





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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उसमान रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब किसी मुसलमान के सामने फ़र्ज़ नमाज़ का समय आता है और वह अच्छी तरह वज़ू करके, पूरी विनयशीलता के साथ और अच्छे अंदाज़ में रुकू करके नमाज़ पढ़ता है, तो वह नमाज़ उसके पिछले गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती है, जब तक कोई बड़ा गुनाह न करे। ऐसा हमेशा होता रहेगा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जब किसी मुसलमान के सामने फ़र्ज़ नमाज़ का समय उपस्थित होता है और वह उसके लिए अच्छी तरह और पूरे तौर पर वज़ू करता है, इस तरह विनयशीलता के साथ नमाज़ पढ़ता है कि उसका दिल और उसके शरीर के अंग अल्लाह की ओर मुतवज्जेह हों और उसकी महानता को ध्यान में रखे हुए हों तथा नमाज़ के सारे कार्य जैसे रुकू एवं सजदे आदि पूरे तौर पर करता है, तो यह नमाज़ उसके पिछले छोटे-छोटे गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती है, जब तक वह किसी बड़े गुनाह में संलिप्त न हो। अल्लाह का यह अनुग्रह किसी काल खंड के साथ सीमित न होकर हर दौर और हर नमाज़ में व्याप्त है।
काब बिन उजरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "प्रत्येक फ़र्ज नमाज़ के पश्चात कही जाने वाली तसबीहों को कहने वाले -या उनका पालन करने वाले- नाकाम नहीं होंगे। अर्थात 33 बार सुबहानल्लाह, 33 बार अल-हम्दु लिल्लाह और 34 बार अल्लाहु अकबर।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैइस हदीस में अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुछ अज़कार के बारे में बात की है, जिन्हें पढ़ने वाला घाटे में नहीं रहता और शर्मिंदा नहीं होता। उसे उनका सवाब ज़रूर मिलता है। ये ऐसे शब्द हैं, जो एक-दूसरे के बाद आते और फ़र्ज़ नमाज़ों के बाद पढ़े जाते हैं। ये शब्द हैं : "सुबहानल्लाह" तैंतीस बार। इसका अर्थ यह है कि अल्लाह हर कमी एवं ऐब से पाक है। "अल-हमदु लिल्लाह" तैंतीस बार। यानी इस बात की घोषणा कि अल्लाह हर दृष्टिकोण से परिपूर्ण है, साथ ही उससे मोहब्बत करना और उसका सम्मान करना। "अल्लाहु अकबर" चौंतीस बार। यानी अल्लाह दुनिया की सारी चीज़ों से बड़ा, महान और शक्तिशाली है।
ज़ैद बिन ख़ालिद जुहनी (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो किसी रोज़ेदार को इफ़तार करवाता है, उसे भी रोज़ा रखने वाले के समान नेकी मिलती है और रोज़ेदार की नेकी में कोई कमी नहीं की जाती है।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।इस हदीस में रोज़ेदार को इफ़तार कराने की फ़ज़ीलत बयान की गई है, इस कार्य की प्रेरणा दी गई है और यह बताया गाय है कि जिसने किसी रोज़ेदार को इफ़तार कराया, उसके लिए रोज़ेदार के बराबर नेकी लिखी जाती है, लेकिन इससे रोज़ेदार की नेकी में कोई कटौती नहीं होती। यह दरअसल अल्लाह का अपने बंदों पर एक बड़ा अनुग्रह है, क्योंकि इसमें नेकी एवं धर्मपरायणता के कामों में परस्पर सहयोग और मुसलमानों के बीच प्रेम तथा सहजीवन की भावना निहित है। इस हदीस के ज़ाहिर से मालूम होता है कि किसी रोज़ेदार को इफ़तार कराने मात्र से, चाहे एक खजूर के द्वारा ही क्यों न हो, रोज़ेदार के बराबर सवाब मिल जाता है। इसलिए इन्सान को चाहिए कि जहाँ तक हो सके, रोज़ेदारों को इफ़तार कराने का प्रयास करे, विशेष रूप से उस समय जब रोज़ेदारों को इसकी ज़रूरत हो और वे निर्धन हों या फिर रोज़ेदार के पास इफ़तार का सामान तैयार करने के लिए आदमी न हो।
साद बिन अबू वक़्कास रज़ियल्लाहु अनहु कहते हैं कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "जो मुअज़्ज़िन को अज़ान देते हुए सुनकर कहता है : أشهد أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له وأنَّ محمداً عبده ورسولُه، رضيتُ بالله رباً وبمحمدٍ رسولاً وبالإسلام دِينا, (अर्थात मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और इस बात की भी गवाही देता हूँ कि मुहम्मद उसके बंदे और रसूल हैं। मैं अल्लाह को अपना रब मानकर, मुहम्मद को रसूल मानकर और इस्लाम को अपने धर्म के तौर पर स्वीकार कर खुश और संतुष्ट हूँ), उसके सारे गुनाह क्षमा कर दिए जाते हैं।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि जिसने मुअज़्ज़िन की अज़ान सुनकर यह दुआ पढ़ी : "أشهد أن لا إله إلا الله وحده لا شريك له" यानी मैं इस बात का इक़रार, एतराफ़ और ऐलान करता हूँ कि अल्लाह ही सत्य पूज्य है और उसके अतिरिक्त पूजी जाने वाली सारी चीज़ें बातिल हैं। "وأن محمدًا عبده ورسوله" तथा मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अल्लाह के बंदे हैं, लिहाज़ा उनकी बंदगी नहीं हो सकती और उसके रसूल हैं, इसलिए वह झूठ बोल नहीं सकते। "رضيت بالله ربًّا" यानी मैं अल्लाह के रब होने, इबादत का एकमात्र हक़दार होने और उसके नामों एवं गुणों से संतुष्ट हूँ। "وبمحمد رسولًا" यानी जिन शिक्षाओं के साथ आप भेजे गए हैं और जिन्हें आपने हम तक पहुँचाया है, मैं उनसे भी संतुष्ट हैं। "وبالإسلام" यानी आदेशों एवं निषेधों के रूप में पाए जाने वाले इस्लाम की तमाम शिक्षाओं से संतुष्ट हूँ। "دينًا" यानी एतक़ाद एवं आज्ञापालन के रूप में। "غفر له ذنبه" उसके तमाम छोटे गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
यज़ीद बिन तारिक़ कहते हैं कि मैंने अली -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- को मिंबर पर खुत्बा के दौरान कहते हुए सुना है : अल्लाह की क़सम, हमारे पास कोई ऐसी पुस्तक नहीं है, जिसे हम पढ़ते हों, सिवाय अल्लाह की किताब के और उसके जो कुछ इस सहीफ़े में लिखा है। फिर उन्होंने उसे खोला, तो उसमें दियत में दिए जाने वाले ऊँटों की आयु और कुछ ज़ख़्मों की दियत से संबंधित धर्मादेश दर्ज थे। साथ ही, उसमें यह भी लिखा था कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "मदीना ईर से लेकर स़ौर तक हरम है। इसमें जो व्यक्ति धर्म के नाम पर कोई नया काम करेगा या इस तरह का काम करने वाले किसी व्यक्ति को शरण देगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया। मुसलमानों का वचन एक ही होता है और उनका छोटे से छोटा व्यक्ति भी वचन दे सकता है। जो किसी मुस्लिम का दिया हुआ वचन तोड़ेगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया। जो व्यक्ति अपने पिता को छोड़कर किसी दूसरे की ओर निसबत करेगा अथवा अपने मुक्त करने वाले को छोड़कर दूसरे की ओर अपनी निसबत करेगा, उसपर अल्लाह, फ़रिश्तों एवं सारे लोगों की लानत है। क़यामत के दिन अल्लाह न उसकी तौबा क़बूल करेगा, न फ़िदया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अली -रज़ियल्लाहु अनहु- ने मिंबर पर खुतबा देते हुए कहा : अल्लाह की क़सम, अल्लाह की किताब के अतिरिक्त हमारे पास पढ़ने के लिए कोई किताब नहीं है। यदि कुछ है, तो बस यह सहीफ़ा। फिर उन्होंने उसे खोलकर दिखाया, तो उसमें दियत में दिए जाने वाले ऊँटों की आयु और ज़ख़्मों से संबंधित मसायल एवं अहकाम लखे हुए थे। साथ ही उसमें यह भी लिखा था कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि मदीना, मक्का की तरह ही हरम है,और मदीने में यह छेत्र ऐर पर्वत से सौर पर्वत तक है । अतः इसमें जो व्यक्ति धर्म के नाम पर कोई नया काम करेगा या कोई अपराध अथवा अत्याचार कर मुसलमानों को कष्ट पहुँचाने का सबब बनेगा या धर्म के नाम पर कोई नया काम करने वाले को शरण देगा, उसपर अल्लाह की लानत है कि वह उसे अपनी दया से वंचित कर देगा, फ़रिश्ते तथा सारे लोग उसे अल्लाह की दया से दूर किए जाने की दुआ करेंगे और अल्लाह क़यामत के दिन न उसकी फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत ग्रहण करेगा, न तौबा ग्रहण करेगा और न फ़िदया ग्रहण करेगा। जहाँ तक किसी मुसलमान द्वारा किसी काफ़िर को सुरक्षा देने की बात है, तो यह कुछ शर्तों के साथ सही है, जो प्रसिद्ध हैं। जब ये शर्तें पाई जाएँ, तो सुरक्षा प्राप्त काफ़िर से छेड़-छाड़ हराम होगी। अतः जो किसी मुसलमान द्वारा दी गई सुरक्षा का हनन करते हुए सुरक्षा प्राप्त काफ़िर से छेड़-छाड़ करेगा, उसपर अल्लाह की लानत है कि वह उसे अपनी दया से वंचित कर देगा, फ़रिश्ते तथा सारे लोग उसे अल्लाह की दया से दूर किए जाने की दुआ करेंगे और अल्लाह क़यामत के दिन न उसकी फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत ग्रहण करेगा, न तौबा ग्रहण करेगा और न फ़िदया ग्रहण करेगा। इसी तरह जो अपने पिता के अतिरिक्त किसी और से अपना संबंध जोड़ेगा या जो आज़ाद किया हुआ दास अपने मालिकों के अतिरिक्त किसी और की ओर स्वयं को सनसूब करेगा, उसपर अल्लाह की लानत है कि वह उसे अपनी दया से वंचित कर देगा, फ़रिश्ते तथा सारे लोग उसे अल्लाह की दया से दूर किए जाने की दुआ करेंगे और अल्लाह क़यामत के दिन न उसकी फ़र्ज़ इबादत ग्रहण करेगा, न नफ़ल इबादत ग्रहण करेगा, न तौबा ग्रहण करेगा और न फ़िदया ग्रहण करेगा। क्योंकि उसने नेमत की नाशुक्री की, मीरास तथा वली बनने के हक़ और दियत आदि से संबंधित अधिकारों का हनन किया तथा रिश्ता तोड़ने और संबंध विच्छेद करने का काम किया।
उक़बा बिन आमिर -रज़ियल्लाहु अन्हु- से मरफ़ूअन वर्णित है : "जिसने तीर अंदाज़ी सीखी, फिर उसे छोड़ दिया, वह हममें से नहीं है या उसने नाफ़रमानी की।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।जिसने तीर चलाना सीखा और इसी तरह जिहाद के आधुनिक उपकरणों का चलाना जैसे कि गोली चलाना सीखा, फिर उसे छोड़ दिया और उसकी उपेक्षा की, तो उसने खुद को पाप का भागी बनाया और अपने आपको नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के तरीक़ से दूर कर दिया। "वह हममें से नहीं है" यह एक गंभीर चेतावनी है, जो इंगित करती है कि यह अवज्ञा एक बड़ा पाप है, जो धमकी और डाँट-फटकार का पात्र है। "या उसने अवज्ञा की" यह वर्णनकर्ता की ओर से एक संदेह है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने ''वह हममें से नहीं है'' कहा था, या आपने ''उसने अवज्ञा की'' कहा था।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से मरफ़ूअन वर्णित है : "जो जिहाद किए बिना अथवा जिहाद के इरादे के बिना ही मर गया, वह मुनाफ़िक़ ही अवस्था में मरा।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।हर वह व्यक्ति जो जिहाद करने में सक्षम है और इस अवस्था में मर जाए कि उसने न तो जिहाद किया हो और न ही उसके बारे में अपने दिल में सोचा हो, अर्थात् उसने अपने दिल में जिहाद करने के बारे में बात नहीं की। इसका मतलब यह कि उसने जिहाद का संकल्प नहीं किया, तो उसके अंदर कुछ न कुछ निफ़ाक़ (पाखंड) है। जिहाद के संकल्प की एक ज़ाहिरी निशानी युद्ध के हथियार की तैयारी है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : (ولو أرادوا الخروج لأعدوا له عدة) "यदि वे निकलना चाहते, तो अवश्य ही उसके लिए कुछ तैयारी करते।" आपके शब्द : "مات على شُعْبَةٍ من نِفَاقٍ" (वह निफ़ाक़ की एक शाखा पर मर गया) : अर्थात् : एक प्रकार के निफ़ाक़ की अवस्था में मरा। मतलब यह कि : जो इस अवस्था में मरा, वह मुनाफ़िक़ों तथा जिहाद से पीछे रहने वालों के समान हो गया। तथा जो किसी जाति की समानता अपनाए, वह उन्हीं में से है। अतः हर मुसलमान को जिहाद की नीयत रखनी चाहिए। जिहाद करने से अभिप्राय : जिहाद की शर्तों के साथ जिहाद करना है। यदि वे (शर्तें) पाई जाएँ, तो जिहाद किया जाएगा, अन्यथा उसकी नीयत बाक़ी रहेगी यहाँ तक कि जिहाद के कारण पाए जाएँ।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : “कोई ऐसा दिन नहीं, जिसमें अल्लाह जहन्नम से उतने बंदों को मुक्त करता हो, जितने बंदों को अरफ़ा के दिन मुक्त करता है। वह निकट आ जाता है और फ़रिश्तों के सामने उनपर गर्व करते हुए कहता है : यह लोग क्या चाहते हैं?”
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह अरफ़ा के दिन जितने लोगों को जहन्नम से मुक्ति प्रदान करता है, उतने किसी और दिन नहीं करता। इसी तरह अल्लाह अपने हज करने वाले बंदों को अपनी वास्तविक निकटता प्रदान करता है, उनपर फ़रिश्तों के सामने अभिमान करता है और फ़रिश्तों पर हाजियों की फ़ज़ीलत एवं प्रतिष्ठा को प्रकट करता है। अह्ल-ए-सुन्नत व जमात का अक़ीदा है कि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह अपने बंदों से, अपनी महानता एवं प्रताप के अनुरूप, वास्तविक रूप से निकट है। वह अपने अर्श के ऊपर है, अपनी सृष्टि से अलग है, वास्तविक रूप से बंदों के निकट एवं क़रीब आता है। अल्लाह कहता है : यह लोग क्या चाहते हैं कि अपने घर-परिवार को छोड़े हुए हैं, अपना धन खर्च कर रहे हैं और अपने शरीर को थका रहे हैं? यानी इनका उद्देश्य केवल क्षमा, अल्लाह की प्रसन्नता, उसकी निकटता और उससे मिलने का सौभाग्य प्राप्त करना है। अतः उनका उद्देश्य ज़रूर पूरा होगा और उन्हें उनकी नीयतों के अनुरूप श्रेणियाँ प्राप्त होंगी।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा : ऐ अल्लाह के रसूल! हम समुद्री यात्रा पर निकलते हैं और हमारे साथ थोड़ा-सा पानी होता है। उससे वज़ू कर लें, तो प्यासे रह जाएँगे। ऐसे मे क्या हम समुद्र के पानी से वज़ू कर लिया करें? अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उत्तर दिया : "समुद्र का पानी स्वयं पाक है एवं दूसरों को पाक करने वाला है और उसका मरा हुआ जानवर हलाल है।"
इस ह़दीस़ को अबू दावूद, तिर्मिज़ी, नसई, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैएक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर कहा : हम शिकार, व्यवसाय एवं इस प्रकार के दूसरे उद्देश्यों के तहत कश्तियों पर सवार होकर समुद्र का सफ़र करते हैं। हमारे पास पीने का पानी बस थोड़ा-सा होता है। अगर हम उसका प्रयोग वज़ू एवं स्नान में करेंगे, तो वह ख़त्म हो जाएगा और पीने का पानी नहीं बचेगा। ऐसे में क्या हमारे लिए समुद्र के पानी से वज़ू करन जायज़ होगा।? तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने समुद्र के पानी के बारे में फ़रमाया : उसका पानी खुद भी पाक है और उसके अंदर दूसरे को पाक करने की क्षमता भी मौजूद है। उससे वज़ू एवं स्नान जायज़ हैं। उससे निकलने वाली मछलियों आदि का खाना भी जायज़ है, यद्यपि वह मरी हुई अवस्था में पानी के ऊपर तैरती हुई ही क्यों न पाई जाएँ, किसी ने उनका शिकार न भी किया हो, तब भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।