





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि वह एक ऊँट पर सवार होकर चल रहे थे कि ऊँट थक गया और उन्होंने उसे छोड़ देने का मन बना लिया। परन्तु, इसी बीच अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मुझसे आ मिले और मेरे लिए दुआ की तथा उस ऊँट को मारा। सो, वह ऐसे चलने लगा कि उस तरह कभी नहीं चला था। फिर आपने फ़रमायाः इसे मुझसे एक ओक़िया (तौल में एक विशेष भार को इंगित करने वाला एक प्रकार का बटखरा) में बेच दो। मैंने कहाः नहीं। फिर आपने फ़रमायाः इसे मुझसे बेच दो। अतः, मैंने उसे एक ओक़िया में बेच दिया, लेकिन यह शर्त रखी कि मुझे घर जाने तक उस पर सवार होने का अधिकार प्राप्त होगा। जब मैं घर पहुँचने के बाद ऊँट लेकर उपस्थित हुआ तो आपने मुझे उसकी क़ीमत दे दी। फिर, जब मैं चल पड़ा तो मेरे पीछे एक व्यक्ति को भेजा और फ़रमायाः क्या तुम समझते हो कि मैंने तुम्हारा ऊँट लेने के लिए उसका मूल्य कम लगाया है? तुम अपना ऊँट और अपने दिर्हम ले लो। सब तुम्हारा है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) एक युद्ध में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ थे। वह एक ऊँट पर सवार थे, जो इतना थक चुका था कि सेना के साथ चल नहीं पा रहा था। नौबत यहाँ तक पहुँच चुकी थी कि उन्होंने उसे किसी काम का न समझकर आज़ाद छोड़ देने का इरादा कर लिया था। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को चूँकि अपने साथियों और अपनी उम्मत से बड़ा प्रेम था, इसलिए आप सेना के पीछे-पीछे चलते थे कि निर्बल, विवश और पिछड़ जाने वाले की सहायता कर सकें। इसी बीच आप जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) से मिले, जो अपने दुर्बल ऊँट पर सवार थे। अतः, आपने उनके लिए दुआ की और उनके ऊँट को मारा। आपकी यह मार उनके दुर्बल ऊँट के लिए शक्तिस्रोत बन गई और वह इतना तेज़ चलने लगा कि कभी उस तरह चलते नहीं देखा गया था। फिर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम), जो सदव्यवहार और उत्तम चरित्र के पुतले थे, जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) का दिल बहलाने और उनसे बात करने लगे कि आसानी से रास्ता कट जाए। आपने कहाः मुझेस यह ऊँट एक ऊक़िया में बेच दो। जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने अल्लाह के अनुग्रह की उम्मीद की। जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) जानते थे कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से बेचने से मना करने पर उनके धर्म में कोई कमी नहीं आएगी, क्योंकि आपका यह आदेश कोई ऐसा आदेश नहीं है, जिसका अनुपालन ज़रूरी हो। लेकिन इसके बावजूद जब आपने दोबारा बेचने को कहा, तो उसे एक ऊक़िया में बेच दिया। अलबत्ता, यह शर्त रखी कि वह उसपर सवार होकर मदीने में स्थित अपने घर तक जाएँगे। आपने उनकी शर्त मंज़ूर कर ली। जब सब लोग मदीना पहुँच गए, तो जाबर (रज़ियल्लाहु अंहु) ऊँट लेकर आपके पास आए और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें दाम भी दे दिया। जब वह जाने लगे, तो आपने उन्हें बुला भेजा। जब वह आए, तो आपने कहाः क्या तुम समझते हो कि मैंने तुमसे मामला तुम्हारे ऊँट के लालच में और उसे प्राप्त करने के लिए किया था? अपना ऊँट और अपने दिरहम दोनों ले जाओ। दोनों तुम्हारे हैं। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की दरियादिली तथा दयालुता के सामने यह कोई अचंभे की बात भी नहीं है; क्योंकि आपके जीवन में इसके बहुत-से उदाहरण मिलते हैं।
अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अज़्ल (संभोग के समय वीर्य-स्खलन से पहले लिंग को बाहर निकाल लेना ताकि अंदर स्खलन न हो) के बारे में बताया गया तो फ़रमायाः तुममें से कोई ऐसा क्यों करता है? (आपने यह नहीं फ़रमाया कि तुममें से कोई ऐसा न करे) क्योंकि, जो भी जान पैदा होने वाली है, अल्लाह उसे पैदा करके रहेगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने अज़्ल का ज़िक्र किया गया और यह बताया गया कि कुछ लोग अपनी पत्नियों तथा दासियों के साथ ऐसा करते हैं, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने खंडन के अंदाज़ में उनसे इसका कारण जानना चाहा। फिर आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनके ऐसा करने के पीछे छिपे उद्देश्य का ऐसा संतोषजनक उत्तर दिया, जो उन्हें इससे रोकने के लिए काफ़ी है। फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने तक़दीरें निर्दिष्ट कर दी हैं, इसलिए तुम्हारा यह अमल उस जान को रोक नहीं सकता, जिसे अल्लाह ने रचने का निर्णय कर लिया है। क्योंकि वही असबाब को तय करता है और उनके प्रभावों को भी। अतः, जब वह पुरुष के वीर्य से इनसान की रचना का इरादा करता है, तो उसे इस तरह उसके सुरक्षित स्थान में पहुँचा देता है कि उसे एहसास भी नहीं होता।
साद बिन अबू वक्कास (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसमान बिन मज़ऊन के विवाहित जीवन से अलग होकर इबादत में लगे रहने के इरादे को नकार दिया था। यदि उन्हें अनुमति दे देते तो हम पूरे तौर पर विवाहित जीवन से अलग होकर इबादत में लग जाते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।साद बिन अबू वक़्क़ास (रज़ियल्लाहु अंहु) वर्णन करते हैं कि उसमान बिन मज़ऊन (रज़ियल्लाहु अंहु) को अल्लाह की इबादत से इतना लगाव था कि दुनिया के सारे सुख और आनंद को त्यागकर पूरे तौर पर उसी में लग जाने का इरादा कर लिया। अतः, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से इस बात की अनुमति माँगी कि वह वैवाहिक जीवन से अलग होकर एकाग्रता के साथ अल्लाह की इबादत में लग जाएँ। लेकिन आपने उन्हें इसकी अनुमति नहीं दी। क्योंकि जीवन के आनंदों और सुखों को त्यागकर केवल इबादत में लग जाना धर्म के मामले में अतिशयोक्ति एवं मज़मूम रहबानियत है। जबकि सही धर्म यह है कि इनसान अल्लाह की इबादत के साथ-साथ उन स्वच्छ वस्तुओं से भी लाभ उठाए, जो उसके लिए हलाल की गई हैं। यही कारण है कि यदि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसमान (रज़ियल्लाहु अंहु) को अनुमति दे दी होती, तो बहुत-से इबादत में तत्पर सहाबा उनकी राह पर चल पड़ते।
सह्ल बिन साद अस-साअ़दी (रज़ियल्लाहु अंहुमा) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास एक महिला आई और बोली: मैं ख़ुद को आपके हवाले करती हूँ। इसके बाद वह देर तक खड़ी रहीं। इतने में एक व्यक्ति ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! यदि आपको आवश्यकता न हो तो उससे मेरा विवाह कर दीजिए। आपने पूछाः क्या तुम्हारे पास महर के रूप में देने के लिए कुछ है? उसने उत्तर दियाः इस तहबंद के सिवा मेरे पास कुछ नहीं है। यह सुनकर, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अपनी लुंगी उसे दे दोगे तो तुम्हारे पास कोई लुंगी नहीं रह जाएगी, इसलिए कुछ ढूँढो। उसने कहाः मुझे कुछ नहीं मिल रहा है। तो फ़रमायाः "ढूँढो, चाहे लोहे की एक अंगूठी ही सही। सो, उन्होंने ढूँढा, लेकिन कुछ न मिल सका। अतः, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः क्या तुम्हें क़ुरआन का कुछ भाग याद है? उत्तर दिया कि हाँ! तो फ़रमायाः तुम्हें क़ुरआन का जो कुछ याद है, उसके बदले में मैंने उससे तुम्हारा विवाह कर दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने एक व्यक्ति को अल्लाह के रास्ते में एक घोड़ा दिया। परन्तु, जिसके पास वह था, उसने उसे नष्ट कर दिया। इसलिए मैंने उसे खरीदने का निर्णय ले लिया। मुझे ऐसा लगा कि वह मुझे सस्ते दामों बेच देगा। अतः, मैंने अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा तो आपने फ़रमायाः उसे न खरीदो और सद्क़ा किया हुआ सामान वापस न लो, यद्धपि वह तुम्हें एक दिर्हम ही में क्यों न दे, क्योंकि हिबा (हदिया, उपहार) किए हुए सामान को लौटाने वाला व्यक्ति वैसा ही है, जैसे उल्टी को खाने वाला।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने अल्लाह के रास्ते में जिहाद के लिए एक व्यक्ति की सहायता की और उसे युद्ध करने के लिए एक घोड़ा दिया। लेकिन उस व्यक्ति ने घोड़े को सही से खाने नहीं दिया और उसकी सही देखभाल भी नहीं की। साथ ही उससे उसकी शक्ति से अधिक काम भी लिया। जिसके कारण वह कमज़ोर तथा दुर्बल हो गया। इसलिए उमर (रज़ियल्लाह अंहु) ने उसे उस व्यक्ति से ख़रीद लेना चाहा। उन्हें यह भी लगा कि कमज़ोर तथा दुर्बल होने के कारण वह कम दाम में मिल जाएगा। लेकिन इस बारे में वह संतुष्ट नहीं थे, इसलिए कोई क़दम उठाने से पहले अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पूछ लेना ज़रूरी समझा। लेकिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें उस घोड़े को ख़रीदने से मना कर दिया, यद्यपि काम दाम ही में क्यों न मिले। आपने समझाया कि जो वस्तु अल्लाह के लिए निकल चुकी है, उससे दिल मत अटका के रखो और उसके पीछे मत पड़ो। दूसरी बात यह है कि हो सकता है कि वह मुरव्वत के कारण कुछ कम दाम में दे दे। इस तरह तुम अपने सदक़े के कुछ भाग को लौटाने वाला क़रार पा जाओगे, जो कि मना है। एक बात यह भी है कि वह तुम्हारे पास से निकल चुका है तथा तुम्हारे गुनाहों को मिटाने और तुम्हारी नापाकियों और अपवित्रताओं को निकालने का कारण बना है, इसलिए उसका तुम्हारे पास वापस आना उचित नहीं है। यही कारण है कि उसे उचित दाम देकर ख़रीदने को भी 'दान की हुई वस्तु को वापस लेने' का नाम दिया गया है। इसी तरह उसे उलटी करके उसे दोबारा खाने के समान बताया गया है। यह दरअसल, इस काम की बुराई बताने और इससे नफ़रत दिलाने के लिए है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः हिबा किए हुए सामान को लौटाने वाला वैसा ही है, जैसे अपनी ही उल्टी को खाने वाला। और एक रिवायत में हैः जो अपने दान किए हुए सामान को वापस लेता है, वह उस कुत्ते की तरह है, जो उल्टी करता है और फिर उसे खा लेता है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस हदीस में दान की हुई वस्तु को वापस लेने से नफ़रत दिलाने के लिए एक ऐसा उदाहरण दिया है, जिससे हर इनसान को घिन आएगी। आपने बताया कि दान की हुई वस्तु को वापस लेने वाला व्यक्ति उस कुत्ते के समान है, तो उलटी करे और उसे दोबारा खा ले। यह उदाहरण यह बतलाने के लिए काफ़ी है कि यह अत्यंत घृणित कार्य है और इसे करने वाला व्यक्ति एक घटिया इनसान है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने बीमारी की अवस्था में घर में नमाज़ पढ़ी। आप बैठकर नमाज़ पढ़ा रहे थे और लोग आपके पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ रहे थे। इसी बीच उन्हें इशारा किया कि बैठ जाओ। जब नमाज़ पढ़ चुके तो फ़रमायाः इमाम इसलिए बनाया गया है ताकि उसकी पैरवी की जाए। अतः, जब वह रुकू करे तो तुम भी रुकू करो और जब सर उठाए तो सर उठाओ और जब 'سمع الله لمن حمده' कहे तो कहोः 'ربنا لك الحمد' कहो तथा जब वह बैठकर नमाज़ पढ़े तो तुम लोग भी बैठकर नमाज़ पढ़ो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बीमार होने के कारण बैठकर नमाज़ पढ़ी। साथ ही इसमें यह भी बताया गया है कि मुक़तदियों को इमाम का अनुसरण तथा उसके पीछे-पीछे हर काम करना चाहिए। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इमाम की नियुक्ति के उद्देश्य से मुक़तदियों को अवगत कराया। उद्देश्य यह है कि मुक़तदी उसका अनुसरण करे और उसके पीछे-पीछे नमाज़ के सारे कार्य करता जाए। नमाज़ के किसी भी कार्य से उससे भिन्नता न दिखाए और व्यवस्थित रूप से उसके सारे क्रिया-कलापों का अनुकरण करे। आपने फ़रमाया कि जब इमाम नीयत बाँधने के लिए तकबीर कहे तो तुम लोग तकबीर कहो, जब वह रुकू करे तो तुम उसके बाद रुकू करो, जब वह "سمع الله لمن حمده" कहकर तुम्हें यह याद दिलाए कि अल्लाह उसकी प्रशंसा करने वाले की दुआ क़बूल करता है, तो "ربنا لك الحمد" के माध्यम से उसकी प्रशंसा करो, जब वह सजदा करे तो उसका अनुकरण करते हुए सजदा करो और जब वह खड़े होने में अक्षम होने के कारण बैठकर नमाज़ पढ़े तो (पूर्णतयः उसके अनुसरण के मद्देनज़र) तुम भी बैठकर नमाज़ पढ़ो, यद्यपि तुम्हारे पास खड़े होकर नमाज़ पढ़ने की शक्ति हो। क्योंकि आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने स्पष्ट कर दिया है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बीमारी के कारण बैठकर नमाज़ पढ़ रहे थे। लेकिन सहाबा यह समझ रहे कि चूँकि वे खड़े होकर नमाज़ पढ़ने की क्षमता रखते हैं, इसलिए उन्हें खड़े होकर नमाज़ पढ़ना है। इसलिए वे आपके पीछे खड़े होकर नमाज़ पढ़ने लगे, तो आपने उन्हें बैठकर नमाज़ पढ़ने का इशारा किया। फिर जब नमाज़ ख़त्म हुई, तो लोगों को यह निर्देश दिया कि इमाम से भिन्नता नहीं बल्कि समरूपता दिखानी चाहिए, ताकि पूरे तौर पर उसका अनुसरण हो सके। यही कारण है कि यदि इमाम खड़े होने में अक्षम होने के कारण बैठकर नमाज़ पढ़े, तो मुक़तदी भी बैठकर नमाज़ पढ़ें। लेकिन यह उस समय है, जब इमाम शुरू से बैठकर नमाज़ पढ़े। परन्तु यदि निर्धारित इमाम खड़े होकर नमाज़ शुरू करे और उसके बाद कोई परेशानी आ जाए और वह बैठ जाए, तो लोग अनिवार्य रूप से उसके पीछे खड़े होकर ही नमाज़ पढ़ेंगे। इसका प्रमाण वह हदीस है, जिसमें है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपनी अंतिम बीमारी में अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहु) तथा आम लोगों को बैठकर नमाज़ पढ़ाई थी।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जिस समय मदीना आए, उस समय मदीने वाले फलों में एक, दो और तीन सालों के लिए बै-ए-सलम (ऐसा सौदा जिसमें क़ीमत पहले दे दी जाए और सामान बाद में लिया जाए) करते थे। अतः आपने फ़रमायाः जो बै-ए-सलम करना चाहे, वह ज्ञात नाप और ज्ञात वज़न में एवं ज्ञात अवधि तक के लिए करे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।यह बताने की ज़रूरत नहीं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मक्का से मदीना हिजरत करके आए थे। जब आप यहाँ आए, तो देखा कि मदीने वाले (जो कि अनाज और फल उगाया करते थे) बैए-सलफ़ करते हैं। बैए-सलफ़ यह है कि पहले आदमी क़ीमत दे दे और सामान जैसे फल आदि एक, दो या तीन साल या फिर इससे कम अथवा अधिक अवधि के बाद ले। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनकी इस खरीद-बिक्री को सही माना और उसे जो सामान इनसान के पास न हो उसे बेचने के दायरे में नहीं रखा, जो कि धोखे का कारण बनता है। क्योंकि बैए-सलफ़ का संबंध निर्धारित वस्तुओं से न होकर ज़िम्मेवारियों से होता है। लेकिन आपने लोगों के लिए इस ख़रीद-बिक्री के कुछ नियम भी बयान कर दिए, ताकि लोगों को झगड़ों से बचाया जा सके, जो कभी-कभी इसकी लंबी अवधि के कारण भी पैदा हो जाया करते हैं। आपने फ़रमायाः जो बैए-सलफ़ करे, वह वस्तु की माप और वज़न निर्धारित कर ले और अवधि भी तय कर दे। ताकि परिमाण और समय निर्धारित हो जाने के बाद किसी झगड़े की गुंजाइश बाक़ी न रहे और खरीदने और बेचने वाले दोनों के अधिकार सुरक्षित रहें।
राफ़े बिन खदीज (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि हम अनसार में सबसे अधिक खेती वाले थे तथा हम ज़मीन इस शर्त पर किराए पर देते थे कि उसके इस भाग की पैदावार हमारी है और उस भाग की पैदावार किराए पर लेने वाले की। लेकिन कभी यह भाग तो पैदावार देती, परन्तु वह भाग पैदावार नहीं देती थी। अतः, आपने हमें इससे मना कर दिया। रही बात चाँदी के बदले किराए पर देने की तो आपने हमें इससे मना नहीं किया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में इस बात का विवरण है कि ज़मीन को कैसे बटाई पर देना सही है और कैसे नहीं। राफ़े बिन ख़दीज (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि उनके घर वालों के पास मदीने में सबसे अधिक खेत और बाग़ थे और वे जाहिलियत के दौर में प्रचलित तरीक़े से खेत बटाई पर देते थे। वे यह तय करके खेत देते थे कि वे खेत के एक भाग की पैदावार लेंगे और किराये पर लेने वाला दूसरे भाग की। लेकिन कभी-कभी एक भाग की पैदावार ठीक-ठाक होती, परन्तु दूसरे भाग की नहीं। अतः, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें इस तरह मामला तय करने से मना कर दिया। क्योंकि इसमें धोखा और अनिश्चितता है। जबकि एवज़ का ज्ञान होना ज़रूरी होने के साथ-साथ दोनों का लाभ तथा हानि में बराबर का भागीदार होना भी आवश्यक है। चुनांचे अगर एवज़ ज़मीन की पैदावार तो वह अरबी में 'मुज़ारअत' या 'मुसाक़ात' (बटाई) कहलाता है, जिसका आधार नफ़ा-नुक़सान में न्याय और बराबरी होना चाहिए। यानी दोनों में से हर एक को पैदावार का एक निश्चित भाग मिलना चाहिए, जैसे एक चौथाई या आधा आदि। और अगर एवज़ नक़द हो, तो इसे अरबी में 'इजारा' (किराए पर देना अथवा ठेके पर देना) कहते हैं और इसमें एवज़ का निश्चित होना ज़रूरी है। शरीयत ने इसे जायज़ क़रार दिया है, चाहे सोने के बदले में हो या चाँदी के बदले में। इसी तरह 'मुज़ारअत' यानी बटाई को भी जायज़ क़रार दिया है। क्योंकि हदीस में हैः "أما شيء معلوم مضمون، فلا بأس به"