





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अनस (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है, वह कहते हैं कि जब हम किसी मंज़िल पर उतरते तो पालान उतारने से पहले नफ़्ल नमाज़ नही पढ़ते थे।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।क़ैस बिन अबू हाज़िम कहते हैं कि हम लोग ख़ब्बाब बिन अरत्त (रज़ियल्लाहु अंहु) का हाल जानने के लिए पहुँचे तो देखा कि उनके शरीर को सात जगहों से दागा गया था। बात-चीत के दौरान उन्होंने फ़रमायाः हमारे गुज़रे हुए साथी इस अवस्था में दुनिया से गए कि दुनिया (उनकी नेकी) को घटा नहीं सकी थी। जबकि हमने इतना धन प्राप्त कर लिया है कि हमें उसे रखने के लिए भवन की आवश्यकता पड़ रही है। यदि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें मौत की दुआ करने से मना न किया होता तो मैं अल्लाह से मौत माँग लेता। फिर हम दूसरी बार उनके पास आए तो वह अपनी एक दीवार ठीक कर रहे थे। वह कहने लगेः मुसलमान को उसके हर ख़र्च करने का सवाब दिया जाएगा, सिवाए उस ख़र्च के, जो घर बनाने में करे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है और शब्द बुख़ारी के हैं।अबू अतिय्या कहते हैं कि मैं और मसरूक़, उम्मुल मोमिनीन आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) के पास पहुँचे तो मसरुक़ ने उनसे कहाः मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दो सहाबी ऐसे हैं, जो नेकी के काम में कोताही नहीं करते, लेकिन एक मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने और इफ़तार करने में जल्दी करते हैं और दूसरे मग़्रिब की नमाज़ देर से पढ़ते तथा इफ़तार देर से करते हैं। उन्होंने पूछाः कौन मग़्रिब की नमाज़ पढ़ने और इफ़तार करने में जल्दी करता है? मसरुक़ ने कहाः अब्दुल्लाह (बिन मसऊद)। उन्होंने कहाः अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऐसा ही करते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने रुकू और सजदे में कहा करते थेः ऐ अल्लाह! तू पवित्र एवं पाक है तथा फ़रिश्तों एवं जिबरील का रब है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मेरे पास आए। उस समय मेरे पास एक व्यक्ति था। अतः, आपने पूछा कि ऐ आइशा! यह कौन है? मैंने कहाः यह मेरा दूध-शरीक भाई है (अर्थात हम दोनों ने एक ही महिला से स्तनपान किया था)। तो आपने फ़रमायाः ऐ आइशा! ठीक से देख लो कि कौन तुम्हारा भाई है? क्योंकि उसी दूध से रज़ाअत (दूध-शरीक रिश्ता) साबित होती है, जो भूख मिटाए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) के पास गए, तो उनके पास उनके दूध के रिश्ते के भाई को देखा। (चूँकि आप उनको पहचानते नहीं थे) इसलिए यहाँ उनके उपस्थित होने को नापसंद किया और आपके चेहरे का रंग बदल गया। आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) मामले को भाँप गईं और बताया कि वह उनके दूध के रिश्ते का भाई है। इसपर आपने कहाः ऐ आइशा, ठीक से देखभाल लो और दूध के रिश्ते की अच्छे से छानबीन कर लो। क्योंकि कभी-कभी यह रिश्ता हुरमत को साबित नहीं भी करता है। दूध से रिश्ता साबित होने के लिए ज़रूरी है कि वह भूख मिटाने का काम करे, उस समय पिला जाए जब बच्चे को दूध की ज़रूरत हो और वह उसके सिवा कुछ न खाता हो तथा उसी से उसका मांस बनता हो और हड्डियाँ मज़बूत होती हों। ऐसा होने पर बच्चा दूध पिलाने वाली स्त्री के एक अंश और उसके एक बच्चे के समान हो जाता है। इसलिए हुरमत की छानबीन कर लो। विदित हो कि हुरमत दूध पिलाने वाली स्त्री और उसके परिवार के लिए साबित होती है। दूध पिलाने वाली उससे परदा नहीं करेगी। वह उसके साथ अकेले में रह सकती है और उसका वह लड़का उसके साथ यात्रा में महरम के तौर पर चल सकता है। इसमें दूध पिलाने वाली, उसका पति जिसके कारण दूध आया है, उन दोनों के बच्चे, उन दोनों के भाई, पिता और माता सब शामिल हैं।
अब्दुल्लाह बिन उमर - रज़ियल्लाह अनहुमा- कहते हैं कि उमर को खै़बर में एक ज़मीन मिली तो वह अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास इस सिलसिले में परामर्श करने आए और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मुझे खै़बर में एक ज़मीन मिली है, इस से अधिक मूल्यवान वस्तु कभी नहीं मिली, आप मुझे इस के बारे में क्या आदेश देते हैं? तो आप ने फ़रमायाः चाहो तो मूल को रोके रखो और उसकी उपज का सदक़ा करो। कहते हैंः तो उन्हों ने उसे सदक़ा कर दिया, इस शर्त के साथ कि उसके मूल को न बेचा जाए और न ही हिबा किया (उपहार स्वरूप दिया) जाए और न ही विरासत में दिया जाए। कहते हैंः तो उमर ने निर्धनों, रिश्तेदारों, गुलामों की मुक्ति, अल्लाह के रास्ते में और यात्रियों के लिए सदक़ा कर दिया। जो उसका संरक्षक हो, उस पर कोई पाप नहीं, यदि वह सही तरीक़े व उचित रूप से उसमें से कुछ खाए अथवा दोस्त को खिलाए, लेकिन उस से धन एकत्रित न करे और एक शब्द में है( और न धनी बनने के लिए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अन्हु) को ख़ैबर में सौ तीर के बराबर एक ज़मीन मिली, जो इतनी अच्छी और उत्तम थी कि उनके निकट सबसे मूल्यवान धन की हैसियत रखती थी। सहाबा की बात ऐसी थी कि वे नेक कार्य में एक-दूसरे से आगे बढ़ने के प्रयास रहते थे। चुनांचे उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास, उस नेकी के लोभ में आए, जिसका उल्लेख अल्लाह तआला के इस फ़रमान में हैः 'لَنْ تَنَالوا البِرً حَتًى تُنْفِقُوا مِمًا تُحِبونَ' (तुम नेकी उस समय तक प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक अपनी प्यारी चीज़ों में ख़र्च न करो।) तथा आपसे उस ज़मीन को अल्लाह की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सदक़ा करने के बारे में प्रामर्श करने लगे। अतः, आपने उन्हें सदक़ा का सबसे उत्तम तरीक़ा बताया। आपने बताया कि वह असल ज़मीन को अपने पास रखते हुए उसे वक़्फ़ कर दें। चुनांचे उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उसे वक़्फ़ कर दिया। अब न वह उसे बेच सकते थे, न किसी को दे सकते थे, न उत्तराधिकारी बना सकते थे और न कोई अन्य मामला कर सकते थे, जिससे मालिकाना अधिकार एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता हो या हस्तांतरण का कारण बनता हो। उन्होंने उसे निर्धनों, ग़रीबों, निकटवर्तियों, रिश्तेदारों, दासों की मुक्ति, दियत अदा करने, अल्लाह के धर्म के वर्चस्व के लिए उसकी राह में जिहाद करने वालों की मदद करने, यात्रा में निकले हुए लाचार यात्रियों की सहायता करने, अतिथियों के सत्कार, जो कि ईमान का एक अंग है, के लिए वक़्फ़ कर दिया। चूँकि उस ज़मीन को एक ऐसे व्यक्ति की भी आवश्यकता थी, जो उसकी देखभाल करता, इसलिए उसकी निगरानी करने वाले को यह अनुमति दी गई है कि ज़रूरत के अनुसार आम रीति-रिवाज के मुताबिक़ उसकी पैदावार को ख़ुद खा सकता है और अपने किसी दोस्त को खिला सकता है। लेकिन, ज़रूरत से अधिक अपने पास जमा नहीं कर सकता। क्योंकि वह ज़मीन भलाई के रास्तों में ख़र्च करने के लिए वक़्फ़ है, उसे कमाई का ज़रिया नहीं बनाया जा सकता। टिप्पणीः वक्फ़ यह है कि कोई मुसलमान अपने किसी धन को किसी भी भलाई के रास्ते में इस तरह सदक़ा करे कि उसका लाभ उस भलाई के रास्ते में ख़र्च हो और असल धन उसके स्वामित्व रहे। उदाहरणस्वरूप कोई अपना खेत निर्धनों के लिए वक़्फ़ कर दे, तो खेत से निकलने वाले फल और पैदावार निर्धनों के लिए होगी और खेत उसी के स्वामित्व में रहेगा।
अनस बिन मालिक- रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अब्दुर्रहमान बिन औफ़ पर ज़ाफरान (केसर) का रंग देखा तो फ़रमायाः क्या बात है? तो उन्होंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं ने शादी कर ली है। फ़रमायाः उसका महर क्या है? कहाः गिठली समान सोना। फ़रमायाः अल्लाह बरकत दे, वलीमा करो, चाहे एक बकरी से ही क्यों न हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अब्दुर्रहमान बिन औफ़ (रज़ियल्लाहु अंहु) के शरीर पर ज़ाफ़रान का कोई धब्बा देखा। चूँकि पुरुषों को ऐसी ख़ुशबू लगानी चाहिए, जिसमें सुगंध हो और धब्बा न हो, इसलिए आपने इनकार के अंदाज़ में उनके शरीर पर लगे इस धब्बे का कारण पूछा, तो उन्होंने बताया कि उनकी नई-नई शादी हुई है। संभवतः यह उनकी पत्नी से लगा हो। इसपर आपने उन्हें इसकी छूट दी। चूँकि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सहाबा की ख़बर रखते थे और उनसे प्रेम करते थे, इसलिए उनके हालात पूछते रहते थे, ताकि कोई अच्छी बात देखें, तो उसे स्वीकार्यता प्रदान करे और बुरी बात देखें, तो उससे मना करें। यही कारण है कि आपने महर के बारे में पूछा। उन्होंने कहाः एक गुठली के बराबर सोना दिया है। इसपर आपने बरकत की दुआ दी और निकाह के बाद वलीमा करने का आदेश दिया, चाहे एक बकरी ही क्यों न हो।
अबू सईद खुदरी (रज़ियल्लाहु अंहु) से वर्णित है कि बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु), अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास बरनी खुजूर (मदीने की एक उत्तम प्रकार की खुजूर) लेकर आए तो अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनसे फ़रमायाः तुम्हें यह कहाँ से मिला? बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) ने कहाः हमारे पास रद्दी खुजूर थी। मैंने उसमें से दो साअ़ (साअ़ एक प्रकार का माप है) देकर एक साअ़ लिया ताकि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खाएँ। यह सुनकर, अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः ओहो, यही तो सूद है। यही तो सूद है। ऐसा न करो, लेकिन जब तुम ख़रीदना चाहो तो अपने पास मौजूद खुजूर को बेच दो और उसके पैसे से ख़रीदो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।बिलाल (रज़ियल्लाहु अन्हु) नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास मदीने की उत्तम कोटि की बरनी खजूर लेकर आए, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसकी उत्कृष्टता पर आश्चर्य प्रकट किया और पूछा कि इसे खजूर कहाँ से ले आए? बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उत्तर दियाः हमारे पास आम खजूर थी। हमने दो सा रद्दी खजूर देकर एक सा अच्छी खजूर ले ली, ताकि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) खिला सकें। उनकी यह बात नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर बहुत भारी पड़ी और आपके मुँह से निकलाः 'ओह!' क्योंकि आपके निकट गुनाह ही सबसे बड़ी मुसीबत था। फिर फ़रमायाः तुम्हारा बिलकुल सूद है, जो कि हराम है। ऐसा न करो। यदि रद्दी खजूर बदलना चाहते हो, तो रद्दी खजूर को दिरहम से बेचो। फिर दिरहम से अच्छी खजूर खरीद लो। यह जायज़ तरीक़ा है। हराम से बचने के लिए इसपर अमल करना है।
अबू मसऊद (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कुत्ते की क़ीमत, वेश्या की कमाई और काहिन (भविष्य वक्ता, ज्योतिषी) के पारिश्रमिक से मना फ़रमाया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।रोज़ी कमाने के बहुत-से जायज़ और पवित्र रास्ते हैं, जिनके होते हुए नाजायज़ और अपवित्र रास्तों की ज़रूरत नहीं है। चूँकि रोज़ी कमाने के जायज़ रास्ते ही काफ़ी हैं और नाजायज़ रास्तों में बहुत-सी बड़ी-बड़ी बुराइयाँ हैं, जिनकी तुलना में उनके अंदर मौजूद फ़ायदों का कोई महत्व नहीं है, इसलिए शरीयत ने तमाम अपवित्र रास्तों की कमाई को हराम क़रार दिया है, जिनके निम्नलिखत तीन रास्ते शामिल हैंः 1. कुत्ते को बेचनाः क्योंकि कुत्ता गंदा और नापाक जानवर है। 2. व्यभिचारिणी की कमाई, जो व्यभिचार से प्राप्त हो, जिससे इनसान का धर्म और दुनिया दोनों तबाह हो जाते हैं। 3. इसी तरह उन छल और धोखा करने वालों की कमाई, जो ग़ैब जानने तथा कायनात को चलाने में अख़्तियार रखने का दावा करते हैं और लोगों से उनका धन निकालकर हराम तरीक़े से खाने के लिए नज़रबंदी का खेल खेलते हैं। धन अर्जित करने के यह सारे तरीक़े अशुद्ध और हराम हैं। इनके ज़रिए धन अर्जित करना जायज़ नहीं है। अल्लाह ने इनके बदले बहुत-से हलाल और पवित्र रास्ते खोल रखे हैं।