Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way






























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नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सामान्य रुप से फ़ज्र की नमाज़ में तिलावत लंबी करते थे और मग़रिब की नमाज़ में हल्की, जबकि इनके सिवा अन्य नमाज़ों में दरमियानी तिलावत करते थे। लेकिन कभी-कभी यह बताने के लिए ऐसा अनिवार्य नहीं है, इस आदत को छोड़ भी देते थे। जैसा कि इस हदीस में आया है कि आपने मग़रिब की नमाज़ में सूरा "वत-तूर" पढ़ी, जो तिवाल-ए-मुफस्सल की सूरतों में शामिल है।
नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- तथा आपके सत्यनिष्ठ ख़लीखों की आदत थी कि लोगों को ख़ुद ईद अल-फ़ित्र तथा ईद अल-अज़हा की नमाज़ पढ़ाते और ख़ुतबा देते थे तथा नमाज़ ख़ुतबा से पहले पढ़ते थे। यह तरीक़ा चलता रहा, यहाँ तक कि मरवान का युग आया, तो उसने नमाज़ से पूर्व ही ख़ुतबा दिया। लोगों ने सुन्नत की मुखालफत के कारण इसका विरोध किया, किन्तु बनू उमय्या के दौर में इसी पर अमल होता रहा, यहाँ तक कि बनू अब्बास का दौर आया, तो उन्होंने दाबारा तरीक़े को रिवाज दिया।
हमारे नबी मुहम्मद -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की शरीयत दूसरी आसमानी शरीयतों से इस मायने में भिन्न है कि इसमें उदारता एवं आसानी का ख़याल रखा गया है और बंदों की हर कठिनाई को या तो दूर किया गया है और कम करने का प्रयास किया गया है। इसका एक उदाहरण यह है कि शरीयत ने मुश्तरक समय वाली दो नमाज़ों को सफ़र में एक साथ पढ़ने की अनुमित दी है। असल तो यह है कि प्रत्येक नमाज़ को उसके समय पर ही पढ़ा जाए, किन्तु नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की आदत थी कि जब यात्रा में होते और लगातार चल रहे होते, तो ज़ोहर और अस्र को, ज़ोहर अथवा अस्र के समय में एक साथ पढ़ते और इसी प्रकार मग़रिब तथा इशा को मग़रबि अथवा इशा के समय में एक साथ पढ़ते थे। आप, आगे अथवा पीछे पढ़ने के मामले में अपनी तथा अपने साथियों की आसानी का ख़याल रखते थे। इस तरह, यात्रा दो नमाज़ों को, उनमें से किसी एक नमाज़ के समय में, एक साथ पढ़ने का उचित कारण है। क्योंकि, एक तो यह कि यात्रा में दोनों नमाज़ों का समय एक हो जाता है, साथ ही सफ़र कठिनाई का कारण हुआ करता है चाहे आदमी चल रहा हो या रुका हुआ हो और दो नमाज़ों को एक साथ पढ़ने की छूट आसानी पैदा करने के लिए दी गई है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अबूज़र ग़िफ़ारी रज़ियल्लाहु अनहु को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया है कि जब सब्ज़ी बनाएँ, तो उसमें अधिक पानी डालकर शोरबा अधिक बना लें और अपने पड़ोसियों का हाल मालूम करके उनको कुछ भेज दिया करें।
नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- आसानी पैदा करने का आदेश देते थे और ज़बान तथा कर्म द्वारा उसकी ओर बुलाते भी थे। आसानी पैदा करने का एक रूप यह है कि नमाज़ पढ़ाते समय हल्की नमाज़ पढ़ाई जाए। लेकिन इससे नमाज़ की संपूर्णता में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अनस बिन मालिक -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि उन्होंने जितने भी इमामों के पीछे नमाज़ पढ़ी है, उनमें सबसे हल्की नमाज़ सबसे बड़े इमाम यानी अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की होती थी। आपकी नमाज़, कभी पीछे नमाज़ पढ़ने वालों को भारी नहीं लगती और जब वह नमाज़ से निकलते तो उनके अंदर नमाज़ की चाहत बाक़ी होती थी। साथ ही, उनका यह भी कहना है कि उन्होंने आपसे से अधिक संपूर्ण नमाज़ किसी के पीछे नहीं पढ़ी। आप नमाज़ हमेशा वाजिब एवं मुसतहब चीज़ों का ख़याल रखते हुए संपूर्ण ढंग से पढ़ाते और उसमें कोई कमी नहीं रहने देते थे। इसे दरअसल आप -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की बरकत का एक नमूना ही कहा जा सकता है।
अबू क़िलाबा कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथी मालिक बिन हुवैरिस -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- हमारी मस्जिद में आए और फ़रमाया कि मैं तुम्हारे पास इसलिए आया हूँ, ताकि तुम्हें नमाज़ पढ़कर नमाज़-ए-नबवी अमली तरीक़े से सिखाऊँ, ताकि अमली अंदाज़ में दी गई शिक्षा ज़ेहन व दिमाग़ में अधिक बाक़ी रहे और समझ में भी अधिक आए। अबू क़िलाबा से वर्णन करने वाले वर्णनकर्ता ने उनसे पूछा मालिक बिन हुवैरिस, जिन्होंने आपको नमाज़-ए-नबवी सिखाई थी, उनकी नमाज़ कैसी थी? अबू क़िलाबा ने उत्तर दिया कि हमारे शैख अबू यज़ीद (कुछ लोगों ने अबू बुरैद भी कहा है) अम्र बिन सलमा जरमी की नमाज़ की तरह। आप सजदे से सर उठाकर खड़े होने से पूर्व थोड़ी देर बैठते थे।
बनू सलिमा, जिससे मुआज़ बिन जबल -रज़ियल्लाहु अनहु- का संबंध था, के घर मदीना के एक किनारे में अवस्थित थे। मुआज़ -रज़ियल्लाहु अनहु- नेकी के कामों बड़ी रग़बत रखते थे। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु से प्रेम और धर्म सीखने की चाहत में वह आपके साथ नमाज़ में शरीक होते और फिर आपके पीछे फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ लेने के बाद अपने गाँव वालों के पास जाकर उन्हें वही नमाज़ पढ़ाते थे, जो उनके हक़ में नफ़ल और गाँव वालों के हक़ में फ़र्ज़ होती थी। स्वयं अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को भी इसका ज्ञान था और आपने ख़ामोश सहमति जताई थी। लेकिन एक बार उन्होंने लंबी क़िरात कर दी, जबकि इस्लाम उदारता एवं आसानी का धर्म है और उसमें मुश्किल एवं कठिनाई पैदा करने जैसी चीज़ों, जिनके नतीजे में छिटकाने और बिदकाने का माहौल बनता है, का कोई स्थान नहीं है। जब अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को मालूम हुआ कि मुआज -रज़ियल्लाहु अनहु- लंबी क़िरात करते हैं, तो उन्हें बताया कि जब इमाम रहें तो हल्की क़िरात करें और उदाहरणस्वरूप औसात-ए-मुफ़स्सल की सूरतें, जैसे "سبح اسم ربك الأعلى", "والشمس وضحاها" और "والليل إذا يغشى" आदि पढ़ने का निर्देश दिया। क्योंकि उनके पीछे नमाज़ पढ़ने वालों में बूढ़े, कमज़ोर और ज़रूरतमंद लोग भी शामिल होते हैं, जिन्हें लंबी क़िरात से परेशानी होती है। अतः, उनके साथ नरमी करते हुए और उनका ख़याल रखते हुए हल्की क़िरात करनी चाहिए। हाँ, यदि कोई अकेले नमाज़ पढ़ रहा हो, तो जितनी चाहे, लंबी क़िरात कर सकता है।
हब्शा के बादशाह नज्जाशी का, हब्शा की ओर हिजरत करने वाले सहाबा पर बड़ा एहसान था। यह उस समय की बात है जब क़ुरैश ने मक्का के अंदर मुसलमानों पर ज़मीन तंग कर दी थी और अभी मदीने वाले भी मुसलमान नहीं हुए थे। उन्होंने मुसलमानों को सम्मान दिया और अपनी नेकनीयती, सत्य-प्रेम और सहजता के कारण मुसलमान भी हो गए। फिर, हब्शा ही में मृत्यु पाई और अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को देखने का गौरव प्राप्त नहीं कर सके। चूँकि उनका मुसलमानों पर बड़ा एहसान था, ऊँची शख़्सियत के मालिक थे और ऐसी जगह रहते थे, जहाँ उनपर जनाज़े की नमाज़ भी नहीं पढ़ी जा सकी थी, इसलिए जिस दिन उनकी मृत्यु हुई, उसी दिन आपने अपने साथियों को उनकी मृत्यु की सूचना दी और उन्हें ईदगाह ले गए, ताकि नज्जाशी की महानता को दर्शाया जा सके, उनके इस्लाम को चर्चे में लाया जा सके और अधिक से अधिक लोगों को जनाज़े की नमाज़ में शरीक किया जा सके। वहाँ पहुँचने के बाद सफ़बंदी की और नमाज़ पढ़ी, जिसमें अल्लाह के निकट उनकी सिफ़ारिश के लिए चार तकबीर कही।