





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक व्यक्ति को कुरबानी का ऊँट हाँककर ले जाते देखा, तो फ़रमायाः "उसपर सवार हो जा।" उसने कहाः यह तो कुरबानी का जानवर है। आप ने कहाः "सवार हो जा।" चुनांचे मैंने देखा कि वह उसपर सवार होकर अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ चल रहा था। एक रिवायत में हैः आपने तीसरी या चौथी बार कहाः "हाय अफ़सोस! उसपर सवार हो जा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक व्यक्ति को देखा कि वह कुरबानी का ऊँट हाँककर ले जा रहा है, जबकि उसे उस पर सवार होने की आवश्यकता भी थी, तो उससे फ़रमायाः "इस पर सवार हो जा।" लेकिन चूँकि क़ुरबानी का जानवर लोगों की नज़रों में सम्मानित था और उसे कोई कष्ट नहीं दिया जा सकता था, इसलिए सहाबी ने कहा कि यह तो कुरबानी का ऊँट है, जो काबा की ओर ले जाया जा रहा है? तो उन्हें सख़्ती से संबोधित करते हुए और इस पर सवार होने की वैधता को स्पष्ट करते हुए कहा कि इस पर सवार हो जा, यद्यपि यह कुरबानी का जानवर ही क्यों न हो। चुनांचे इतना सुनने के बाद वह ऊँट पर सवार हो गए।
अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है : एक व्यक्ति जुमा के दिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) के घर, जो उनकी मृत्यु के बाद उनके कर्ज़ की अदायगी के लिए बिक गया था, की दिशा वाले द्वार से मस्जिद के अंदर आया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम उस समय खड़े हो कर ख़ुतबा दे रहे थे। वह आपकी ओर मुँह करके खड़ा हो गया, फिर बोला : ऐ अल्लाह के रसूल, माल-मवेशी हलाक हो गए और रास्ते अवरुद्ध हो गए। अल्लाह से दुआ करें कि हमें वर्षा प्रदान करे। तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने दोनों हाथ उठाए, फिर कहा : "ऐ अल्लाह, हमें वर्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह हमें वर्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह, हमें वर्षा प्रदान कर।" अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं : क़सम अल्लाह की, हमें आकाश में कोई छोटा-बड़ा बादल का टुकड़ा दिख नहीं रहा था, हमारे और सल्अ़ पहाड़ी के बीच न कोई छोटा घर था, न बड़ा। उनका कहना है कि अचानक सल्अ़ पहाड़ी के पीछे से ढाल की तरह एक बादल का टुकड़ा प्रकट हुआ। फिर आकाश के बीचों-बीच आकर फैल गया और बरसने लगा। क़सम अल्लाह की, हमने छः दिन तक सूरज नहीं देखा। फिर अगले जुमे को एक आदमी उसी दरवाज़े से अंदर आया। रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खड़े होकर ख़ुतबा दे रहे थे। वह आपकी ओर मुँह करके खड़ा हुआ और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल, माल-मवेशी हलाक हो गए और रास्ते अवरुद्ध हो गए। अल्लाह से दुआ करें कि हमसे वर्षा रोक ले। अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने दोनों हाथ उठाए और कहने लगे : "ऐ अल्लाह, अब हमारे ऊपर नहीं, हमारे आस-पास वर्षा प्रदान कर। ऐ अल्लाह, टीलों, पहाड़ियों, वादियों और पेड़ों के उगने के स्थानों पर बारिश उतार।" वह कहते हैं कि फिर देखते ही देखते बारिश थम गई और हम बाहर निकले तो धूप खिली हुई थी। शरीक कहते हैं : मैंने अनस बिन मालिक से पूछा कि क्या वह (दूसरी बार आने वाला) पहला व्यक्ति ही था? तो उन्होंने कहा : "मुझे नहीं मालूम।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैएक देहाती जुमा के दिन उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु के घर की दिशा वाले मस्जिद के पश्चिमी द्वार से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की मस्जिद में दाखिल हुआइ। उस समय नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खड़े खुत्बा दे रहे थे। उस व्यक्ति ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर मुँह किया, और कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मवेशी हलाक हो गए, और सवारी के जानवरों के मरने या भूख से कमज़ोर हो जाने के कारण रास्ते अवरुद्ध हो गए हैं, अतः अल्लाह से दुआ करें कि वह हमें वर्षा प्रदान करे। फिर आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने दोनों हाथ उठाकर फरमाया : ऐ अल्लाह! हम पर बारिश बरसा, ऐ अल्लाह! हम पर बारिश बरसा, ऐ अल्लाह! हम पर बारिश बरसा। अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु ने कहा : अल्लाह की क़सम, हमें आकाश में बादल का कोई टुकड़ा नहीं दिख रहा था, और हमारे (जो मस्जिद में थे) तथा मस्जिद के पश्चिम में स्थित सल्अ पहाड़ी, जहाँ से बादल आते हैं, के बीच कोई ऐसा छोटा या बड़ा घर नहीं था, जो हमें उसे देखने से रोकता। अनस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं: अचानक उसके पीछे से छोटी चपटी ढाल की तरह एक गोल बादल का टुकड़ा प्रकट हुआ। फिर जब वह मदीना के आकाश के बीचों-बीच आया, तो फैल गया और बरसने लगा। क़सम अल्लाह की, हमने अगले जुमे तक सूरज नहीं देखा। फिर अगले जुमे को वही आदमी उसी दरवाज़े से दाख़िल हुआ, जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम खड़े होकर ख़ुत्बा दे रहे थे। वह आपके सामने आकर खड़ा हो गया और कहने लगा : ऐ अल्लाह के रसूल, माल बर्बाद हो गया और रास्ते बन्द हो गये हैं। आप अल्लाह से दुआ करें कि वह हमसे बारिश रोक ले। वह कहते हैं : अतः आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपने हाथ उठाए, फिर फरमाया : ऐ अल्लाह! बारिश को हमारे आस-पास फेर दे, हम पर नहीं। ऐ अल्लाह! उसे ऊँची ज़मीनों जैसे टीलों पर, छोटी पहाड़ियों पर, घाटियों में और पेड़ों के उगने की जगहों पर बरसा। अनस रज़ियल्लाहु अन्हु कहते हैं : चुनांचे फौरन बारिश वाला बादल छँट गया और हम धूप में चलने फिरने लगे।
बरा बिन आज़िब- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि मैंने मुहम्मद- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ को ध्यान से देखा, तो पाया कि आपका क़याम, रुकू, रुकू के बाद सीधे खड़ा होना, सजदा, दो सजदों के बीच बैठना, उसके बाद का सजदा और सलाम एवं नमाज़ के स्थान से निकलने के बीच का अंतराल, यह सब लगभग बराबर होते थे। एक रिवायत में है कि क़याम और तशह्हुद के सिवा सारे कार्य लगभग बराबर होते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।बरा बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अंहु) जो रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को ध्यान से देखते रहते थे, ताकि आपकी नमाज़ को सीख सकें और उसी जैसी नमाज़ पढ़ सकें, कहते हैं कि आपकी नमाज़ के सभी अंग तुलनात्मक दृष्टि से मुनासिब और एक-दूसरे के करीब होते थे। आपका क़िराअत के लिए क़याम और तशह्हुद के लिए बैठना, दोनों रुकू, उसके बाद के क़याम और सजदे के अनुरूप होते थे। ऐसा नहीं होता था कि क़याम लंबा करें और रुकू हल्का, या सजदा लंबा करें और क़याम या बैठक हल्की। बल्कि हर रुक्न दूसरे रुक्न के अनुरूप होता। इसका मतलब यह नहीं है कि क़याम और तशह्हुद की बैठक रुकू और सजदे के बराबर होते थे। बल्कि इसका अर्थ यह है कि आप एक रुक्न को लंबा और दूसरे को हल्का नहीं करते थे।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि एक व्यक्ति अरफ़ा में ठहरा हुआ था कि अचानक अपने ऊँट से गिर पड़ा और उस की गरदन टूट गई। अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कहाः "इसे पानी और बेर के पत्तों से स्नान कराओ और उसे उसीके दो कपड़ों का कफ़न पहना दो। उसे न खुशबू लगाओ और न उसका सिर ढाँपो। क्योंकि उसे क़यामत के दिन इस हाल में उठाया जाएगा कि वह 'तलबिया' कह रहा होगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।हज्जतुल वदा के अवसर पर एक सहाबी अरफ़ा में अपनी सवारी पर एहराम की अवस्था में खड़े थे कि उससे गिर पड़ेे और उनकी गरदन टूट गई तथा वह मर गए। तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें आदेश दिया कि अन्य मुर्दों की तरह उन्हें पानी और बेर के पत्तों से स्नान कराया जाए और उनकी एहराम की लुंगी तथा चादर में कफ़न दे दिया जाए। चूँकि वह हज का एहराम बाँधे हुए थे और उनके शरीर पर इबादत के आसार बाक़ी थे, इसलिए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें खुशबू लगाने और उनके सिर को ढाँपने से मना कर दिया। साथ ही अपने साथियों को इसकी हिकमत भी बता दी। हिकमत यह है कि अल्लाह उन्हें उसी अवस्था में जीवित करके उठाएगा, जिस अवस्था में उनकी मृत्यु हुई है। वह तलबिया पुकार रहे होंगे, जो हज का खास चिह्न है।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- से रिवायत है कि उहुद के दिन एक आदमी ने नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहाः आप क्या कहते हैं कि अगर मैं शहीद हो गया, तो कहाँ रहूँगा? आपने कहाः "जन्नत में।" यह सुनकर उसने वह खजूरें फेंक दीं, जो उसके हाथ में थीं और लड़ने लगा, यहाँ तक कि शहीद हो गया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू क़तादा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- उमामा बिंत ज़ैनब (अपनी नातिन) को उठाए हुए नमाज़ पढ़ लेते थे। और अबुल-आस बिन रबी बिन अब्दे शम्स- रज़ियल्लाहु अन्हु- की रिवायत में है कि जब सजदे में जाते तो उन्हें रख देते और जब खड़े होते तो उठा लेते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपनी नवासी उमामा बिंत ज़ैनब को नमाज़ की हालत में उठा लेते थे। जब खड़े होते तो अपने कंधे पर उठा लेते और जब रुकू या सजदा करते तो ज़मीन में रख देते।
उम्मे अतिय्या- रज़ियल्लाहु अन्हा- से रिवायत है, वह कहती हैंः हमें जनाज़े के पीछे चलने से मना किया गया है, लेकिन इस मामले में हमपर सख़्ती नहीं बरती गई है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उम्मे अतिय्या अंसारी एक वरिष्ठ सहाबिया हैं। उनका कहना है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने स्त्रियों को जनाज़े के साथ चलने से मना किया है। इसका कारण यह है कि उनका दिल बड़ा नर्म होता है। उनके पास पुरुषों जैसा धैर्य और सहन शक्ति नहीं होती। अतः, उनके निकलने से रोने-धोने और फ़ितने का डर रहता है। परंतु, इसके बावजूद उन्होंने क़रीनों से यह समझा है कि यह मनाही ताकीद वाली नहीं है और इससे उसका हराम होना साबित नहीं होता। लेकिन सही यह है कि स्त्रियाँ जनाज़े के पीछे चल नहीं सकतीं। इब्ने दक़ीक़ अल-ईद कहते हैंः स्त्रियों के जनाज़े के पीछे चलने से मनाही के बारे में कई हदीसें मौजूद हैं, जो इस हदीस से अधिक सख़्ती पर दलालत करती हैं।