





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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जाबिर बिन अब्दुल्लाह -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक यात्रा पर थे, कि एक भीड़ देखी, जहाँ एक व्यक्ति के लिए छाँव का प्रबंध किया गया था। आपने पूछा कि : "यह क्या है?" तो लोगों ने बताया कि यह रोज़ेदार है। आपने फ़रमाया : "यात्रा में रोज़ा रखना पुण्य का कार्य नहीं है", तथा सहीह मुस्लिम की एक रिवायत में है : "तुम अल्लाह की ओर से मिली हुई छूट को सहृदय स्वीकार करो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक यात्रा पर थे। यात्रा के दौरान आपने एक व्यक्ति के पास लोगों की भीड़ देखी, जिसपर सूरज की गर्मी और अत्यधिक प्यास के कारण छाया किया गया था। आपने पूछा : इसे क्या हुआ है? लोगों ने कहा : यह रोज़ेदार है। तो आपने फ़रमाया : यात्रा में रोज़ा रखना पुण्य का कार्य नहीं है, तुम अल्लाह की उस छूट को स्वीकार करो जो उसने तुम्हें दी है।
अबू दर्दा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ रमज़ान के महीने में सख्त गर्मी के समय एक यात्रा पर निकले। स्थिति यह थी कि सख्त गर्मी के कारण, हम अपने सिर पर अपना हाथ रख लिया करते थे। उस समय, हमारे बीच अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और अब्दुल्लाह बिन रवाहा- रज़ियल्लाहु अन्हु- के सिवा कोई रोज़े से नहीं था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू दर्दा -रज़ियल्लाहु अनहु- बयान करते हैं कि वे रमज़ान के महीने में एक यात्रा में निकले। यह सख्त गर्मी का समय था। गर्मी इतनी सख्त थी कि लोग गर्मी से बचने के लिए अपने सरों पर अपने हाथ रख लिया करते थे। उस यात्रा में (रमज़ान का महीना होने के बावजूद) केवल अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और अब्दुल्लाह बिन रवाहा -रज़ियल्लाहु अनहु- ने रोज़ा रखा था। उन दोनों ने तकलीफ़ उठाकर रखा था। इससे प्रमाण मिलता है कि यात्रा के दौरान ऐसी कठिनाई के साथ रोज़ा रखने की अनुमति है, जिससे जान का ख़तरा न हो।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- वर्णन करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: मुसलमान को उसके घोड़े और गुलाम की ज़कात नहीं देनी है। एक अन्य रिवायत में ये शब्द भी आए हैं: परन्तु गुलाम की ओर से फ़ितरा देना है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।ज़कात की बुनियाद बराबरी और न्याय पर है। इसीलिए अल्लाह ने ज़कात धनवानों के ऐसे धन पर अनिवार्य की है, जो बढ़ने वाले हों और बढ़ने के लिए रखे गए हों, जैसे ज़मीन की पैदावार और व्यापार के सामान। जहाँ तक उन धनों का संबंध है, जिनके अंदर वृद्धि नहीं होती, यानी ऐसे धन जो अपने दख़ल में तथा व्यक्तिगत उपयोग के लिए हों, तो उनपर ज़कात नहीं है, क्योंकि यह स्वयं उसके प्रयोग के लिए होते हैं। इसके उदाहरणस्वरूप हम किसी की सवारी, जैसे घोड़ा, ऊँट, गाड़ी आदी और उसकी सेवा करने वाले दास, बिस्तर और प्रयोग के लिए रखे गए बरतन आदि को ले सकते हैं। लेकिन दास का फ़ितरा देना होगा, चाहे वह व्यापार का न भी हो, क्योंकि फ़ितरा का संबंध धन से नहीं, बल्कि शरीर से है।
अब्दुल्लाह बिन उमर- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने निरंतर रोज़ा रखने से मना किया। लोगों ने कहा कि आप तो निरंतर रोज़े रखते हैं? आपने फ़रमाया: मैं तुम्हरे जैसा नहीं हूँ। मुझे खिलाया और पिलाया जाता है। अबू सईद खुदरी- रज़िल्लाहु अन्हु- की रिवायत में हैः "तुममें से जो निरंतर रोज़े रखना चाहे, वह सेहरी के समय तक रखे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अपने साथियों को, उनपर दया तथा कृपा करते हुए, इफ़तार किए बिना निरंतर रोज़े रखने से मना किया है। परन्तु सहाबा पुण्य-प्रेम और अल्लाह की निकटता प्रदान करने वाले कार्यों की चाहत के कारण, नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पदचिह्नों पर चलते हुए, निरंतर रोज़ा रखने की रग़बत रखते थे। यही कारण है कि उन्होंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, आप तो लगातार रोज़ा रखते हैं? जिसका उत्तर आपने यह दिया कि अल्लाह आपके अंदर खाने-पीने के नतीजे में पैदा होने वाली शक्ति की तरह ऐसी शक्ति प्रदान कर देता है कि आपको खाने-पीने की आवश्यकता नहीं रहती। हाँ, यदि तुममें से कोई निरंतर रोज़ा रखना ही चाहे, तो फ़ज्र से पहले तक रखे। शरीयत-ए-इस्लामी एक उदार एवं आसान शरीयत है। इसमें न कठिनाई है न मशक़्क़त, न अतिशयोक्ति है न अतिवाद। क्योंकि यह एक तरह से नफ़्स को यंत्रणा देना और उसपर अत्याचार करना है, जबकि अल्लाह किसी पर उसकी शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता। इसका एक और कारण भी है। जहाँ आसानी होगी, वहाँ अमल अधिक समय तक जारी रह सकेगा और उकताहट के कारण अमल से पीछे हट जाने का डर भी कम रहेगा। साथ ही इसमें वह न्याय भी है जो अल्लाह ने धरती में रखा है। यानी अल्लाह को उसका हक़ देते हुए उसकी इबादत करना और नफ़्स को वह चीज़ें देना, जो उसे प्रबल रखने के लिए आवश्यक हों।
मुहम्मद बिन अब्बाद बिन जाफर कहते हैं किः मैंने जाबिर बिन अब्दुल्लाह- रज़ियल्लाहु अन्हु- से पूछा कि क्या अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने विशेष रूप से शुक्रवार के दिन का रोज़ा रखने से मना किया है? तो फ़रमायाः हाँ। एक रिवायत में हैः "काबा के रब की क़सम!"
इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।चूँकि जुमा का दिन मुसलमानों के लिए ईद का दिन है, इसलिए नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उस दिन विशेष रूप से रोज़ा रखने अथवा नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमाया है। हाँ, यदि उससे पहले अथवा उसके बाद एक दिन रख लिया जाए या किसी के मामूल के रोज़ों में जुमे का दिन आ जाए, तो कोई हर्ज नहीं है। इससे मना इसलिए किया गया है, ताकि जनसाधारण में यह संदेश न जाए कि उस दिन अन्य दिनों के मुक़ाबले में अधिक इबादत करना वाजिब है।
आइशा- रज़ियल्लाहु अन्हा- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो रोज़ा बाक़ी छोड़कर मर जाए, उसका वली (अभिभावक या करीबी रिश्तेदार) उसकी ओर से रोज़ा रखेगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहती हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उस व्यक्ति के अभिभावक को, जो अपने ज़िम्मे फ़र्ज़ रोज़ा, जैसे कफ़्फ़ारा, मन्नत या रमज़ान का रोज़ा छोड़कर मर जाए, आदेश दिया है कि उसकी ओर से रोज़ा रखे, क्योंकि यह मृतक पर क़र्ज़ है। याद रहे कि मृतक के क़रीबी रिश्तेदार उसकी ओर से रोज़ा रखने के सबसे हक़दार हैं, क्योंकि यह उसपर उपकार और उसके नाते का हक़ अदा करना है। वैसे, यह आदेश इसतेहबाब के लिए है और इसका अनुपालन वाजिब नहीं है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि एक व्यक्ति, अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और बोलाः ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी माँ मर गई है और उसपर एक महीने का रोज़ा है, ऐसे में क्या मैं उसकी तरफ़ से रोज़ा रख लूँ? आपने फ़रमायाः यदि तेरी माँ पर क़र्ज होता, तो क्या तू उसकी ओर से उसे अदा करता? उसने कहाः ज़रूर! तो फ़रमायाः फिर तो अल्लाह का कर्ज इस बात का अधिक हक़दार है कि उसे अदा किया जाए। एक दूसरी रिवायत में हैः एक औरत अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर कहने लगी कि ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी माता की मृत्यु हो गई है और उसपर मन्नत का रोज़ा है। ऐसे में, क्या मैं उसकी ओर से रोज़ा रख सकती हूँ? आपने फ़रमायाः "यदि तेरी माँ पर क़र्ज होता, तो क्या तू उसे अदा करती?" उसने कहाः अवश्य! तो फ़रमायाः "फिर अपनी माँ की ओर से रोज़ा रख ले।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में दो रिवायतें हैं और हदीस के प्रसंग से लगता है कि दोनों एक नहीं, बल्कि अलग-अलग घटनाएँ हैं। पहली रिवायत में है कि एक व्यक्ति नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्म- के पास आया और बताया कि उसकी माँ की मृत्यु हो गई है और उसके एक महीने के रोज़े बाक़ी हैं, तो क्या वह उसकी ओर से क़जा कर सकता है? जबकि दूसरी रिवायत में है कि एक महिला आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास आकर आपको बताती है कि उसकी माँ मर गई है और उसपर मन्नत का रोज़ा बाक़ी है, तो क्या वह उसकी ओर से रोज़ा रखेगी? आपने दोनों को फ़तवा दिया कि उनकी माताओं पर जो रोज़े हैं, वह उनकी ओर से उन्हें अदा करें और फिर इस बात को समझाने तथा स्पष्ट करने के लिए एक उदाहरण दिया। उनसे पूछा कि यदि उनके माता-पिता पर किसी व्यक्ति का क़र्ज़ होता, तो क्या वे उसे अदा करते? जब दोनों ने हाँ में जवाब दिया, तो बताया कि यह रोज़ा भी दरअसल उनके माता-पिता के ऊपर अल्लाह क़र्ज़ है। अतः जब इनसान का क़र्ज़ अदा किया जाएगा, तो अल्लाह का क़र्ज़ तो इस बात का अधिक हक़ रखता है कि उसे अदा किया जाए।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को अरफ़ात में प्रवचन देने के दौरान (एहराम वाले व्यक्ति के बारे में) कहते हुए सुनाः जो जूता न पाए, वह मोज़ा पहन ले और जो तहबंद न पाए, वह पाज़ामा पहन ले।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन अब्बास -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- बता रहे हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अरफ़ात के मैदान में लोगों संबोधित किया, तो जूते न होने की सूरत में मोज़े पहनने की अनुमति दी और नीचे से काटने का ज़िक्र नहीं किया तथा तहबंद न मिलने की अवस्था में पजामा पहनने की अनुमति दी और उसे फ़ाड़ने की शर्त नहीं लगाई। दरअसल यह हिकमत वाले एवं पवित्र अल्लाह की ओर से बोझ हल्का करने का उदाहरण है।
अबु हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जानवरों से होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति नहीं है, कुएँ में गिरने से होने वाली क्षति की क्षितपूर्ति नहीं है, खान में काम करते समय होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति नहीं है तथा ज़मीन में दफ़न ख़ज़ाने का पाँचावाँ भाग देना है।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।यहाँ अबू हुरैरा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से जानवर, कुएँ में गिरने तथा खान से होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति का हुक्म नक़ल कर रहे हैं। आपने बताया है कि जानवर के माध्यम से जो क्षति हो, उसमें किसी पर कोई क्षतिपूर्ति नहीं है। इसी तरह कुएँ में उतरने के कारण यदि कोई मर जाए या खान के अंदर घुसने के बाद कोई मर जाए, तो उसमें भी कोई क्षतिपूर्ति नहीं है। क्योंकि जानवर, कुएँ और खान पर क्षतिपूर्ति का दायित्व डाला नहीं जो सकता और न उसके मालिक पर डाला जा सकता है, जब तक उसकी ओर से कोई अत्याचार या लापरवाही न हो। फिर बताया कि जिसे ज़मीन में धफ़न ख़ज़ाना मिले, चाहे कम हो अधिक, उसे उसका पाँचवा भाग अदा करना है। क्योंकि यह बिना मशक्कत और मेहनत के प्राप्त होने वाला धन है। पाँचवाँ भाग अदा कर देने के बाद जो बच जाए, वह उसी का है।