





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि हम अज़्ल (संभोग के दौरान वीर्यस्खलन से पहले लिंग को बाहर निकाल लेना, ताकि अंदर वीर्यस्खलन न हो) करते थे, जबकि क़ुरआन उतर रहा था। सुफ़यान कहते हैं कि यदि यह कोई मना करने योग्य काम होता तो क़ुरआन हमें इससे रोक देता।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जाबिर बिन अब्दुल्लाह (ज़ियल्लाहु अंहु) बता रहे हैं कि वे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के युग में अपनी पत्नियों तथा दासियों के साथ अज़्ल करते थे और आपने इसे स्वीकार्यता प्रदान की थी, हालाँकि यदि वह जायज़ न होता, तो आप उसे स्वीकार्यता प्रदान न करते। फिर शायद उनसे कहा गया कि संभव है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को तुम्हारे इस कार्य का पता ही न चला हो? तो फ़रमायाः अगर आपको पता न चला हो, तो अल्लाह को तो पता था। वह क़ुरआन उतरने का समय था। ऐसे में अगर अज़्ल करना मना होता, तो क़ुरआन ही उससे मना कर देता और अल्लाह हमें उसकी स्वीकार्यता प्रदान न करता। जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) की यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि अज़्ल जायज़ है। जबकि कई अन्य हदीसों से पता चलता है कि जायज़ नहीं है। जैसे सहीह मुस्लिम मे जुज़ामा बिंत बह्ब की हदीस में है कि वह कुछ लोगों के साथ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आईं और उन लोगों ने आपसे अज़्ल के बारे में पूछा, तो आपने फ़रमायाः "यह गुप्त हत्या है।" ऐसे में प्रश्न उठता है कि इन हदीसों की एक साथ व्याख्या कैसे की जाएगी? तो उसका उत्तर इस प्रकार हैः असल में यह जायज़ है, जैसा कि जाबिर और अबू सईद (रज़ियल्लाहु अंहुमा) की हदीस से पता चलता है। अलबत्ता, जुज़ामा (रज़ियल्लाहु अंहा) की हदीस उस स्थिति के लिए है, जब अज़्ल का उद्देश्य संतान से बचना हो। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के कथन 'यह गुप्त हत्या है' से भी इसी का इशारा मिलता है। या फिर यह भी हो सकता है कि अज़्ल हराम नहीं बल्कि मकरूह हो।
उम्मे अतिय्या (रज़ियल्लाहु अनहा) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करती हैं कि कोई स्त्री मृतक पर तीन दिनों से अधिक सोग नहीं मनाएगी। हाँ, अपने पति पर चार महीने दस दिन सोग मनाएगी। वह अस्ब नामी यमनी वस्त्र छोड़कर कोई रंगा हुआ कपड़ा नहीं पहनेगी तथा सुरमा एवं ख़ुशबू नहीं लगाएगी। हाँ, जब पाक हो जाए तो कु़स्त या अज़फ़ार आदि खुशबूएँ लगा सकती है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने स्त्री को किसी भी मृत व्यक्ति पर तीन दिन से अधिक सोग मनाने से मना किया है; इसलिए कि किसी रिश्तेदार का हक़ अदा करने तथा शोक के माहौल से निकलने के लिए तीन दिन पर्याप्त हैं। लेकिन यदि मृत व्यक्ति उसका पति हो, तो उसके महत्वपूर्ण हक़ को अदा करने के लिए और उसकी इद्दत के दिनों को बचाए रखने के लिए चार माह दस दिन तक सोग मनाएगी। सोग मनाने का अर्थ यह है कि जिस स्त्री के पति का देहांत हो जाए, वह सुगंध, सुरमा, गहने और सुंदर कपड़े आदि शृंगार की वस्तुओं को त्याग दे और इनमें से किसी चीज़ का प्रयोग न करे। लेकिन पति के अतिरिक्त किसी और मृत व्यक्ति का सोग मनाना अनिवार्य नहीं है। हाँ, पति के अतिरिक्त किसी और के लिए यदि चाहे, तो तीन दिन सोग मना सकती है। जहाँ तक सोग मनाने वाली स्त्री के शृंगार के उद्देश्य के बिना रंगीन कपड़ा पहनने की बात है, तो इसमें कोई बात नहीं है, चाहे कपड़ा किसी भी रंग का हो। इसी तरह पवित्र होने के पश्चात अपने गुप्तांग में कोई भी बदबू दूर करने वाली वस्तु थोड़ी-थोड़ी लगा सकती है, क्योंकि यह शृंगार का स्थान नहीं है।
अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अनहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः सोना, सोने के बदले न बेचो, मगर बराबर-बराबर। एक को दूसरे से अधिक न करो। उसी तरह, चाँदी को चाँदी के बदले न बेचो, मगर बराबर-बराबर। एक को दूसरे से अधिक न करो। तथा इनमें से उपस्थित को अनुपस्थित के बदले न बेचो। तथा एक रिवायत में हैः परन्तु, यह कि हाथों-हाथ हो। एवं एक रिवायत में हैः परन्तु यह कि वज़न बराबर हो और दोनों एक समान तथा बराबर हों।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सूद के दोनों प्रकारों; दोनों में से एक वस्तु को अधिक देने अथवा बाद में अदा करने, से मना किया है। चुनांचे आपने सोने को सोने के बदले, चाहे दोनों ढले हुए हों या गैर ढले हुए, बेचने की अनुमति उसी समय दी है, जब दोनों वज़न में बराबर में हों और जिस मजलिस में मामला तय हुआ है, उसी मजलिस में दोनों पर क़बज़ा हो जाए; क्योंकि यदि दोनों में से एक उपस्थित हो और दूसरा अनुपस्थित तो मामला जायज़ नहीं होगा। इसी प्रकार चाँदी को चाँदी के बदले, वह ढला हुआ हो या ग़ैर ढला हुआ, उसी समय बेचना जायज़ है, जब वज़न बराबर हो और मामला तय होने की बैठक में ही दोनों पक्षों का क़ब्ज़ा हो जाए। इसमें कमी-बेशी जायज़ नहीं है और दोनों पक्षों की ओर से क़ब्ज़ा होने से पहले अलग होना भी जायज़ नहीं है।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमायाः किसी स्त्री तथा उसकी फूफी को विवाह के बंधन में एक साथ नहीं रखा जा सकता और न किसी स्त्री तथा उसकी ख़ाला को।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस पवित्र शरीयत में प्रत्येक प्रकार की भलाई निहित है और इसने प्रत्येक नुक़सान तथा बिगाड़ से युद्ध किया है। यही कारण है इसने प्रेम, मोहब्बत और दोस्ती की प्रेरणा दी है तथा एक दूसरे से दूरी बनाने, रिश्तों-नातों को काटने तथा द्वेष की भावना रखने से मना किया है। जब शरीयत ने, कुछ मसलहतों के मद्देनज़र जो कभी-कभी एक से अधिक पत्नी रखने का कारण बनती हैं, बहुविवाह की अनुमति दी और आम तौर पर एक व्यक्ति के यहाँ एक से अधिक पत्नियों का रहना शत्रुता और द्वेष का कारण बनता है, इसलिए कुछ निकट के रिश्तेदारों को एक साथ जमा करने से मना कर दिया, ताकि निकटवर्तियों के बीच रिश्ता ख़राब होने की नौबत न आने पाए। आपने एक बहन के होते हुए दूसरी बहन, भतीजी के होते हुए फूफी, खाला के होते हुए भांजी आदि से निकाह करने से मना किया है, जिनमें से एक को यदि पुरुष और दूसरे को स्त्री मान लिया जाए, तो नसबी रिश्ते के कारण निकाह सही न हो।दरअसल, यह हदीस अल्लाह तआला के इस फ़रमान की व्यापकता को सीमित कर देती हैः "وأحِلَّ لكم ما وَرَاءَ ذلِكم" (इनके अतिरिक्त अन्य स्त्रियों को तुम्हारे लिए हलाल किया गया है।)
ज़ैनब बिंत अबू सलमा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अनहा) के एक क़रीबी रिश्तेदार की मृत्यु हो गई तो उन्होंने पीले रंग की ख़ुशबू मँगवाकर अपने दोनों हाथों पर लगा लिया और कहाः मैं ऐसा इसलिए कर रही हूँ, क्योंकि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना हैः जो स्त्री अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखती है, उसके लिए उचित नहीं है कि किसी मृत व्यक्ति पर तीन दिन से अधिक सोग मनाए, सिवाए पति के; उसपर चार माह दस दिन सोग मना सकती है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अंहा) के पिता की मृत्यु हुई और उन्होंने सुन रखा था कि पति के सिवा किसी की मौत पर तीन दिन से अधिक सोग मनाना जायज़ नहीं है, इसलिए उन्होंने इसका पालन करके दिखाने का इरादा किया। चुनांचे ज़रदी मिली हुइ खुशबू मँगवाकर हाथों से मल लिया और इसका कारण यह बताया कि उऩ्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़रमाते हुए सुना हैः जो स्त्री अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान रखती हो, उसके लिए हलाल नहीं है कि किसी मृत पर तीन दिन से अधिक सोग मनाए, सिवाय पति के कि उसपर चार माह दस दिन सोग मनाएगी।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः कोई पड़ोसी अपने पड़ोसी को अपनी दीवार में लकड़ी गाड़ने से न रोके। फिर अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) फ़रमातेः क्या बात है किे मैं तुम्हें इस आदेश से मुँह फेरते हुए देखता हूँ? अल्लाह की क़सम! मैं इस आदेश को तुम्हारे बीच आम करके रहूँगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।पड़ोसी पर पड़ोसी के कुछ अधिकार हैं, जिन्हें अदा करना अनिवार्य है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार का आदेश दिया और फ़रमाया कि जिबरील आपको पड़ोसी के बारे में लगातार वसीयत करते रहे, यहाँ तक कि आपको लगने लगा कि पड़ोसी का हक़ इतना महत्वपूर्ण है और उसके साथ अच्छा व्यवहार इतना ज़रूरी है कि जिबरील एक पड़ोसी को दूसरे पड़ोसी का वारिस बना देंगे। पड़ोसियों के साथ अच्छा बर्ताव, अच्छे आचरण और पड़ोसियों के अधिकारों का ख़याल रखना तथा उनका एक-दूसरे को अपनी भाषा एवं कार्य द्वारा कष्ट देने से बचना ज़रूरी है। पड़ोसी के साथ अच्छे व्यवहार और उसके अधिकार का ख़याल रखने की एक सूरत यह है कि वे एक-दूसरे के हितों का ध्यान रखें, जब तक ख़ुद उन्हें उससे कोई बड़ा नुक़सान न हो। उदाहरण के तौर पर यदि कोई पड़ोसी अपने पड़ोसी की दीवार में लकड़ी गाड़ना चाहे और लकड़ी गाड़ने वाले को इसकी ज़रूरत हो तथा दीवार वाले को इससे कोई नुक़सान भी न हो, तो दीवार वाले के लिए ज़रूरी होगा कि उसे यह लाभ उठाने की अनुमति दे, जिससे उसके पड़ोसी की आवश्यकता पूरी हो जाएगी और उसका कोई नुक़सान भी नहीं हो रहा है। यदि वह अनुमति न दे, तो प्रशासन उसे इसपर बाध्य करेगा। लेकिन यदि उसे क्षति हो अथवा इसकी कोई आवश्यकता न हो, तो क्षति को उसी तरह की क्षति से दूर नहीं किया जाएगा। इसलिए कि मुसलामन के हक़ में असल यह है कि उसे कोई नुक़सान न पहुँचाया जाए। अतः, उसपर अनुमति देना अनिवार्य न होगा। यही कारण है कि जब अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) को अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की इस महत्वपूर्ण हदीस का आशय समझ में आया, तो इसका अनुपालन न करने वालों पर नाराज़ हुए और उन्हें इसपर मजबूर करने की धमकी दी; क्योंकि अल्लाह ने पड़ोसी के कुछ अधिकार दिए हैं, जिनका ध्यान रखना और पूरा करना अनिवार्य है। उलेमा इस बात पर एक मत हैं कि पड़ोसी की दीवार में लकड़ी लगाने से यदि उसे क्षति हो, तो उसकी अनुमति के बिना नहीं लगा सकते, इसलिए कि आपका फ़रमान हैः "न अकारण नुक़सान पहुँचाना सही है और न बदले में नुक़सान पहुँचाना सही है।"
अब्दुल्लाह बिन यज़ीद ख़त़्मी कहते हैं : मुझसे बरा ने हदीस बयान की -और वह झूठे नहीं हैं- उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब 'سمع الله لمن حمده' (समिअल्लाहु लिमन ह़मिदहु) कहते तो हममें से कोई अपनी पीठ नहीं झुकाता, यहाँ तक कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सजदे में चले जाते, फिर हम आपके बाद ही सजदे में जाते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैबरा बिन आज़िब रज़ियल्लाहु अन्हु, जो कि सच्चे हैं, बताते हैं कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम जब रुकू से अपना सर उठाते और 'سمع الله لمن حمده' (समिअल्लाहु लिमन ह़मिदहु) कहते, तो आपके पीछे खड़े लोग खड़े ही रहते थे और कोई भी सजदे के लिए अपनी पीठ उस वक़्त तक नहीं झुकाता था, जब तक कि आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपनी पेशानी ज़मीन पर न रख देते। आपके ज़मीन पर पेशानी रखने के बाद ही लोग सजदे में जाते थे।
आइशा (रज़ियल्लाहु अनहा) कहती हैं कि जब कोई व्यक्ति अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अपनी बीमारी के बारे में बताता या उसे कोई फोड़ा अथवा ज़ख्म होता, तो आप अपनी उंगली से इस तरह करते (सुफ़यान बिन उयैना जो कि इस हदीस के वर्णनकर्ता हैं ने अपनी उंगली को ज़मीन पर रखने के बाद उठाकर दिखाया) और फ़रमातेः "بِسمِ اللهِ، تُرْبَةُ أرْضِنَا، بِرِيقَةِ بَعْضِنَا، يُشْفَى بِهِ سَقِيمُنَا، بإذْنِ رَبِّنَا" अर्थात, अल्लाह के नाम से, हमारी धरती की मिट्टी, हममें से किसी के मुँह के थूक से मिलकर, हमारे रब के आदेश से, हमारे रोगी के रोगमुक्त होने का ज़रिया होगी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैंः सुन्नत यह है कि जब आदमी पत्नी रहते हुए किसी कुँवारी लड़की से विवाह करे तो उसके पास सात दिन रहे और उसके बाद बारी लगाए तथा जब किसी राँड स्त्री से विवाह करे तो उसके पास तीन दिन रहे और उसके बाद बारी लगाए। अबू क़िलाबा कहते हैंः यदि मैं चाहूँ तो कह सकता हूँ कि अनस (रज़ियल्लाहु अनहु) ने इस हदीस को अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से नकल किया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।सुन्नत यह है कि जब कोई आदमी पत्नी रहते हुए किसी कुँवारी से शादी करे, तो उसके पास लगातार सात दिन रहे, ताकि वह उसे अपने से निकट कर सके तथा नवव्याहता होने के कारण उसके अंदर जो घबराहट और शर्म है, उसे दूर कर सके। उसके बाद अपनी पत्नियों के लिए बराबर बारी बाँटे। लेकिन जब किसी ग़ैरकुँवारी से शादी करे, तो उसके पास तीन दिन रहे। क्योंकि पहली की तुलना में इसे इसकी आवश्यकता कम होती है। इस हदीस में जो विवेकपूर्ण बात कही गई है, उसे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के फ़रमान का दरजा हासिल है, क्योंकि वर्णनकर्ता जब कहें कि 'यह काम सुन्नत में से है', तो उनका आशय नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत ही होता है। यही कारण है कि अनस (रज़ियल्लाहु अंहु) से रिवायत करने वाले अबू क़िलाबा कहते हैं कि 'अगर मैं चाहूँ, तो कह दूँ कि अनस (रज़ियल्लाहु अंहु) ने इस हदीस को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से रिवायत किया है।' क्योंकि यह हदीस मेरे निकट 'सुन्नत में से है' के शब्द के कारण अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से वर्णित है। विदित हो कि 'मरफ़ू' हदीस से आशय वह हदीस है, जो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ओर मंसूब हो, जैसे कोई वर्णनकर्ता कहे कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस तरह की बात कही है।