





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- एक बार उनके पास तशरीफ़ लाए। वहाँ एक औरत बैठी थी। आपने पूछाः "यह कौन है?" आइशा -रज़ियल्लाहु अन्हा- ने कहा कि यह अमुक औरत है, जो अपनी नमाज़ का हाल बयान कर रही है। आपने फ़रमाया : "ठहरो! तुम उतना ही अमल करो, जितने की क्षमता रखते हो। अल्लाह की सौगंध, अल्लाह नहीं उकताएगा, यहाँ तक कि तुम ही उकता जाओगे।" तथा आपकी नज़र में वही अमल सबसे प्रिय था, जिसे करने वाला हमेशा करता रहे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने व्यवसायिक काफ़िलों से आगे जाकर मिलने और देहात वाले की ओर से नगर वासी के बेचने से मना किया है। वर्णनकर्ता कहते हैं कि मैंने इब्ने अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से पूछा कि देहात वाले की ओर से नगर वासी के बेचने का मतलब क्या है? उन्होंने उत्तर दिया : नगर वासी देहात वाले का दलाल न बने।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने क्रय-विक्रय के कुछ वर्जित प्रारूपों से मना किया है, जिनके अंदर या तो बेचने वाले, या ख़रीदने वाले या उनके अलावा किसी और का नुक़सान छुपा होता है। आपने इस बात से मना किया है कि जो लोग अपने सामान जैसे अनाज और जानवर आदि बाज़ार की ओर ला रहे हों, उनके बाज़ार पहुँचने से पहले ही उनसे जाकर मिल लिया जाए और उनका सामान ख़रीद लिया जाए। मना करने का कारण यह है कि ऐसे लोग बाज़ार के भाव से अनभिज्ञ होते हैं और इस बात की संभावना रहती है कि उनसे सस्ते दामों में सामान ख़रीदकर उन्हें उस मूल्य से वंचित कर दिया जाए, जिसके लिए वे दूर-दराज़ के क्षेत्रों से यात्रा करके आए हैं और कठिनाइयाँ झेली हैं। जबकि कुछ लोग बिना किसी मेहनत के बैठे-बिठाए भारी मुनाफ़ा कमा लें। दूसरी चीज़ जिससे आपने मना किया है, यह है कि देहात या गाँव का रहने कोई व्यक्ति अपना सामान नगर ले जाए, ताकि उसे उस दिन के भाव से या उस भाव से जिसकी उसे आवश्यकता हो, बेच सके, लेकिन कोई नगरवासी उसके पास आए और कहे कि तुम उसे मेरे पास रख दो, मैं उसे धीरे-धीरे महंगे दामों में बेच दूँगा। इससे मना करने का कारण यह है कि इसमें नगरवासियों की हानि छुपी होती है। इस तरह देखा जाए, तो शरीयत ने शहर से दूर रहने वाले मूल्य से अनभिज्ञ बेचने वाले के अधिकार की भी सुरक्षा की है और नगरवासियों के अधिकार की भी सुरक्षा की है।
अब्दल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुज़ाबना यानी इस बात से मना फ़रमाया है कि बाग में लगे हुए फल यदि खजूर हों, तो उन्हें सूखी खजूरों के बदले में नापकर बेचा जाए, और अगर अंगूर हों तो उन्हें किशमिश के बदले में नापकर बेचा जाए या फिर खेती को गल्ले के बदले में नापकर बेचकर जाए। आपने इन सब से मना किया है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मुज़ाबना से मना किया है। मुज़ाबना नाम है ज्ञात वस्तु को उसी जिंस की अज्ञात वस्तु के बदले में बेचने का। मना करने का कारण यह है कि इस क्रय-विक्रय में दोनों पक्षों में से किसी एक के नुक़सान के साथ-साथ दोनों वस्तुओं के बराबर होने की जानकारी का भी अभाव है, जो सूद का कारण बन सकता है। इस क्रय-विक्रय को स्पष्ट करने के लिए इसकी कई मिसालें दी गई हैं। जैसे खजूर के बाग में लगे हुए फल को सूखी खजूर के बदले नापकर बेचना, अंगूर के बाग में लगे हुए अंगूर को किशमिश के बदले नापकर बेचना और खेत में लगी हुइ फसल के अनाज को उसी जिंस के अनाज से नापकर बेचना आदि। आपने क्रय-विक्रय की इन सारी शक्लों से मना किया है, क्योंकि इनके अंदर कई ख़राबियाँ और नुक़सान हैं।
अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने शिग़ार विवाह से मना किया है। (शिग़ार विवाह यह है कि आदमी अपनी बेटी का विवाह इस शर्त पर कराए कि दूसरा भी अपनी बेटी का निकाह उससे कराएगा और दोनों में से किसी को भी महर नहीं देना होगा।)
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।निकाह के अनुबंध में असल यह है कि स्त्री को अपने नफ़्स के बदले महर मिलना चाहिए और इसके बिना यह अनुबंध संपन्न नहीं होगा। यही कारण है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने जाहिलियत काल में प्रचलित इस निकाह से मना किया है, जिसमें अभिभावकगण अपने मातहत स्त्रियों पर अत्याचार करते थे। क्योंकि वे उनका निकाह बिना महर के, केवल अपनी अभिलाषाओं तथा वासनाओं को सामने रखते हुए कर देते थे। वे उनका विवाह इस शर्त पर कर देते थे कि उनसे विवाह करने वाले भी अपने मातह स्त्रियों का निकाह उनसे बिना महर के कर देंगे। यह सरासर अत्याचार और स्त्रियों के साथ अल्लाह की उतारी हुई शरीयत की अनदेखी करते हुए किया जाने वाला व्यवहार है। इसलिए यह हराम और अमान्य है।
अब्दुल्लाहु बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने गर्भ के गर्भ को बेचने से मना फ़रमाया है, जो कि जाहिलिय्यतकाल में प्रचलित था। होता यह था कि एक व्यक्ति ऊँटनी खरीदता और मूल्य उस समय देने का वचन देता, जब वह ऊँटनी बच्चा जने और फिर उस बच्चे के पेट से बच्चा पैदा हो। यह भी कहा जाता है कि आदमी बूढ़ी ऊँटनी को दूसरी ऊँटनी के पेट में पल रहे बच्चे के बच्चे के बदले में बेचता था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।यह एक हराम क्रय-विक्रय है और इसकी दो व्याख्याएँ की गई हैं : 1- इसका अर्थ लटकाए रखने का हो। इसकी तफ़सील यह है कि कोई व्यक्ति किसी को अपना सामान उधार बेचे और क़ीमत अदा करने की समय सीमा यह तय करे कि उसकी ऊँटनी बच्चा दे और फिर उस बच्चे के पेट से बच्चा पैदा हो जाए। इस क्रय-विक्रय से मना करने का कारण यह है कि यहाँ क़ीमत अदा करने का समय निश्चित नहीं है, जबकि अदायगी के समय के लंबा अथवा छोटा होने से क़ीमत का प्रभावित होना सर्वविदित है। 2- इसका अर्थ हो गैरमौजूद तथा नामालूम वस्तु को बेचना। इसकी तफ़सील यह है कि कोई आदमी किसी को किसी जानवर के पेट में पलने वाले पच्चे के पेट से पैदा होने वाले बच्चे को बेचे। इस तरह की ख़रीद-फ़रोख़्त से मना करने का कारण यह है कि इसके अंदर बहुत बड़ा नुक़सान तथा घाटा छुपा हुआ है। क्योंकि कोई नहीं जानता कि जानवर के पेट से नर पैदा होगा या मादा, एक होगा या दो, जीवित होगा या मृत? साथ ही इसमें वस्तु की प्राप्ति का समय भी अनिश्चित है और इस तरह के अनिश्चित क्रय-विक्रय के बहुत-से नुकसान सामने आते हैं, जो विवादों का कारण बनते हैं। इस तरह से देखा जाए तो इस मससे के चार रूप बनते हैं : पहला रूप : ऊँटनी के गर्भ को बेचना। दूसरा रूप : ऊँटनी के गर्भ के गर्भ को बेचना। यहाँ बेची जाने वाली वस्तु नामालूम और अनिश्चित है। तीसरा रूप : बेची जाने वाली वस्तु को बाद में देने की बात करना। यानी सामान को उस समय ख़रीदार के हलाले करने की बात कहना, जब ऊँटनी का बच्चा पैदा हो या उसके गर्भ में पल रहे बच्चे का बच्चा पैदा हो। चौथा रूप : सामान तो हवाले कर दिया जाए, लेकिन क़ीमत को अनिश्चित समय तक के लिए उधार रखा जाए।
अबू अब्दुल्लाह जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हमें अबू उबैदा- रज़ियल्लाहु अन्हु- की अगुवाई में क़ुरैश के एक व्यापारी काफ़िले की तलाश में भेजा और हमें एक थैली खजूर दी। आपके पास उसके सिवा कुछ नही था। अबू उबैदा हमें एक-एक खजूर दिया करते थे। उनसे पूछा गया कि आप लोग उसका क्या करते थे? उन्होंने उत्तर दिया : हम उसे बच्चों की तरह चूस लेते और उसके बाद पानी पान पी लेते थे। इस तरह वह एक खजूर दिन भर और रात तक के लिए काफ़ी हो जाती। हम अपनी लाठी से पेड़ के पत्ते झाड़ते और फिर उन्हें पानी में भिगोकर खाते थे। वह कहते हैं : हम लोग समुद्र के किनारे-किनारे चल रहे थे कि समुद्र के किनारे बहुत बड़े टीले के रूप में हमारे लिए कुछ प्रकट हुआ। जब हम उसके पास पहूँचे, तो देखा कि वह अंबर नामी एक जानवर है। उसे देख अबू उबैदा ने कहा : यह मरा हुआ जानवर है। लेकिन फिर कहाः नहीं, हम लोग तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के हुए लोग हैं और अल्लाह के रास्ते में निकले हुए हैं और तुम मजबूरी की हालत में भी हो। अतः, खाओ। चुनांचे हम लोग, जो तीन सौ की संख्या में थे, उसे एक महीने तक खाते रहे, यहाँ तक कि मोटे हो गए। हमने उसकी आँखों के गढ़े से घड़ों में भर-बरकर चरबी निकाली। हम उससे मांस के टुकड़े काटकर अलग करते, जो बैल के बराबर होते। अबू उबैदा ने तेरह लोगों को ले जाकर उसकी आँख के गढ़े में बिठा दिया। इसी तरह उसकी एक पसली को खड़ा किया और हमारे काफ़िले के सबसे ऊँचे ऊँट को कजावा पहना दिया, तो वह उसके नीचे से गुज़र गया। हमने उसके मांस के कुछ सूखे हुए टुकड़े अपने पास रसद के तौर पर रख लिए। जब हम मदीना पहुँचे, तो अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आए और इसका ज़िक्र किया, तो आपने फ़रमाया : "वह आजीविका थी, जिसे अल्लाह ने तुम लोगों के लिए निकाला था। क्या तुम्हारे पास उसका कुछ मांस है कि हमें भी खिला सको?" हमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उसका कुछ मांस भेजा और आपने उस से खाया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा बिन्त अबू बक्र -रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक यहूदी से खाने की वस्तु ख़रीदी और उसके पास अपना लोहे का कवच गिरवी रख दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक यहूदी से खाने की वस्तु खरीदी और उसके पास एक ऐसा सामान गिरवी रखा, जिसकी आपको अल्लाह के रास्ते में जिहाद के लिए आवश्यकता रहती थी। उसके पास अपना कवच रख दिया, जिसे आप युद्ध के समय पहनकर अल्लाह की अनुमति से उसके ज़रिए अल्लाह दुश्मन के हथियारों तथा षड्यंत्र से बचते थे।
अबू सईद ख़ुदरी -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि हम लोग किसी सफ़र में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ थे कि इसी बीच एक व्यक्ति सवार होकर आया और दाएँ-बाएँ देखने लगा। यह देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसके पास सवारी अधिक है, वह उसे सदक़ा करे जिसके पास नहीं है और जिसके पास अधिक रसद हो, वह उसे दे दे, जिसके पास नहीं है।" फिर आपने धन के कुछ प्रकार के नाम लिए, यहाँ तक कि हम समझने लगे कि आवश्यकता से अधिक वस्तु पर किसी का कोई अधिकार नहीं है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने भूमि के किसी एक भाग की पैदावार के बदले में भूमि किराए पर लेने, बाली में मौजूद गेहूँ को बाली से अलग किए हुए गेहूँ के बदले में बेचने, पेड़ में लगी हुई खुजूर को तोड़ी हुई खुजूर के बदले में बेचने, फल को उपयोग के योग्य होने से पहले बेचने तथा उसे दीनार एवं दिर्हम के अतिरिक्त किसी और वस्तु के बदले में बेचने से मना किया है। मगर हाँ, ताज़ा खुजूरों को सूखी खुजूरों के बदले में अनुमान लगाकर बेचने की अनुमति दी है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फलों से संबंधित कई ऐसी ख़रीद-बिक्रियों को मना किया है। क्योंकि इन खरीद-बिक्रियों में दोनों अथवा किसी एक पक्ष के नुक़सान की संभावना रहती है। इन्हीं वर्जित मामलों में से एक 'मुख़ाबरा' है। मुख़ाबरा का अर्थ है, ज़मीन को, उसके किसी निश्चित भाग की पैदावार के बदले में किराये पर देना। जबकि उचित यह है कि उसे उसकी पैदावार के एक निश्चित भाग के बदले में, जो न्यायसंगत हो, दिया जाए। इसी प्रकार बाली में मौजूद गेहूँ को, बाली से अलग गेहूँ के बदले बेचने से मना किया है। साथ ही पेड़ पर लगी खजूर को उसी के समान खजूर से बेचने से भी मना किया है। इस बात से भी मना किया है कि फल को प्रयोग के योग्य होने से पहले बेचा जाए। परन्तु ताजा खजूर को, इस बात का अंदाज़ा लगाने के बाद कि उसका वज़न कितना होगा, उसके बराबर सूखी खजूर के बदले में बेचना जायज़ है। लेकिन शर्त यह है कि वज़न पाँच वसक़ या उससे कम हो। इस संदर्भ में कई हदीसें मौजूद हैं।