





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने बेटे इबराहीम के पास उस समय आए, जब वह प्राण त्याग रहे थे। अतः, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की आँखों से आँसू जारी हो गए। यह देख अब्दुर्रहमान बिन औफ़ ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, आप भी आँसू बहा रहे हैं? तो आपने फ़रमायाः "ऐ औफ़ के बेटे, यह दया है।" फिर आगे फ़रमायाः "आँखें आँसू बहा रही हैं और दिल शोकाकुुल है, लेकिन हम वही कहते हैं, जो हमारे रब को पसंद हो और ऐ इबराहीम, हम तेरी जुदाई से दुखी हैं।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जुमा के दिन ख़ुतबा दे रहे थे कि एक व्यक्ति अंदर आया। आपने कहाः "ऐ अमुक क्या तूने नमाज़ पढ़ ली है?" उसने कहाः नहीं। फ़रमायाः "खड़े हो जाओ और दो रकात पढ़ लो।" तथा एक रिवायत में हैः "दो रकात पढ़ लो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मस्जिद-ए-नबवी में ख़ुतबा दे रहे थे कि सुलैक अल-ग़तफ़ानी -रज़ियल्लाहु अनहु- मस्जिद में दाख़िल हुए और तहिय्यतुल मस्जिद पढ़े बिना ही बैठ गए। तहिय्यतुल मस्जिद न पढ़ने का कराण या तो यह रहा हो कि वह उसके हुक्म से अनभिज्ञ थे या फिर उनको ऐसा लगा होगा कि ख़ुतबा सुनने का महत्व उससे अधिक है। ख़ैर कारण जो भी रहा हो, लेकिन अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ख़ुतबे में व्यस्त होने के बावजूद उनको शिक्षा देना नहीं भूले। फ़रमाया : ऐ अमुक, क्या तुमने मेरी नज़र पड़ने से पहले मस्जिद के किसी किनारे में नमाज़ पढ़ी है? उन्होंने नहीं में उत्तर दिया, तो फ़रमाया : उठो और दो रकात पढ़ लो। सहीह मुस्लिम की एक रिवायत मे ंहै कि आपने उनको दो रकात हल्के अंदाज़ में पढ़ने का आदेश दिया है। आपने यह बात एक बड़ी सभा के अंदर कही, ताकि एक तो यह कि उनको ज़रुरत के समय ही शिक्षा मिल जाए और दूसरा यह कि यह शिक्षा सभी उपस्थित लोगों के लिए आम हो। अतः, जो व्यक्ति इस हाल में मस्जिद में दाख़िल हो कि इमाम ख़ुतबा दे रहा हो, उसे दो रकात पढ़ लेनी चाहिए। इसकी एक दलील यही हदीस है और दूसरी दलील अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- का यह फ़रमान है : "जब तुममें से कोई जुमा के दिन मस्जिद आए और इमाम ख़ुतबा दे रहा हो, तो दो रकात पढ़ ले।" यही कारण है कि नववी ने सहीह मुस्लिम की शर्ह में अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के फ़रमान : "जब तुममें से कोई जुमा के दिन मस्जिद आए और इमाम ख़ुतबा दे रहा हो, तो दो रकात पढ़ ले और उन दो रकातों को हल्के अंदाज़ में पढ़े।" की व्याख्या करते हुए लिखा है : यह ऐसे शब्द हैं, जिनकी कुछ और व्याख्या करने की गुंजाइश नहीं है और मुझे नहीं लगता कि किसी आलिम को यह शब्द पहुँच जाएँ और वह इस हदीस को सहीह मानता हो और फिर भी इसकी मुख़ालफ़त करेगा।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मुझे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। चुनांचे आप सफ़र में दो रकात से अधिक नहीं पढ़ते थे तथा अबू बक्र, उमर और उसमान भी ऐसा ही करते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहते हैं कि वह अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ यात्रा में रहे। इसी तरह अबू बक्र, उमर और उसमान (रज़ियल्लाहु अनहुम) के साथ भी सफ़र में रहे। उन्होंने देखा कि यह सारे लोग चार रकात वाली नमाज़ों को दो रकता पढ़ते थे और उससे अधिक नहीं पढ़ते थे। साथ ही फ़र्ज़ नमाज़ों से पहले और बाद की सुन्नतें भी नहीं पढ़ते थे। उन्होंने अबू बक्र, उमर और उसमान का नाम यह बताने के लिए लिया कि यह हुक्म मनसूख़ (निरस्त) नहीं है, बल्कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की मृत्यु के पश्चात भी साबित है और उसके विरोध में कोई मज़बूत दलील नहीं है। सफ़र में पूरी नमाज़ पढ़ना जायज है, किन्तु क़स्र (चार रकात वाली नमाज़ों को दो रकात पढ़ना) बेहतर है। इसलिए कि अल्लाह का फ़रमान है : {तो नमाज़ क़स्र करके पढ़ने में तुमपर कोई दोष नहीं है।} यहाँ दोष न होने की बात करना इस बात का संकेत है कि यह अनिवार्य नहीं, बल्कि छूट है। अनिवार्य इसलिए भी नहीं है, क्योंकि असल पूरी नमाज़ पढ़ना है और क़स्र (संक्षिप्तीकरण) किसी अधिक लंबी चीज़ को छोटा करने का नाम है। यात्री के लिए बेहतर यह है कि पूरी नमाज़ पढ़ने के बजाय क़स्र करे, क्योंकि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हमेशा क़स्र करते थे और अल्लाह भी इस बात को पसंद करता है कि उसकी छूट को ग्रहण किया जाए। फिर, इससे वाजिब कहने वालों की मुख़ालफ़त भी नहीं होती और यही जमहूर उलेमा के निकट बेहतर भी है।
समुरा बिन जुंदुब (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पीछे एक ऐसी स्त्री की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी, जो निफ़ास (वह प्राकृतिक रक्त, जो प्रसव के बाद निकलता है) की अवधि में मर गई थी, तो आप उसके बीच में खड़े हुए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।मृतक पर नमाज़ प्रत्येक मरने वाले मुसलमान का अधिकार है। चाहे वह नर हो या नारी और छोटा हो या बड़ा। यहाँ समुरा बिन जुनदुब -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं कि उन्होंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पीछे एक स्त्री की नमाज़-ए-जनाज़ा पढ़ी, जो निफ़ास (वह प्राकृतिक रक्त, जो प्रसव के बाद निकलता है) की अवधि में मर गई थी। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- नमाज़ पढ़ाने के लिए उसके शरीर के बीच के सामने खड़े हुए।
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में सूरज को ग्रहण लगा, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने लोगों को नमाज़ पढाई। आपने लंबा क़याम किया, फिर रुकू किया और देर तक रुकू में रहे, फिर खड़े हुए और देर तक खड़े रहे, (परन्तु, इस बार पहली बार की तुलना में कुछ कम खड़े रहे) फिर रुकू किया और देर तक रुकू में रहे, (परन्तु पहले रुकू की तुलना में कुछ कम) फिर सर उठाया और देर तक खड़े रहे (लेकिन पहली बार के मुक़ाबले में कुछ कम) फिर सजदा किया और देर तक सजदे में रहे। फिर दूसरी रकात में उसी तरह किया जैसा पहली रकात में किया था। फिर नमाज़ से निकले, तो सूरज पूरे तौर पर खुल चुका था। उसके बाद लोगों के सामने ख़ुतबा दिया और अल्लाह की प्रशंसा एवं स्तुति के बाद फ़रमायाः "सूरज और चाँद अल्लाह की निशानियों में से दो निशानियाँ हैं। उन्हें ग्रहण किसी व्यक्ति की मौत और जीवन के लिए नहीं लगता। अतः, जब तुम ऐसा होता देखो तो अल्लाह से दुआ करो, तकबीर कहो, नमाज़ पढ़ो और सदक़ा करो।" फिर फ़रमाया: ऐ मुहम्मद की उम्मत, अल्लाह की क़सम, अल्लाह से अधिक किसी को इस बात पर ग़ैरत नहीं आती कि उसका दास अथवा उसकी दासी व्यभिचार में लिप्त हो। ऐ मुहम्मद की उम्मत, यदि तुम वह जान लेते, जो मैं जानता हूँ तो तुम कम हँसते और अधिक रोते। तथा एक रिवायत में हैः आपने चार रुकू और चार सजदे किए।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने में सूरज ग्रहण हुआ। चूँकि यह एक असमान्य घटना थी, इसलिए अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने एक ऐसी नमाज़ पढ़ाई जो अपने आकार एवं मात्रा में अनोखी थी। आप खड़े हुए और लोगों को इस तरह नमाज़ पढ़ाई कि तकबीर-ए-तहरीमा के पश्चात बड़ा लंबा क़याम किया, फिर रुकू किया और लंबा रुकू किया, फिर खड़े हुए और लंबी क़िरात की, जो पहली क़िरात की तुलना में कुछ संक्षिप्त थी, फिर रुकू किया और लंबा रुकू किया, परन्तु वह पहले रुकू की तुलना में हल्का था, फिर रुकू से सर उठाया और "समिअल्लाहु लिमन हमिदह" दुआ पढ़ी और क़िरात नहीं की, फिर सजदा कियl और लंबा सजदा किया। फिर दूसरी रकात में वही कुछ किया जो पहली रकात में किया था, लेकिन यह रकात पहली रकात के मुक़ाबले में ज़रा हल्की थी और उसका हर रुक्न अपने से पहले रुक्न से ज़रा हल्का था। इस तरह दो रकात में कुल चार रुकू और चार सजदे किए। फिर आपने नमाज़ से सलाम फेरा, तो सूरज साफ़ होकर निकल चुका था। फिर ख़ुतबा दिया, जैसा कि विभिन्न अवसरों पर ख़ुतबा दिया करते थे। उसमें अल्लाह की प्रशंसा तथा स्तुति की और लोगों को नसीहत की। इत्तेफ़ाक़ से जिस दिन सूरज ग्रहण हुआ था, उसी दिन आपके बेटे इब्राहीम -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- की मृत्यु भी हुई थी। इसलिए जाहिलियत काल की इस धारणा के अनुसार कि सूरज ग्रहण किसी बड़े आदमी की मौत अथवा किसी बड़े आदमी की पैदाइश के कारण होता है, कुछ लोग कहने लगे कि आज की यह घटना इब्राहीम की मृत्यु के कारण घटित हुई है। ऐसे में, नबी -सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम- ने उचित जाना कि लोगों को समझाया जाए, अपना विशुद्ध संदेश पहुँचा दिया जाए और लोगों के ज़ेह्न में बैठे हुए इस मिथक को हटाने के साथ-साथ, जिसका न क़ुरआन व हदीस से कोई सबूत है और न स्वच्छ विवेक ही उसे सही मानता है, सूरज तथा चाँद ग्रहण की असल हिकमत बयान कर दी जाए। चुनांचे आपने ख़ुतबे में फ़रमाया : वास्तव में सूर्य एवं चाँद अल्लाह की निशानियों में से दो निशानियाँ हैं। उनमें किसी व्यक्ति के जीवन और मौत से ग्रहण नहीं लगता। दअसल इस तरह की घटनाएँ अल्लाह अपनी शक्ति से घटित करता है, ताकि उनसे अपने बंदों को भयभीत करे तथा उन्हें अपनी नेमतों की याद दिलाए। इसलिए जब तुम ऐसा कुछ देखो, तो अल्लाह की ओर तौबा करते और रुजू करते हुए भागो, दुआ करो, तकबीर कहो, नमाज़ पढ़ो और सदक़ा करो, इसलिए कि उससे संभावित आपदा एवं आने वाली यातना दूर हो सकती है। फिर आप -सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम- उनके सामने कुछ बड़े गुनाहों को विस्तृत रूप से बयान करने लगे। जैसे कि व्यभिचार, जो समाज एवं मानव व्यवहार को बिगाड़ने का काम करता है और अल्लाह के क्रोध तथा दंड को अनिवार्य कर देता है। इस ख़ुतबे में आपने, जो सच्चे भी हैं और जिनको सच्चा माना भी गया है, यह कहते हुए क़सम खाई कि ऐ मुहम्मद की उम्मत, अल्लाह की सौगंध, अल्लाह से अधिक इस बात से किसी को ग़ैरत नहीं आती कि उसका दास अथवा उसकी दासी व्यभिचार में लिप्त हो। फिर बताया कि लोगों को अल्लाह की सज़ा के संबंध में बहुत थोड़ी जानकारी है। यदि वे वो बातें जान लेते जो आप -सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम- जानते हैं, तो भयाक्रांत हो जाते और हँसते बहुत कम एवं रोते तथा दुखी अधिक रहते। परन्तु अल्लाह ने अपनी हिकमत से इस उनसे छुपा रखा है।
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि मैं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम) के सामने सोए रहती और मेरे दोनों पैर आपके किबले की ओर होते। जब आप सजदे में जाते, तो धीरे से मेरे शरीर पर ऊँगली चुभाते और मैं अपने पैर समेट लेती। फिर जब खड़े होते, तो मैं पैर फैलाते लेती। उन दिनों घरों में दिए नहीं होते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- कहती हैं कि रात के समय जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहे व सल्लम- नमाज़ पढ़ते होते, मैं आपके सामने ही सो जाया करती। चूँकि हमारे घर बहुत तंग होते थे, इसलिए मेरे दोनों पाँव आपके क़बिले की ओर यानी आपके तथा आपके सजदे के स्थान के बीच में होते थे। जब तक आप क़याम में रहते, मैं उन्हें फैलाए रखती और जब सजदे में जाते तो मेरे शरीर में उँगली का किनारा चुभोकर इशारा करते और मैं उन्हें समेट लेती कि आप सजदा कर सकें। यदि मैं आपको सजदे के समय देख पाती, तो उँगली का किनारा चुभोने की ज़रूरत न पड़ती और मैं स्वयं अपने पैर समेट लेती, परन्तु उन दिनों हमारे घरों में दिए नहीं होते थे कि उनके प्रकाश में नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को देख सकती और पाँव समेट लेती।
अब्दुल्लाह बिन ज़ैद बिन आसिम माज़िनी (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) वृष्टि माँगने के लिए नमाज़ पढ़ने को निकले, तो क़िबले की ओर मुँह करके दुआ की, अपनी चादर पलटी और फिर दो रकात नमाज़ पढ़ी, जिसमें ऊँची आवाज़ में तिलावत की। तथा एक रिवायत में है कि आप 'मुसल्ला' (नमाज़गाह) की ओर निकले।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह तआला अपने बंदों को विभिन्न तरीक़ों से आज़माता है, ताकि वे केवल उसी को पुकारें और उसे याद करें। अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने में जब बारिश न होने के कारण अकाल पड़ा, तो आप, अल्लाह से बारिश माँगने के लिए, लोगों को आबादी से बाहर अवस्थित ईदगाह की ओर ले गए। आबादी से बाहर इसलिए ले गए, ताकि अपनी विवशता एवं लाचारी का इज़हार अधिक हो सके। वहाँ आपने क़िबले की ओर मुँह किया, जिससे दुआ क़बूल होने की आशा अधिक रहती है, फिर अल्लाह से मुसलमानों की फ़रियाद सुनने और अकाल दूर करने की दुआ करने लगे। फिर, यह शगुन लेते हुए कि अब सुखाड़ के बाद हरियाली आएगी और बदहाली के बाद खुशहाली आएगी, आपने अपनी चादर को पलटकर एक ओर की चादर की दूसरी ओर कर दिया। फिर, लोगों को दो रकात इस्तिस्क़ा की नमाज़ पढ़ाई। नमाज़ में क़िरात ऊँची आवाज़ से की, क्योंकि उसे जमात के साथ पढ़ा गया था।
मुतर्रिफ़ बिन अब्दुल्लाह कहते हैं कि मैं और इमरान बिन हुसैन ने अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहुम) के पीछे नमाज़ पढ़ी। जब वह सजदे में जाते, तो तकबीर कहते, जब सर उठाते, तो तकबीर कहते और जब दूसरी रकात के बाद खड़े होते, तो तकबीर कहते। जब उन्होंने नमाज़ पूरी कर ली, तो इमरान बिन हुसैन ने मेरे दोनों हाथों को पकड़कर कहाः इन्होंने मुझे मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नमाज़ याद दिला दी। या फिर यह कहा कि इन्होंने हमें मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की जैसी नमाज़ पढ़ाई।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में नमाज़ के एक महत्वपूर्ण चिह्न यानी "अल्लाहु अकबर" के माध्यम से उच्च एवं महान अल्लाह की बड़ाई तथा महानता के इज़हार का वर्णन है। मुतर्रिफ़ वर्णन करते हैं कि उन्होंने और इमरान बिन हुसैन ने एक बार अली बिन अबू तालिब -रज़ियल्लाहु अनहु- के पीछे नमाज़ पढ़ी। वह सजदे में जाते समय तकबीर कहते थे, सजदे से सर उठाते समय तकबीर कहते थे और जब दो तशह्हुद वाली नमाज़ के पहले तशह्हुद से खड़े होते, तब भी तकबीर कहते थे। आज, बहुत-से लोगों ने इन स्थानों में ज़ोर से तबीर कहना छोड़ दिया है। फिर, जब नमाज़ खतम हुई, तो इमरान ने मुतर्रिफ़ का हाथ पकड़ा और बताया कि आज अली -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- ने उन्हें अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की नमाज़ याद दिला दी। इसलिए कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- भी इन स्थानों में तकबीर कहा करते थे।
आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) कहती हैं कि अल्लाह केरसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सफ़ेद यमनी कपड़ों में कफ़नाया गया। उनमें न कुर्ता था और न पगड़ी थी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।आइशा -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- यहाँ नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के कफ़न, उसके रंग तथा कपड़ों की संख्या के बारे बता रही हैं। उनका कहना है कि आपको यमन में बनी हुई तीन सफ़ेद चादरों में कफ़नाया गया। आपको न कुरता दिया गया, न पगड़ी। याद रहे कि मृतक को कफ़नाने में अधिक कपड़ों का प्रयोग इसलिए होता है, क्योंकि मृतक का परदा जीवित व्यक्ति के परदे से अधिक महत्व रखता है और उसपर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।