





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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असमा बिंत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहती हैं कि हमने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जीवनकाल में एक घोड़ा ज़िबह किया और उसे खाया। एक रिवायत में है कि उस समय हम मदीने में थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।असमा बिंत अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि लोगों ने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में एक घोड़ा ज़बह किया और उसे खाया। इस हदीस से मालूम होता है कि घोड़े का मांस खाना जायज़ है। कोई यह न समझे कि चूँकि क़ुरआन की इस आयत में घोड़े का ज़िक्र गधा तथा खच्चर के साथ किया गया है, इसलिए इसे खाना जायज़ नहीं है। अल्लाह का फ़रमान हैः {घोड़े, खच्चर और गधों को (हमने इसलिए पैदा किया है) ताकि तुम इनपर सवारी करो और ये शोभा का सामान भी हैं और वह ऐसी वस्तु सृष्टि करता है, जो तुम नहीं जानते।} [सीरा अन-नह्लः 8]
उक़बा बिन आमिर (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मेरी बहन ने यह मन्नत मानी कि वह नंगे पाँव पैदल अल्लाह के पवित्र घर की यात्रा करेगी। फिर मुझसे कहा कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछकर आऊँ। मैंने आपसे पूछा तो फ़रमायाः वह चले भी और सवार भी हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इनसान की प्रवृत्ति है कि वह भावनाओं में बहकर कभी-कभी अपने ऊपर ऐसे कार्यों को अनिवार्य कर लेता है, जो उसपर भारी पड़ते हैं। लेकिन हमारी शरीयत ने संतुलन बनाए रखने का आदेश दिया है तथा इबादत के मामले में अपने ऊपर अधिक बोझ डालने से मना किया है, ताकि उसे जारी रखा जा सके। इस हदीस में उक़बा की बहन ने उनसे माँग की कि वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछें कि उन्होंने अल्लाह के पवित्र घर काबा की यात्रा खाली पैर पैदल चलकर करने की मन्नत मानी है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने देखा कि यह महिला कुछ चलने की शक्ती रखती है, इसलिए उन्हें शक्ति अनुसार चलने और विवश होने की दशा में सवार होने का आदेश दिया।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पालतू गधों का मांस खाने से मना फ़रमाया है और घोड़े का मांस खाने की अनुमति दी है। तथा केवल मुस्लिम की रिवायत में है कि वर्णनकर्ता कहते हैंः हमने ख़ैबर के दिनों में घोड़े तथा नीलगाय का मांस खाया और अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पालतू गधों का मांस खाने से मना किया है। अब्दुल्लाह बिन अबू औफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि खैबर के युद्ध के दिनों में हमें सख़्त भूख का सामना था। जब ख़ैबर विजय का दिन आया, तो हमने घरेलू गधों को लेकर ज़िबह कर डाला। जब हाँडियाँ उबलने लगीं, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की ओर से एक व्यक्ति ने एलान किया कि हाँडियों को उलट दो। तथा वर्णनकर्ता कभी- कभी यह भी कहते थे कि घरेलू गधों का मांस बिलकुल न खाओ। अबू सालबा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने घरेलू गधों का मांस हराम किया है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) बता रहे हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने घरेलू गधों का मांस खाने से मना किया है तथा घोड़े और जंगली गधों का मांस खाने की अनुमति दी है। इसी तरह अब्दुल्लाह बिन अबू औफ़ा (रज़ियल्लाहु अंहुमा) बता रहे हैं कि ख़ैबर युद्ध के दिनों में उन्हें बड़ी भूख का सामना करना पड़ा। जब ख़ैबर जीत लिया गया, तो उन्होंने वहाँ से प्राप्त गधों को ज़बह किया और पकाना शुरू कर दिया। लेकिन जब मांस पक गया, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने आदेश दिया कि उसे न खाया जाए और हांडियों को उलट दिया जाए।
अब्दुर्रहमान बिन समुरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः ऐ अब्दुल रहमान बिन समुरा! सत्ता न माँगो, क्योंकि यदि माँगने पर सत्ता दिए गए, तो तुम उसी के हवाले कर दिए जाओगे, तथा यदि बिना माँगे सत्ता दिए गए, तो उसके निर्वाहण में तुम्हारी सहायता की जाएगी। तथा जब तुम किसी बात की क़सम खाओ और अन्य बात को उससे उत्तम देखो, तो क़सम का कफ़्फ़ारा दो और वह करो, जो उत्तम हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कोई प्रशासनिक पद माँगकर लेने से मना फ़रमाया है, इसलिए कि यदि किसी को माँगने के कारण पद मिलता है, तो उसकी सहायता नहीं की जाती और उसे असहाय छोड़ दिया जाता है, क्योंकि वह दुनिया चाहता है और उसे आखिरत पर तरजीह देता है। जबकि जो बिना माँगे पद प्राप्त करता है, अल्लाह उसे संभालने के संबंध में उसकी सहायता करता है। इस हदीस में यह भी बताया गया है कि क़सम किसी अच्छे कार्य से रोक नहीं सकती। यदि क़सम खाने वालेे को लगे कि भलाई क़सम को तोड़नेे ही में है, तो उसके लिए जायज़ है कि कफ़्फ़ारा देकर क़सम से छुटकारा प्राप्त कर ले और वह कार्य करे, जो अच्छा है।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़िल्लाहु अनहु) कहते हैंः लोग क़ुबा में अभी सुब्ह की नमाज़ पढ़ ही रहे थे कि अचानक एक व्यक्ति उनके पास आकर बोलाः आज रात अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर क़ुरआन की आयत उतरी है और आपको क़िब्ला बदलने का आदेश दिया गया है, अतः तुम काबे की ओर मुँह कर लो। उस समय लोगों का मुँह शाम की ओर था, परन्तु एलान सुनते ही सभी ने काबे की ओर मुँह कर लिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।एक सहाबी मदीने से निकलकर मदीने के बाहरी क्षेत्र में स्थित क़ुबा मस्जिद पहुँचे, तो देखा कि वहाँ के लोगों को क़िबला बदल जाने की सूचना नहीं मिली है और वे अभी तक पहले क़िबले की ओर मुँह करके नमाज़ पढ़ रहे हैं। अतः, उन्हें क़िबला बदलकर काबा के क़िबला होने की बात कही और बताया कि इस संबंध में क़ुरआन की आयत भी उतरी है। उनका इशारा इस आयत की ओर थाः {हम देख रहे हैं कि तुम आकाश की ओर अपना चेहरा कर रहे हो। हम निश्चय ही तुम्हें एक ऐसे क़िबले की ओर फेर देंगे, जिससे तुम प्रसन्न हो जाओगे। तो अपना मुँह मस्जिद-ए-हराम की ओर कर लो और जहाँ भी रहो, उसी की ओर मुँह करो और निश्चय जो लोग पुस्तक वाले हैं, जानते हैं कि यही उनके रब की ओर से है और सत्य है, और अल्लाह तुम्हारे कर्मों से अचेत नहीं है।} [सूरा अल-बक़राः 144] उन्होंने यह भी बताया कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने काबा की ओर मुँह कर लिया है। चुनांचे सहाबा की सूझबूझ और समझदारी देखिए कि उन्होंने बिना समय गँवाए पहले क़िबला बैतुल मक़दिस की ओर से मुँह फेरकर दूसरे क़बला काबा की ओर मुँह कर लिया।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) रिवायत करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः बिलाल रात रहते ही अज़ान देते हैं, अतः तुम इब्ने उम्मे मकतूम की अज़ान सुनने तक खाते- पीते रहो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दो मुअज़्ज़िन थे; बिलाल बिन अबू रबाह और अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम, जो कि दृष्टिहीन थे (रज़ियल्लाहु अंहुमा)। बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) फ़ज्र की अज़ान, फ़ज्र के समय से पहले ही देते थे। इसका कारण यह था कि यह सोने का समय है(यानी लोग फज्र की नमाज़ से पहले नींद में होते हैं) और लोगों को नमाज़ का निर्धारित समय आने से पहले से तैयारी की आवश्यकता होती है। अतः, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने साथियों को सूचित करते थे कि बिलाल (रज़ियल्लाहु अंहु) रात रहते ही अज़ान देते हैं। सो, फ़ज्र तुलू (फज्र का समय आने तक, जिस में फज्र की नमाज़ अदा की जाती है) होने तक खाते-पीते रहो, यहाँ तक कि दूसरे मुअज़्ज़िन यानी अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम (रज़ियल्लाहु अंहु) अज़ान दे दें, जो कि द्वितीय फ़ज्र तूलू होने पर अज़ान दिया करते हैं। यह आदेश उस व्यक्ति के लिए है, जो रोज़ा रखना चाहे। क्योंकि यही वह समय है, जब उसे खाना-पीना छोड़ना है और नमाज़ का समय दाख़िल हो जाता है। यह आदेश फ़ज्र की नामज़ के साथ खास है। उसके अतिरिक्त किसी अन्य नमाज़ की अज़ान समय प्रवेश करने से पहले देना जायज़ नहीं है। फिर फ़ज्र की नमाज़ की पहली अज़ान के बारे में मतभेद है कि क्या फ़ज्र की नमाज़ के लिए वही काफ़ी है या समय दाख़िल होने पर दूसरी अज़ान देना ज़रूरी होगी? अधिकतर उलमा के निकट वह अज़ान देना सही तो है, परंतु उसी पर बस नहीं किया जाएगा।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से रिवायत है, वह कहते हैंः जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके साथी मक्का आए, तो बहुदेववादियों ने कहाः तुम्हारे यहाँ ऐसे लोग आ रहे हैं, जिन्हें यसरिब के बुखार ने दुर्बल बना दिया है! यह सुनकर अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों को आदेश दिया कि शुरू के तीन चक्करों में दुलकी चाल से चलें, किन्तु काबा के यमनी रुक्न और हजर-ए- असवद वाले रुक्न के बीच साधारण चाल से चलें। उन्हें सभी चक्करों में दुलकी चाल से चलने का आदेश केवल इसलिए नहीं दिया गया कि उनके साथ आसानी बरती जाए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) सन छः हिजरी में उमरा के इरादे से मक्का आए। साथ में बहुत-से सहाबी भी थे। उधर मक्का के काफ़िर आपसे युद्ध करने तथा आपको अल्लाह के घर काबा से रोकने के लिए निकल पड़े। फिर अंततः, सुलह हो गई। जिसके अनुसार आपको उस साल वापस जाना था और आने वाले साल उमरा के लिए आना था। वे मक्का में केवल तीन दिन रुक सकते थे। अतः, आप सन सात हिजरी में पिछले साल का बाकी उमरा अदा करने के लिए आए। ऐसे में मुश्रिकों ने अपने दिलों को सुकून पहुँचाते और मुसलमानों की हालत पे खुश होते हुए एक-दूसरे से कहाः देखो, तुम्हारे यहाँ ऐसे लोग आ रहे हैं, जिन्हें यसरिब के बुख़ार ने दुर्बल बना दिया है। जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को इसकी सूचना मिली, तो उन्हें जवाब देने और उनके क्रोध को और बढ़ाने का मन बना लिया। अपने साथियों को आदेश दिया कि तवाफ़ के समय शुरू के तीन चक्करों में तेज़-तेज़ क़दमों से चलें। हाँ, यमनी रुक्न और हजरे असवद वाले रुक्न के बीच साधारण चाल ही चलें। साधारण चाल चलने का आदेश आप ने मुसलमानों का ख़याल रखते हुए दिया। वैसे भी, जब वे उक्त दोनों रुक्न के बीच होते, तो बहुदेववादियों की नज़रों से ओझल हो जाते थे, जो मुसलमानों को तवाफ़ करते हुए देखने के लिए 'क़ुऐक़िआन' पहाड़ी पर चढ़ गए थे। जब बहुदेववादियों ने मुसलमानों को तेज़-तेज़ कदमों से तवाफ़ करते हुए देखा, तो उनके द्वेष की भावना और तेज़ हो गई। कहने लगेः यह लोग तो हिरण के बच्चों जैसे फुरतीले दिखाई पड़ते हैं! बाद में, इसे मक्का आने वालों के लिए तवाफ़ के समय, सुन्नत बना दिया गया। ताकि हम अपने गुज़रे हुए लोगों को याद रखें और विपरीत परिस्थितियों में उनके धैर्य तथा इस्लाम के लिए पेश की जाने वाली उनकी क़ुरबानियों और कारनामों को आदर्श मानते हुए उनके पद्चिह्नों पर चलें। अल्लाह हमें उनके अनुसरण तथा उनके पद्चिह्नों पर चलने की सामर्थ्य प्रदान करे। याद रहे कि दोनों रुक्नों के बीच तेज़ चलने के बजाय साधारण चाल चलने का आदेश मंसूख (निरस्त) हो चुका है। क्योंकि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) 'हज्जतुल वदा' के अवसर पर हजरे असवद से हजरे असवद तक तेज़-तेज़ कदमों से चले। इमाम मुस्लिम ने जाबिर और इब्ने उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से रिवायत किया है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हजरे असवद से हजरे असवद तक तीन चक्कर तेज़-तेज़ कदमों से चले और चार चक्करों में साधारण चाल चले।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्ल्लाहु अंहुमा) से वर्णित है, कहते हैंः एक दिन मैं हफ़सा के घर की छत पर चढ़ा, तो देखा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) शाम (प्रांत) की ओर मुँह करके तथा काबा की ओर पीठ करके शौच कर रहे हैं। तथा एक रिवायत में हैः आप बैतुल मक़्दिस की ओर पीठ किए हुए थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) बयान करते हैं कि एक दिन वह अपनी बहन तथा अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पत्नी हफ़सा (रज़ियल्लाहु अंहा) के यहाँ आए और उनके घर के ऊपर चढ़े, तो देखा कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) शौच कर रहे हैं और आपका चेहरा शाम की ओर तथा पीठ काबा की ओर है। दरअसल, अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने यह बात उन लोगों का खंडन करते हुए कही थी, जिनका कहना था कि बैतुल मक्दिस की ओर चेहरा करके शौच करना सही नहीं है। यही कारण है कि इस किताब के संकलनकर्ता ने इसके पश्चात् दूसरी रिवायत का उल्लेख किया है, जिसमें है कि आपका चेहरा बैतुल मक़्दिस की ओर था। अतः, यदि कोई शौचालय के अंदर क़िबला की ओर मुँह करके शौच करे, तो कोई बात नहीं है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से रिवायत है, कहते हैंः नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हज्जतुल वदा के अवसर पर ऊँट पर सवार होकर तवाफ़ किया। आप मुड़े हुए किनारे वाली छड़ी से हजरे असवद को छू रहे थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हज्जतुल वदा के अवसर पर काबा का तवाफ़ किया। लोगों की बड़ी भीड़ थी। कुछ लोग आपको तवाफ़ करते हुए देखना चाहते थे और कुछ लोग आपको एक नज़र देखने के लिए बेताब थे। इस तरह हर तरफ़ लोग ही लोग थे। ऐसे में आप अपनी उम्मत पर कृपा करते हुए और उनके बीच समानता का ध्यान रखते हुए ऊँट पर सवार होकर तवाफ़ करने लगे; ताकि सब लोग बराबर रूप से आप को देख सकें। आपके साथ एक छड़ी भी थी, जिसका एक सिरा मुड़ा हुआ था। आप उसीसे रुक्न को छू लेते और छड़ी को बोसा देते। जैसा कि इसी हदीस की मुस्लिम की रिवायत में है।