





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
All
आइज़ बिन अम्र मुज़नी (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "इस्लाम प्रभावी होता है, प्रभावित नहीं होता।"
इसे बैहक़ी ने रिवायत किया है। - इसे दारक़ुतनी ने रिवायत किया है ।यह हदीस इस्लाम का एक बहुत बड़ा सिद्धांत प्रस्तुत करती है। सिद्धांत यह है कि अल्लाह ने इस्लाम के लिए प्रतिष्ठा एवं उत्कर्ष लिख दिया है। अतः मुसलमान जब तक इस्लाम को थामे रहेंगे, प्रतिष्ठित एवं अच्छी अवस्था में रहेंगे। इस्लाम को थामे रहना प्रतिष्ठा प्राप्त करने की शर्त है। ज्ञात हो कि इस हदीस में जो सूचना दी गई है, वह एक तरह का आदेश है। जैसा कि अल्लाह ने कहा है : {ولا تهنوا ولا تحزنوا وأنتم الأعلون إن كنتم مؤمنين} (तुम निर्बल तथा उदासीन न बनो और तुम ही सर्वोच्च रहोगे, यदि तुम ईमान वाले हो।) इस हदीस के अंदर सभी परिस्थितियाँ आ जाती हैं। उलेमा ने इसे प्रमाण बनाकर बहुत-से धार्मिक आदेश प्राप्त किए हैं। इसके दायरे में जिज़्या का अध्याय भी आता है। क्योंकि ज़िम्मी लोग जब जिज़्या देने के बाद हमारे बीच रहेंगे, तो उन्हें खुल्लम-खुल्ला नाक़ूस बजाने तथा सलीब स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी और न उनके भवन मुसलमानों के भवनों से ऊँचे होंगे। इसी तरह यदि माता-पिता में से कोई मुसलमान हो जाए, तो बच्चा दोनों में से उत्तम धर्म को मानने वाले यानी मुसलमान के मातहत होगा। इसी तरह, मुस्लिम स्त्री का विवाह काफ़िर पुरुष से नहीं हो सकता। कुल मिलाकर यह कि हर वह बात, जिससे इस्लाम की प्रतिष्ठा झलकती हो, उसे प्राथमिकता दी जाएगी।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "पुरस्कार के साथ प्रतियोगिता की अनुमति केवल ऊँटदौड़, घुड़दौड़ और तीरंदाज़ी में है।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस से मालूम होता है कि धन अथवा इस तरह किसी और रूप में इनाम लेना केवल ऊँटदौड़, घुड़दौड़ तथा इस प्रकार के अन्य मुक़ाबलों एवं तीरंदाज़ी की प्रतियोगिता में जायज़ है। इसका कारण यह है कि इस प्रकार की प्रतियोगिताएँ शत्रु से युद्ध की तैयारी के अंतर्गत आती हैं और इनमें इनाम देना दरअसल जिहाद के लिए प्रेरित करना और उसपर उभारना है। घोड़े के अर्थ में खच्चर एवं गधा भी आते हैं। क्योंकि तीनों खुर वाले जानवर हैं और उनके तेज़ चलने की आवश्यकता भी होती है, क्योंकि यह सेना का बोझ ढोने का काम करते हैं और उसके साथ युद्ध में शरीक होते हैं। ज्ञात हो कि इस हदीस के अंदर युद्ध में काम आने वाले वह सारे अस्त्र-शस्त्र दाखिल हैं, जो उक्त वस्तुओं के अर्थ में हैं।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम - ने हसन और हुसैन -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- की ओर से (अक़ीक़ा में) एक-एक मेढ़ा ज़बह किया ।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।इस हदीस में अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने हसन और हुसैन -रज़ियल्लाहु अनहुमा- में से हर एक की ओर से दो-दो मेढ़ा ज़बह किया। इस तरह, यह हदीस नवजात शिशु की ओर से अक़ीक़ा करने का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने लोगों को आदेश दिया कि लड़के की ओर से एक जैसी दो बकरियाँ ज़बह करें तथा लड़की की ओर से एक बकरी।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।इस हदीस में आइशा -रज़ियल्लाहु अनहा- बता रही हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें आदेश दिया है कि संतान जन्म लेते समय बच्चे की ओर से आयु, वज़न एवं श्रेष्ठता में दो समान बकरियाँ ज़बह करें। इसी तरह बच्ची की ओर से एक बकरी ज़बह करें।
समुरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फरमाया : “प्रत्येक बच्चा अपने अक़ीके के बदले गिरवी होता है। उसकी ओर से सातवें दिन जानवर ज़बह किया जाएगा तथा उसका नाम रखा जाएगा एवं उसके सर के बाल मूँड़े जाएँगे।”
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है। - इसे दारिमी ने रिवायत किया है।इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- बता रहे हैं कि पैदा होने वाला बच्चा अपने अक़ीक़ा के बदले में गिरवी होता है। उसकी ओर से जन्म के तीसरे दिन जानवर ज़बह किया जाएगा। उसी दिन बच्चे का नाम रखना और उसके सिर के बाल मूँड़ना मुसतहब है। ज्ञात हो कि सिर के बाल मूँड़ना बच्चे के साथ खास है और इसमें बच्ची दाख़िल नहीं है।
उसामा बिन ज़ैद -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : “मुस्लिम काफिर का वारिस नहीं हो सकता तथा काफिर मुस्लिम का वारिस नहीं हो सकता।”
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि मुसलमान एवं काफ़िर के बीच उत्तराधिकार का सिलसिला नहीं चलता। इसका कारण यह है कि इस्लाम का संबंध धरती का सबसे शक्तिशाली संबंध है। अतः जब नसबी रिश्तेदारों के बीच यह पवित्र संबंध न रहे, तो फिर सारे रिश्ते छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसे में खानदानी रिश्ते की शक्ति भी व्यर्थ हो जाती है। अतः एक-दूसरे के वारिस बनने की कोई गुंजाइश नहीं रहती, जो कि आपसी प्रेम एवं परस्पर सहयोग पर आधारित है।
ख़ुरैम बिन फ़ातिक रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अमल छह प्रकार के हैं और लोग चार प्रकार के हैं। रही बात छह आमाल की, तो उनमें से दो प्रकार के अमल वाजिब करने वाले हैं, दो प्रकार के अमल बराबर-बराबर हैं, एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब दस गुना मिलता है और एक प्रकार का अमल ऐसा नेक अमल है कि उसका सवाब सात सौ गुना मिलता है। जहाँ तक दो वाजिब करने वाले अमल की बात है, तो जो व्यक्ति इस अवस्था में दुनिया से मृत्यु को प्राप्त हुआ कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं ठहराया, वह जन्नत में जाएगा और जो इस अवस्था में दुनिया से मृत्यु पाया कि किसी को अल्लाह का साझी ठहराया, वह जहन्नम में जाएगा। जहाँ तक बराबर-बराबर वाले दो अमल की बात है, तो ध्यान में रहे कि जिसने किसी नेकी के काम की इस तरह नीयत कर ली कि उसके दिल ने उसे महसूस किया और अल्लाह ने उसकी नीयत को जाना, तो उसके लिए एक नेकी लिखी जाएगी। इसी तरह जिसने कोई बुरा काम किया, उसके लिए एक गुनाह लिखा जाएगा। पाँचवें प्रकार का अमल यह है कि जिसने कोई नेकी का काम कर लिया, उसे उस नेकी के काम का सवाब दस गुना दिया जाएगा। और छठे प्रकार का अमल यह है कि जिसने अल्लाह के रास्ते में कोई चीज़ खर्च की, उसे इस एक अच्छे काम का सवाब सात सौ गुना मिलेगा। जहाँ तक चार प्रकार के लोगों की बात है, तो कुछ लोग दुनिया में खुशहाल हैं और आख़िरत में कंगाल होंगे, कुछ लोग दुनिया में कंगाल हैं और आख़िरत में खुशहाल होंगे, कुछ लोग दुनिया में भी कंगाल हैं और आख़िरत में भी कंगाल होंगे, जबकि कुछ लोग दुनिया में भी खुशहाल हैं और आख़िरत में भी खुशहाल होंगे।
इसे अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि आमाल छह प्रकार के हैं और लोग चार प्रकार के हैं। छह प्रकार के आमाल इस प्रकार हैं : 1- जो व्यक्ति इस अवस्था में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी नहीं ठहराया, उसके लिए जन्नत वाजिब हो जाएगी। 2- जो व्यक्ति इस हालत में मरा कि किसी को अल्लाह का साझी ठहराया, उसपर जहन्नम वाजिब हो जाएगी और वह उसके अंदर हमेशा रहेगा। यही दोनों अमल वाजिब करने वाले हैं। 3- ऐसा नेकी का काम जिसका इरादा किया गया हो। जिसने कोई नेकी का काम करने की इच्छा मात्र किया और उसका इरादा सच्चा था कि उसे अपने दिल में महसूस किया और अल्लाह ने भी उसकी नीयत को जाना, फिर किसी कारणवश उस नेकी के काम को वह कर न सका, तो उसके लिए एक पूरी नेकी लिखी जाती है। 4- किया हुआ गुनाह का काम। जिसने कोई बुरा काम किया, उसके लिए एक गुनाह लिखा जाता है। यह दोनों ऐसे अमल हैं, जिनका प्रतिफल काम के बराबर ही मिलता है। 5- नेकी का ऐसा काम, जिसका सवाब उस काम का दस गुनाह मिलता है। जिसने किसी नेकी के काम का इरादा किया और उसे कर भी डाला, उसके लिए दस नेकियाँ लिखी जाती हैं। 6- नेकी का ऐसा काम, जिसका सवाब सात सौ गुना मिलता है। जिसने अल्लाह के मार्ग में कोई चीज़ खर्च की, तो उसके लिए नेकी का यह काम सात सौ गुना लिखा जाता है। यह दरअसल बंदों पर अल्लाह का अनुग्रह एवं कृपा है। जबकि चार प्रकार के लोग इस तरह हैं : 1- दुनिया में खुशहाल तथा सुखी-संपन्न एवं आख़िरत में कंगाल लोग, जो जहन्नम में जाएँगे। इनसे मुराद मालदार अविश्वासी लोग हैं। 2- दुनिया में कंगाल लेकिन आख़िरत में खुशहाल तथा जन्नत में जाने का सौभाग्य प्राप्त करने वाले लोग। इनसे मुराद निर्धन मोमिन हैं। 3- दुनिया तथा आख़िरत दोनों स्थानों में कंगाल लोग। इनसे मुराद निर्धन अविश्वासी हैं। 4- दुनिया तथा आख़िरत दोनों जगहों में खुशहाल लोग। इनसे मुराद धनवान् मोमिन हैं।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अनहुमा से वर्णित है, उन्होंने कहा कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "अल्लाह को यह प्रिय है कि उसके द्वारा दी गई छूट का लाभ उठाया जाए, जिस तरह उसे यह पसंद है कि उसके अनिवार्य आदेशों का पालन किया जाए।"
इसे इब्ने ह़िब्बान ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि अल्लाह इस बात को पसंद करता है कि शरई आदेशों और इबादतों में उसकी ओर से प्रदान की गई छूट, जैसे यात्रा के समय चार रकात वाली नमाज़ों का आधा पढ़ना तथा दो नमाज़ों को एक साथ एकत्र करके पढ़ना, आदि पर अमल किया जाए। जिस तरह उसे यह पसंद है कि उसके अनिवार्य आदेशों का पालन किया जाए। क्योंकि छूट तथा अनिवार्य आदेश दोनों के बारे में अल्लाह का निर्देश समान है।
अम्र बिन आमिर का वर्णन है कि अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अनहु ने कहा है : अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर नमाज़ के लिए वज़ू कर लिया करते थे। मैंने पूछा : आप लोग क्या करते थे? उन्होंने उत्तर दिया : हमारे लिए वज़ू उस समय तक काफ़ी हो जाता था, जब तक वज़ू भंग न हो जाए।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हर फ़र्ज़ नमाज़ के लिए वज़ू कर लिया करते थे, चाहे वज़ू न भी टूटे। ऐसा आप सवाब तथा प्रतिफल प्राप्त करने के लिए करते थे। यह अलग बात है कि जब तक वज़ू न टूटे इन्सान एक ही वज़ू से एक से अधिक फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ सकता है।