Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way






























Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) काबा के चारों रुक्नों में से केवल हजरे असवद वाले रुक्न और यमनी रुक्न को छूते थे। चारों रुक्नों में पूरबी रुक्न की दो विशेषताएँ (फ़ज़ीलतें) हैंः 1. वह इबराहीम (अलैहिस्सलाम) की रखी हुई नींव पर क़ायम है। 2. उसमें हजरे असवद लगा हुआ है। जबकि यमनी रुक्न की एक ही विशेषता है। वह इबराहीम (अलैहिस्सलाम) की रखी हुई नींव पर क़ायम है। लेकिन शामी और इराक़ी रुक्न को इस तरह की कोई विशेषता प्राप्त नहीं है। क्योंकि उनकी बुनियाद इबराहीम (अलैहिस्सलाम) की रखी हुई नींव पर नहीं है। यही कारण है कि हजरे असवद को छूना और बोसा देना और यमनी रुक्न को बोसा देना तो नहीं, लेकिन छूना शरई काम है। लेकिन शेष दो रुक्नों को छूना और बोसा देना शरई काम नहीं है। यहाँ यह ध्यान में रहे कि शरीयत की बुनियाद अनुसरण पर है। यहाँ अपनी ओर से कोई नई चीज़ रिवाज देने की अनुमति नहीं है। वैसे अल्लाह के हर शरई निर्णय में बहुत-सी हिकमतें छिपी हुई हैं।
अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सेवक अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) बयान करते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब शौच के स्थान पर जाते, तो वह और उनके साथ एक और लड़का आपके लिए चमड़े के बरतन में इस्तिंजा का पानी लेकर जाते, इसी तरह एक छोटी-सी बरछी भी लेकर जाते, जिसे ज़मीन पर गाड़ देते और उसपर चादर या इस तरह की कोई ओर चीज़ डाल देते, जो गुज़रने वालों की नज़र से बचाने का काम करती। साथ ही यदि नमाज़ पढ़ने का इरादा होता, तो वह सुतरा का भी काम देती।
देहात के लोग चूँकि अल्लाह की ओर से मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) पर उतरने वाली शरीयत को सीख नहीं सके थे, इसलिए उनके अंदर अज्ञानता और उद्दंडता जैसी चीज़ें मौजूद थीं। एक दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने साथियों के साथ मस्जिदे नबवी में बैठे थे कि एक देहाती आया और उसे एक साधारण स्थान समझकर उसके एक किनारे में पेशाब करने लगा। सहाबा के दिल में चूँकि मस्जिद का बड़ा सम्मान था, इसलिए उसका यह काम उनपर भारी पड़ा। अतः, उन्होंने उसे पेशाब करते देख डाँटना शुरू कर दिया। लेकिन, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने, जो आदर्श व्यवहार के स्वरूप थे और खुशखबरी देने वाले तथा आसानी पैदा करने वाले के रूप में आए थे, उन्हें डाँटने से मना किया। क्योंकि आप अरबों का स्वभाव जानते थे। साथ ही डाँटने से उसका शरीर अथवा कपड़ा गंदा हो सकता था और अचानक पेशाब रुकने के कारण उसे नुकसान भी पहुँच सकता था। यह भी उद्देश्य सामने था कि डाँटने के बजाय बाद में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब उसे समझाएं तो वह आप की बात क़बूल करे। आपने आदेश दिया कि उसके पेशाब के स्थान को एक बालटी पानी बहाकर साफ कर लिया जाए।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) शाम आए। चूँकि वह एक प्रतिष्ठित एवं ज्ञानवान सहाबी थे, इसलिए लोग उनके स्वागत के लिए निकले। सहीह मुस्लिम की रिवायत में यही है कि "शाम आए", लेकिन उसका अर्थ हैः "जब वह शाम आए थे, तो वापसी के समय हम उनके स्वागत के लिए निकले।" यहाँ वापसी की बात का उल्लेख मालूम होने के कारण नहीं किया गया। क्योंकि जब वह शाम से आ रहे थे, तो वे उनसे मिलने के लिए बसरा से निकले थे। वर्णनकर्ता, (जो खुद भी स्वागत करने वालों में शामिल थे), कहते हैं कि उन्होंने अनस बिन मालिक को देखा कि वे गधे पर सवार होकर नमाज़ पढ़ रहे हैं और क़िब्ला उनकी दाईं जानिब है। अतः इस विषय में उनसे पूछ ही डाला। चुनांचे वह बोले कि उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ऐसा करते देखा है। यदि उन्होंने आपको ऐसा करते न देखा होता, तो ऐसा न करते।
उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से पूछा कि उन को माहवारी के दिनों के अतिरिक्त भी बराबर खून आता है, ऐसे में उन्हें क्या करना चाहिए? तो आपने जवाब दिया कि वह स्नान कर लें। अतः, वह हर नमाज़ के लिए स्नान करती थीं। उन्हें यह बीमारी, जिसे अरबी में इस्तिहाज़ा कहा जाता है, सात साल तक रही। इस्तिहाज़ा से स्त्रियों को कभी-कभी जूझना पड़ता है। साधारणतया स्त्रियों को हर महीने में कुछ दिन ऋतु का रक्त आता है, जिसे वे उसके लक्षणों से पहचान लेती हैं। दरअसल, उम्मे हबीबा (रज़ियल्लाहु अंहा) हर नमाज़ के लिए स्नान नफ़ली तौर पर करती थीं।
नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ठहरे हुए पानी में, जो बहता न हो, पेशाब करने से मना किया है। क्योंकि इससे पानी गंदा होता है और कभी-कभी पेशाब के माध्यम से उसमें कुछ बीमारियाँ प्रवेश कर जाती हैं, जो पानी का प्रयोग करने वाले हर व्यक्ति को हानि पहुँचा सकती हैं। बल्कि ऐसा भी संभव है खुद पेशाब करने वाले को उस पानी से नहाना पड़े। तो आदमी उस पानी में पेशाब कैसे कर सकता है, जिससे बाद में खुद उसीको पवित्रता प्राप्त करनी हो? इसी तरह, ठहरे हुए पानी से जनाबत का स्नान करने से मना किया है। क्योंकि इससे पानी में जनाबत की गंदगियाँ प्रवेश कर जाती हैं।
एक दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने साथियों को फ़ज्र की नमाज़ पढ़ाई। नमाज़ पढ़ चुके तो देखा कि एक आदमी ने उनके साथ नमाज़ नहीं पढ़ी। चूँकि आप बड़े दयालु थे तथा अल्लाह की ओर बुलाने का कार्य कैसे किया जाए, इसका पूर्ण ज्ञान रखते थे, इसलिए उसे डाँटने के बजाय उससे जमाअत में शरीक न होने का कारण जानना चाहा। फ़रमायाः ऐ अमुक, तुम ने लोगों के साथ नमाज़ क्यों नहीं पढ़ी? उसने (अपनी समझ के अनुसार) कारण यह बताया कि वह जुंबी (उसे नापाकी पहुंची है) है और उसके पास पानी नहीं है, अतः उसने पानी मिलने तथा पवित्रता प्राप्त करने तक नमाज़ को विलंब करने का निर्णय लिया है। यह सुनकर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह ने तुम्हें (अपनी कृपा से) पवित्रता प्राप्त करने के लिए पानी के स्थान पर एक और वस्तु प्रदान की है। अर्थात मट्टी दी है। तुम उसका प्रयोग कर लो। वह तुम्हारे लिए पानी के स्थान पर पर्याप्त है।