़्याल है? अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उत्तर दिया : उनसे उसी तरह सावधान रहो, जिस तरह मौत से सावधान रहते हो। क्योंकि पति के रिश्तेदारों के साथ तनहाई में मिलना-जुलना दीनी फ़ितने एवं विनाश का सबब बनता है। अतः पति के पिता और बेटों को छोड़ उसके अन्य रिश्तेदार अजनबी पुरुषों की तुलना में इस बात के अधिक हक़दार हैं कि उनसे घुलने-मिलने से मना किया जाए। क्योंकि अजनबियों की तुलना में उनके साथ एकांत में रहने के अवसर अधिक प्राप्त होते हैं और उनसे बुराई एवं फ़ितने की संभावना भी अधिक रहती है। ऐसा इसलिए कि औरत तक उनकी पहुँच आसानी से हो जाती है, कभी-कभी उनके साथ एकांत में रहना ज़रूरी हो जाता है, और उन्हें स्त्री के पास आने से रोका भी नहीं जा सकता, क्योंकि इस बारे में नरमी बरतने का रिवाज है। इसलिए कई बार देवर एवं भाभी एकांत में रह जाते हैं, इसलिए इसे मौत जैसी बुरी एवं नष्ट कर देने वाली चीज़ बताया गया है। जबकि अजनबी पुरुष का मामला अलग है, उससे आम तौर पर सावधान ही रहा जाता है।
मालिक बिन औस बिन हदसान से रिवायत है, वह कहते हैं : मैं यह कहते हुए आया कि हमें दीनार से दिरहम बदलकर कौन देगा? चुनांचे तलहा बिन उबैदुल्लाह ने, जो उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- के पास मौजूद थे, कहा : मुझे अपना सोना दिखाओ और उसके बाद आओ, जब हमारा सेवक आ जाएगा, तो हम तुम्हें तुम्हारी चाँदी दे देंगे। यह सुनकर उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा : अल्लाह की क़सम, ऐसा नहीं हो सकता, या तो तुम उसे उसकी चाँदी दे दो या फिर उसका सोना वापस कर दो। क्योंकि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "चाँदी सोने के बदले में अगर नक़द न हो तो सूद हो जाता है। गेहूँ, गेहूँ के बदले में अगर नक़द न हो तो सूद हो जाता है। जौ, जौ के बदले में अगर नक़द न हो, तो सूद हो जाता है। खजूर, खजूर के बदले में अगर नक़द न हो, तो सूद हो जाता है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैताबेई मालिक बिन औस बता रहे हैं कि उनके पास कुछ सोने के दीनार थे, जिन्हें वह चाँदी के दिरहम से बदलना चाहते थे। अतः तलहा बिन उबैदुल्लाह ने उनसे कहा कि आप ज़रा मुझे अपने दीनार दें कि मैं उन्हें देख लूँ। फिर ख़रीदने का इरादा बन गया, तो फ़रमाया कि जब हमारे सेवक आए, तो आप आ जाएँ, हम आपको चाँदी के दिरहम दे देंगे। वहाँ उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- भी मौजूद थे। चुनांचे उन्होंने इस तरह के लेन-देन को ग़लत बताया और तलहा से अल्लाह की क़सम देकर कहा कि वह या तो चाँदी अभी दे दें या फिर लिया हुआ सोना वापस कर दें। उन्होंने इसका कारण यह बताया कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : सोने को चाँदी से या चाँदी को सोने से बेचना हो तो लेन-देन हाथों हाथ होना चाहिए, वरना लेन-देन सूद वाला हो जाएगा, जिसकी वजह से ख़रीद-फ़रोख़्त हराम हो जाएगी। सोने को चाँदी के बदले में या चाँदी को सोने के बदले में बेचना उसी समय ठीक होगा, जब लेनदेन हाथों-हाथ हो और दोनों ओर से क़ब्ज़ा हो जाए। इसी तरह गेहूँ को गेहूँ के बदले, जौ को जौ के बदले और खजूर को खजूर के बदले बेचना उसी समय दुरुस्त होगा, जब वज़न एवं माप बराबर हो और उसी समय दोनों अपने-अपने सामानों पर क़ब्ज़ा कर लें। इन चीज़ों में न तो एक तरफ़ नक़द और एक तरफ़ उधार को जायज़ कहा जा सकता है और न क़ब्ज़े से पहले एक-दूसरे से अलग हो जाने की अनुमति दी जा सकती है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस बात से मना किया है कि कोई नगर का रहने वाला किसी देहात में रहने वाले का सामान बेचे (तथा फ़रमाया कि) तुम आपस में दाम न बढ़ाओ तथा कोई अपने भाई के सौदे पर सौदा न करे और न उसके विवाह-संदेश पर अपना विवाह-संदेश भेजे एवं कोई स्त्री अपनी बहन की तलाक़ न माँगे कि उसकी थाली में जो कुछ है, उसे उंडेल ले।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इसलाम हर उस चीज़ को ख़त्म करना चाहता है, जो मुस्लिम समाज में शत्रुता और द्वेष की भावना बढ़ाती है। इसलाम की यह इच्छा इस हदीस से भी स्पष्ट होकर सामने आती है। इस हदीस में ख़रीदने के इरादे नहीं, बल्कि बेचने वाले को लाभ अथवा ख़रीदने वाले को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से सामान का भाव बढ़ाने से मना किया गया है। इसका कारण यह है कि इसका आधार झूठ, ख़रीदने वालों के साथ धोखा तथा अनैतिक तरीक़े से सामान का दाम बढ़ाने पर है। इसी तरह इस बात से मना किया है कि नगर का रहने वाला देहात में रहने वाले का सामान बेचे; क्यों कि वह सामान का पूरा दाम ले लेगा और कोई कमी नहीं रहने देगा कि ख़रीदने वालों को कुछ फ़ायदा हो। जबकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया हैः "लोगों को अपने हाल पर छोड़ दो कि अल्लाह उनमें से किसी को किसी से रोज़ी दे।" सच्चाई यह है कि जब ख़ुद सामान का मालिक उसे बेचेगा, तो अपने हिसाब से दाम लेगा और ख़रीदने वालों को कुछ न कुछ राहत मिलेगी। यह भी हराम है कि आदमी अपने भाई के विवाह-संदेश पर विवाह-संदेश दे, जब तक यह न जान ले कि संदेश भेजने वाले के संदेश को नकार दिया गया है। क्योंकि इससे भी शत्रुता और द्वेश की भावना बढ़ती है और यह एक तरह से किसी को उसकी रोज़ी से वंचित करने का प्रयास भी है। इसी तरह एक स्त्री के लिए जायज़ नहीं है कि वह अपने पति से, अपनी सौतन को तलाक़ देने का मुतालबा करे, उसे उसके विरुद्ध भड़काए या दोनों के बीच कटुता पैदा करने का प्रयास करे कि दोनों एक-दूसरे से अलग हो जाएँ। यह एक हराम कार्य है। क्योंकि इसमें बहुत-सी बुराइयाँ हैं, जैसे दुश्मनी का बीज बोना, ईर्ष्या का वातावर्ण बनाना और अपनी बहन को उसकी रोज़ी से महरूम करना, जिसकी ओर इशारा 'उसके हिस्से की भलाई को उंडेल लेने' के वाक्य के माध्यम से किया गया है और जो निकाह के नतीजे में खिलाने-पिलाने, पहनाने और अन्य वैवाहिक अधिकारों के रूप में प्राप्त होती है।
अबू मिनहाल कहते हैं कि मैंने बरा बिन आज़िब और ज़ैद बिन अरक़म से सोने को चाँदी के बदले में बेचने के संबंध में पूछा तो दोनों में से हर एक दूसरे के बारे में यह कहने लगे कि वह मुझसे बेहतर हैं तथा दोनों कह रहे थे कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सोने को चाँदी के बदले में उधार बेचने से मना फ़रमाया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू मिनहाल ने बरा बिन आज़िब और ज़ैद बिन अरक़म -रज़ियल्लाहु अंहुमा- से 'सर्फ़' अर्थात नक़द को नक़द के बदले बेचने के बारे में पूछा। लेकिन दोनों सहाबा की परहेज़गारी देखिए कि दोनों फ़तवा देने का काम एक-दूसरे पर टालते रहे और ख़ुद को दूसरे की तुलना में कमतर बताते रहे। हाँ, दोनों एक बात पर एकमत थे कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने सोने को चाँदी के बदले में उधार बेचने से मना किया है। क्योंकि दोनों सूदी वस्तुएँ हैं। अतः, मामला जिस बैठक में तय हुआ है, उसी बैठक में क़ब्ज़ा हो जाना ज़रूरी है। वरना, मामला शरीयत की नज़र में वैध नहीं होगा और उधार के कारण सूद का मामला क़रार पाएगा। ज्ञात हो कि सूद (ब्याज), धन संबंधी एक हराम लेनदेन है। और इसके दो प्रकार हैं; प्रथमः उधार का ब्याजः इससे आशय यह है कि क़र्ज़ के परिमाण को, जिसे पहले अदा करना था, उसकी अवधि में इज़ाफ़े के बदले में बढ़ा दिया जाए। द्वितीयः क्रय-बिक्रय का ब्याजः इससे आशय है विशेष वस्तुओं की ख़रीद-बिक्री के समय, जिन्हें सूदी वस्तु कहा जाता है, जैसे गेहूँ के बदले गेहूँ और जौ के बदले जौ, एक को अधिक देना या देर से अदा करना।
अबू बकरा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने चाँदी को चाँदी के बदले में और सोने को सोने के बदले में बेचने से मना फ़रमाया है। हाँ, यदि बराबर हो तो कोई बात नहीं है। और हमें आदेश दिया है कि हम चाँदी को सोने के बदले, जिस तरह चाहें खरीदें और सोने को चाँदी के बदले जिस तरह चाहें, खरीदें। वर्णनकर्ता कहते हैं कि एक व्यक्ति ने पूछाः क्या हाथों हाथ? तो फ़रमायाः मैंने ऐसा ही सुना है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।चूँकि सोने को सोने के बदले और चाँदी को चाँदी के बदले कमी-बेशी के साथ बेचना सूद है, इसलिए आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इससे मना फ़रमाया है। हाँ, यदि दोनों बराबर हों, तो कोई बात नहीं है। रही बात सोने को चाँदी के बदले या चाँदी को सोने के बदले बेचने की, तो इसमें कोई हर्ज नहीं है, यद्यपि कमी-बेशी के साथ हो। अलबत्ता, इस मामले के सही होने के लिए अनिवार्य है कि जिस बैठक में मामला तय हुआ है, उसी बैठक में दोनों ओर से क़ब्ज़ा भी हो जाए। वरना, यह उधार का सूद क़रार पाएगा, जो कि हराम है। क्योंकि जब जिंस अलग-अलग हो, तो कमी-बेशी जायज़ होगी और क़ब्ज़े की शर्त बाक़ी रहेगी। क्योंकि दोनों के अंदर सूद का सबब एक है।