Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way






























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अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस बात से सावधान किया है कि कोई महिला अपने वलियों (अभिभावकों) की अनुमति के बिना शादी कर ले। आपने इस प्रकार के निकाह को बातिल (अवैध) कहा है और इस वाक्य को तीन बार दोहराया है। गोया यह निकाह हुआ ही नहीं। अगर महिला से वली की अनुमति के बिना निकाह करने वाले व्यक्ति ने उसके साथ एकांतवास कर लिया, तो महिला को पूरा महर मिलेगा। अतः यदि उस व्यक्ति ने उस (स्त्री) से सहवास कर लिया हो जिससे उसने उसके 'वली' (अभिभावक) की अनुमति के बिना विवाह किया था; तो उस (स्त्री) का पूरा 'महर' (हक़) है, उस शारीरिक मिलन के कारण जो उसने उससे किया है। फिर अगर निकाह का वली बनने के संंबंध में वलियों के बीच मतभेद हो जाए और सारे वली एक ही श्रेणी के हों, तो उस वली का किया हुआ निकाह दुरुस्त होगा, जो पहले निकाह कराए, जब उसने निकाह औरत के हितों को ध्यान में रखते हुए कराया हो। अगर वली निकाह कराने से मना कर दे, तो यह माना जाएगा कि उस औरत का कोई वली नहीं है। ऐसे में शासक या उसकी ओर से नियुक्त अधिकारी, जैसे क़ाज़ी आदि, उसके वली होंगे। इससे अलग प्रस्तिथि में वली के होते हुए शासक के पास वली बनने का अधिकार नहीं है।
यह हदीस बताती है कि स्त्री निकाह में वली नहीं बन सकती। न अपने निकाह में और न किसी और के निकाह में। जिस निकाह में कोई स्त्री स्वयं अपनी शादी कराए, वह अवैध निकाह है। जहाँ तक इस हदीस के शब्द : "ऐसी महिला जो स्वयं अपना विवाह कर लेती है वह ज़ानिया (दुराचारी) है" की बात है, तो ये शब्द अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- के हैं। वह कहना यह चाहते हैं कि निकाह कराने की ज़िम्मेवारी किसी स्त्री का उठाना दरअसल दुराचारी महिला का काम है। वली के बिना निकाह होना ही नहीं चाहिए।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- अपनी पत्नी के साथ गुदा में संभोग करने के संबंध में चेतावनी देते हुए कहते हैं कि जो व्यक्ति ऐसा करता है उसे अल्लाह की दया से दूर कर दिया जाता है। वस्तुतः गुदा मैथुन एक बहुत बड़ा पाप है।
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक बहुत ही गंभीर चेतावनी देते हुए कहा कि अल्लाह उस व्यक्ति को दया की दृष्टि से नहीं देखेगा, जो किसी पुरुष के साथ गुदा या किसी महिला के साथ गुदा में संभोग करता है। यह कृत्य सबसे बड़े पापों में से एक है।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से पूछा गया कि पति पर पत्नी के क्या अधिकार हैं, तो आपने उत्तर में कुछ चीज़ें बताईं, जैसे : 1- उसे छोड़कर ख़ुद न खाओ। जब-जब खाओ, उसे भी खिलाओ। 2- उसे छोड़कर खुद न पहनो। जब कमाओ, सामर्थ्य हो और खुद पहनो, तो उसे भी पहनाओ। 3- उसे बिना किसी कारण और ज़रूरत के न मारो। अगर अदब सिखाने के लिए या उसकी ओर से कुछ कर्तव्यों के निर्वहन में होने वाली कोताही के कारण मारने की ज़रूरत पड़ जाए, तो मार कष्टदायक नहीं होनी चाहिए तथा चेहरे पर नहीं मारा जाना चाहिए। क्योंकि चेहरा शरीर का सबसे महत्वपूर्ण और हमेशा सामने दिखने वाला भाग और उसमें कई नाज़ुक अंग भी हैं। 4- गाली-गलोज मत करो। यह मत कहो कि अल्लाह तेरे चेहरे को कुरूप कर दे। कोई ऐसी बद-दुआ न करो, जिसमें चेहरे या शरीर के किसी भाग को कुरूप करना शामिल हो। क्योंकि इन्सान के शरीर एवं चेहरे की रचना अल्लाह ने की है और उसी ने उसे सुंदर शक्ल एवं सूरत दी है, जबकि रचना को दोष देना दरअसल रचयिता को दोष देना है। 5-औरत को जब अलग करो तो केवल बेड-रूम में उसका बिस्तर अलग कर दो और उसे छोड़ कर कहीं और न जाओ , और न ही उसे दूसरे घर भेजो। क्योंकि पति-पत्नी के बीच अकसर ऐसा होता हुआ दिख जाता है।
इस हदीस में बताया गया है कि जब स्त्री को उसका पति संभोग के लिए बुलाए, तो वह उसकी बात मान ले, वरना फ़रिश्तों की लानत की अधिकारी बन जाएगी। लेकिन ऐसा उस समय होगा, जब पति बात न मानने से नाराज़ हो जाए, जैसा कि बुख़ारी की रिवायत में उल्लिखित है। अगर वह इससे नाराज़ नहीं होता, तो कोई हर्ज नहीं है। इसी तरह, यदि पत्नी के पास कोई शरई कारण हो, मसलन बीमार हो और संभोग के लिए सक्षम न हो या किसी अन्य उचित कारण की वजह से बिस्तर में जा न सके, तब भी कोई हर्ज नहीं है। परन्तु, यदि इस प्रकार की कोई बात न हो, तो उसके पास जाना और उसकी बात मानना ज़रूरी होगा। फिर जब पत्नी पर पति के अधिकार के संबंध में इस प्रकार की बात है, तो पति को भी चाहिए कि जब पत्नी के अंदर संभोग की इच्छा देखे, तो उसकी इच्छा पूरी करे। क्योंकि अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तथा उनके साथ उचित व्यवहार करो।"
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने निम्नलिखित चार प्रकार के लोगों के लिए अल्लाह की दया से धुतकारे जाने की बद-दुआ की है : 1- अपने या किसी दूसरे के बाल में किसी दूसरे का बाल जोड़ने वाली। 2- किसी से अपने बाल में किसी दूसरे का बाल जोड़ देने का आग्रह करने वाली। 3- गोदने वाली, जो शोभा तथा सुंदरता के लिए चेहरे, हथेली या सीना आदि शरीर के किसी अंग में सूई चुभाकर वहाँ सुर्मा आदि डाल देती है, ताकि वह स्थान नीला या हरा पड़ जाए। 4- किसी दूसरे से गोदने का आग्रह करने वाली। ये सारे कार्य बड़े गुनाहों के दायरे में आते हैं।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमा रहे हैं कि जिस व्यक्ति की एक से अधिक पत्नियाँ हों और उनके बीच उन बातों में न्याय न करे जिनमें न्याय कर सकता हो , मसलन ख़र्च, रहने-सहने के लिए घर की उपलब्धता, वस्त्र एवं रात बिताने में बराबरी न करे, तो क़यामत के दिन उसकी सज़ा यह होगी कि उसके शरीर का आधा भाग झुका हुआ होगा। बिलकुल उसी तरह, जैसे अपने व्यवहार में एक ओर झुका हुआ था।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि एक मुसलमान के दिल में आने वाले बुरे ख़्यालों की बिना पर उस समय तक उसकी पकड़ नहीं होगी, जब तक उनपर अमल न किया जाए या उनको ज़बान पर न लाया जाए। क्योंकि इस प्रकार के ख़्यालात माफ़ हैं। यह अल्लाह का अनुग्रह है कि मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के उम्मती के ज़ेहन में तैरने वाले और उसके दिल में पैदा होने वाले ख़्यालों को उस समय तक पकड़ के लायक़ क़रार नहीं दिया है, जब तक दिल के अंदर बैठ न जाएँ और दिल उनसे संतुष्ट न हो जाए। अगर अहंकार, घमंड और निफ़ाक़ आदि बुरे ख़्यालात दिल में बैठ जाएँ, और इन्सान अपने शरीर के अंगों द्वारा उनपर अमल कर ले या ज़बान से उनका इज़हार कर दे, तो पकड़ के योग्य होंगे।