





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि एक अंसारी ने अपने दास से कह दिया कि तुम मेरे मरने के बाद आज़ाद हो। तथा एक रिवायत में है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को पता चला कि एक सहाबी ने अपने दास से कह दिया है कि तुम मेरे मरने के बाद आज़ाद हो। हालाँकि उसके पास कोई अन्य धन भी नहीं है। अतः, आपने उसे आठ सौ दिरहम में बेच दिया और क़ीमत उस सहाबी को भेज दी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।एक अंसारी व्यक्ति ने अपने दास को अपनी मृत्यु के बाद मुक्ति का वचन दे दिया, जबकि उसके पास उसके सिवा कोई धन नहीं था। जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को इसकी सूचना मिली, तो आपने उनके इस काम को सहमति देने के बजाय नकार दिया और दास को आठ सौ दिरहम में बेचकर उसकी कीमत उसे भिजवा दी। क्योंकि इनसान का अपनी तथा अपने परिवार की ज़रूरतों को पूरा करने का महत्व दास मुक्त करने से कहीं अधिक है। आपने ऐसा इसलिए भी किया कि कहीं उसे इसके बाद लोगों को सामने हाथ न फैलाना पड़े। इस प्रकार की हदीसों के अंदर कई ऐसे अहकाम हैं, जिनका ज्ञान इनसान को रखना चाहिए, यद्यपि उनपर अमल करने की ज़रूरत न पड़े। इन हदीसों को सीखने तथा समझने से यह कहकर दूरी नहीं बनाई जा सकती कि आज दास प्रथा का चलन समाप्त हो चुका है। क्योंकि आज भी अफ्रीका के कुछ भागों में दास प्रथा का चलन है और यह भी संभव है कि बाद में फिर कभी यह प्रचलित हो जाए। दास प्रथा का चलन पुराने ज़माने से रहा है, इस्लाम के दौर में भी था और उसके बाद भी। यह और बात है कि इस्लाम एक स्वतंत्रता प्रिय धर्म है और दास को मुक्त करने की प्रेरणा देता है।
अबू हुरैरा और ज़ैद बिन खालिद जुहनी (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि नबी (सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम) से उस दासी के बारे में पूछा गया, जो व्यभिचार में लिप्त हो गई और शादीशुदा न हो? तोआप ने फ़रमायाः यदि वह व्यभिचार करे, तो उसे कोड़े लगाओ। फिर व्यभिचार करे, तो फिर कोड़े लगाओ। फिर व्यभिचार करे, तो कोड़े लगाओ फिर उसे बेच दो, किसी रस्सी के बदले ही सही। इब्ने शिहाब कहते हैंः मैं नहीं जानता कि आपने बेचने की बात तीसरी बार के बाद कही या चौथी बार के बाद।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से व्यभिचार में लिप्त अविवाहित दासी के शरई दंड के बारे में पूछा गया, तो आपने फ़रमाया कि उसे कोड़े लगाए जाएँगे। ज्ञातो होकि दासी के लिए आज़ाद स्त्रियों का आधा दंड है, इसलिए उन्हें पचास कोड़े ही लगाए जाएँगे। अल्लाह तआला का फ़रमान है : {فَإِذَا أُحْصِنَّ فَإِنْ أَتَيْنَ بِفَاحِشَةٍ فَعَلَيْهِنَّ نِصْفُ مَا عَلَى الْمُحْصَنَاتِ مِنَ الْعَذَابِ} (फिर जब वह विवाहित हो जाएँ, तो यदि व्यभिचार कर जाएँ, तो उनपर उसका आधा दंड है, जो स्वतंत्र स्त्रियों पर है।) फिर यदि व्यभिचार कर बैठे, तो दोबारा पचास कोड़े लगाए जाएँगे, ताकि इस अश्लील कार्य से रुक जाए। लेकिन यदि उसे दंड से कोई फ़र्क़ न पड़े, वह तौबा न करे, बदनामी का भय भी न रखे और तीसरी बार व्यभिचार में लिप्त हो जाए, तो ऐसी परिस्थिति में उसे पचास कोड़े लगाने के बाद बेट डालो। चाहे कोड़ी के भाव ही क्यों न बेचना पड़े। क्योंकि, उसके अंदर न तो कोई भलाई है और न उसके सुधरने की उम्मीद बची है। अतः उसका दूर हो जाना ही बेहतर है, ताकि वह उस घर के लिए किसी फ़ितने का सबब न बन जाए, जिसमें रह रही है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अनहुमा) कहते हैंः मैं तथा खालिद बिन वलीद (रज़ियल्लाहु अनहु) अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ मैमूना के घर गए। वहाँ एक भुना हुआ सांडा लाया गया। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हाथ बढ़ाया, तो मैमूना के घर में उपस्थित किसी स्त्री ने कहाः अल्लाह के रसूल को बता दो कि आप क्या खाने जा रहे हैं। यह सुनकर आपने अपना हाथ खींच लिया। मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या यह हराम है? फ़रमायाः नहीं, परंतु यह हमारे यहाँ नहीं हुआ करता है। अतः, मुझे इससे घिन महसूस होती है। खालिद कहते हैंः मैंने उसे खींचकर अपने सामने कर लिया और खाना शुरू कर दिया और अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) देखते रहे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उम्मे हफ़ीद बिन्त हारिस अर्थात हुज़ैला बिंत हारिस -रज़ियल्लाहु अनहा- अपनी बहन मैमूना -रज़ियल्लाहु अनहा- के पास कुछ सौगात लेकर उनके दर्शन को आईं, जिसमें एक सांडा भी शामिल था। खाने में मैमूना -रज़ियल्लाहु अनहा- के भांजे लोग शरीक हुए। खालिद उनकी बहन के बेटे थे और मैमूना -रज़ियल्लाहु अनहा- उनकी खाला थीं। इसी तरह वह अब्दुल्लाह बिन अब्बास और फ़ज़्ल बिन अब्बास की भी खाला थीं। जब खाना लगाया गया और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मांस की ओर हाथ बढ़ाया, तो घर में उपस्थित कुछ महिलाओं ने कहा कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को बता दो कि यह क्या है। चुनांचे आपसे कहा गया कि यह सांड़े का मांस है, तो आपने हाथ उठा लिया और नहीं खाया। यह देख खालिद -रज़ियल्लाहु अनहु- ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, क्या यह हराम है? आपने उत्तर दिया : नहीं, परन्तु यह मेरी जाति की धरती में नहीं होता। अतः, मुझे इससे घिन आती है। खालिद -रज़ियल्लाहु अनहु- कहते हैं : इसपर मैंने उसे अपनी ओर खींचा और खा लिया और नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- सब कुछ देखते रहे।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) से वर्णित है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया: सुलैमान बिन दाऊद (अलैहिमस्सलाम) ने फ़रमायाः आज रात मैं सत्तर स्त्रियों के पास जाऊँगा, उनमें से हर स्त्री से एक-एक लड़का होगा, जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद करेगा। उनसे कहा गया कि 'इन शा अल्लाह' बोलिए, लेकिन वे नहीं बोले। अतः, सब पत्नियों के पास गए तो सही, परंतु एक के सिवा किसी ने संतान नहीं दिया, एक ने दिया भी तो अधूरा। वर्णनकर्ता का कहना है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः यदि उन्होंने 'इन शा अल्लाह' कहा होता, तो उनकी क़सम न टूटती और उनकी ज़रुरत भी पूरी हो जाती।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी सुलैमान -अलैहिस्सलाम- ने अपने साथ बैठे एक आदमी से फ़रमाया कि वह एक ही रात में अपनी सत्तर पत्नियों से सहवास करेंगे। याद रहे कि इतनी संख्या में शादी या तो उनकी शरियत में जायज़ थी या फिर यह उनकी विशेषता थी। नीयत यह थी कि सारी पत्नियों से एक-एक बच्चा होगा, जो अल्लाह के रास्ते में जिहाद करेगा। यह सुन उनके साथ बैठे आदमी ने कहा कि इन शा अल्लाह कह लें। लेकिन वह इन शा अल्लाह कहना भूल गए और सारी पत्नियों से सहवास किया। लेकिन केवल एक पत्नी के सिवा किसी ने बच्चे का जन्म नहीं दिया। उसने भी जन्म दिया तो एक अधूरे बच्चे को। नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि यदि सुलैमान -अलैहिस्सलाम- ने इन शा अल्लाह कह दिया होता, तो उनकी क़सम भी नहीं टूटती और उनकी चाहत भी पूरी हो जाती।
हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ग़नीमत के माल से घोड़े के लिए दो और आदमी के लिए एक भाग दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर -रज़ियल्लाहु अन्हुमा- बता रहे हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने माल-ए-गनीमत से घोड़े को दो और पैदल जिहाद करने वाले को एक भाग दिया। अर्थात जो घोड़ा के साथ जिहाद करेगा, वह पैदल जिहाद करने वाले की तुलना में तीन गुना अधिक भाग पाएगा। ऐसा इसलिए कि घोड़ा जिहाद में जो काम करता है तथा उसके माध्यम से शत्रू को जो क्षति पहुँचती है, वह पैदल जिहाद करने से कहीं अधिक है। इसी की ओर इशारा करते हुए हुए पवित्र क़ुरआन में कहा गया है : {फिर सुबह के समय धावा बोलने वालों की क़सम, जो धूल उड़ाते हैं, फिर सेना के बीच घुस जाते हैं।} [सूरा अल-आदियात, आयत संख्या : 3-5] इसमें घोड़े की प्रशंसा की गई है और जंग में उसका लाभ बताया गया है। इसी तरह, नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "घोड़े की पेशानियों में भलाई क़यामत तक के लिए है।" इसे बुखारी (हदीस संख्या : 2849) तथा मुस्लिम (हदीस संख्या : 1871) ने रिवायत किया है और शब्द बुख़ारी के हैं।
काब बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि मैंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मैं अपनी तौबा क़बूल होने की खुशी में अपना सारा धन अल्लाह और उसके रसूल की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए सदक़ा करता हूँ। उनकी बात सुनकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अपना कुछ माल रखे रहो, यह तुम्हारे लिए बेहतर है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।काब बिन मालिक -अल्लाह उनसे प्रसन्न हो- उन तीन सहाबा में से एक हैं, जो बिना किसी उचित कारण और बिना निफ़ाक़ के तबूक युद्ध से पीछे रह गए थे। जब नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- युद्ध से वापस आए, तो उनका बहिष्कार किया तथा लोगों को भी उनके बहिष्कार का आदेश दिया। इस तरह, वे अलग-थलग पड़े रहे, यहाँ तक कि उनकी क्षमा से संबंधित आयत अवतरित हुई और अल्लाह उनसे प्रसन्न हो गया। फिर, रसूल और सहाबा भी उनसे संतुष्ट हो गए। चुनांचे काब -रज़ियल्लाहु अनहु- अल्लाह के प्रसन्न होने और उनकी तौबा स्वीकार होने से इतना उत्साहित हुए कि अपना सारा धन अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के लिए सदक़ा कर देने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उनकी रहनुमाई करते हुए फ़रमाया कि कुछ धन अपने पास रख लो। क्योंकि अल्लाह ने उनकी सच्ची नीयत एवं पूरी निष्ठा के साथ क्षमा याचना के कारण उन्हें क्षमा कर दिया था और अब इसकी आवश्यकता नहीं रह गई थी। साथ ही अल्लाह किसी पर उसकी ताक़त से अधिक बोझ भी नहीं डालता। इसके बाद उन्होंने अपना कुछ धन अल्लाह की प्रसन्नता से संतुष्ट होकर और आख़िरत के लिए जमा रखने के इरादे से खर्च कर दिया और कुछ अपने पास रखा, ताकि अपनी और अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। अल्लाह अपने बंदों पर बड़ा दयालु है।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जिन लोगों को जंगों में भेजते थे, उनमें से कुछ लोगों को विशेष रुप से कुछ ग़नीमत का माल देते थे। यह सेना के आम सदस्यों के भाग से अलग होता था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर -अल्लाह उन दोनों से प्रसन्न हो- बता रहे हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- जिन लोगों को जंगों में भेजते थे, उनमें से कुछ लोगों को विशेष रूप से कुछ गनीमत का माल देते थे, जो सेना के आम सिपाहियों को मिलने वाले हिस्सों से अलग होता था। ऐसा इसलिए करते थे, ताकि उनकी हिम्मत बढ़ाई जा सके और जिहाद के प्रति उनका उत्साह बढ़ाया जा सके।
उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि बनू नजीर से प्राप्त धन अल्लाह ने अपने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को बिना किसी युद्ध के प्रदान किया था और उसके लिए मुसलमानों ने घोड़े और ऊँट नहीं दौड़ाए थे। अतः, वह अल्लाह के रसूल के लिए खास था। उसमें आप अपने परिवार के लिए एक वर्ष का खर्च अलग कर लेते और बाकी जो बच जाता, उसे अल्लाह के रास्ते (जिहाद) की तैयारी के लिए घोड़ों और हथियारों में खर्च करते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मदीने आए, तो उसके चारों ओर यहूदियों के कुछ गिरोहों को देखा। अतः, उनसे इस बात पर शांति-संधि कर ली कि वे अपने धर्म पर बने रहें, आपसे युद्ध न करें और आपके विरुद्ध किसी शत्रु की सहायता न करें। इस संधि के पश्चात आपके साथियों में से एक व्यक्ति, जिसका नाम अम्र बिन उमय्या ज़मरी था, ने बनी आमिर के दो लोगों की यह सोचकर हत्या कर दी कि वे मुसलमानों के शत्रु हैं। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन दोनों व्यक्तियों की दियत अदा करने का निर्णय लिया और उनकी दियत अदा करने में सहयोग की आशा के साथ बनू नज़ीर की ओर निकले। इसी क्रम में आप उनके एक बाज़ार में सहयोग की प्रतीक्षा में बैठे थे कि उन लोगो ने वादा तोड़ दिया और आपकी हत्या का मन बना लिया। लेकिन, आपके पास उनकी ग़द्दारी के संबंध वह्य आ गई। फिर आप उन्हें और अपने उपस्थित साथियों को यह संकेत देकर उनकी बस्ती से निकल आए कि आप शौच के लिए जा रहे हैं। आप सीधे मदीने की ओर चल पड़े। उधर, जब आपके आने में देर हुई, तो लोग आपकी तलाश में निकले। आपने उन्हें यहूदियों (अल्लाह उन्हें नष्ट करे) की ग़द्दारी की बात सुनाई और छह दिनों तक उनकी बस्ती का घेराव जारी रखा, यहाँ तक कि इस बात पर सहमति बन गई कि वे शाम, हियरा और ख़ैबर की ओर निकल जाएँ। इस प्रकार, उनका धन 'फ़य' का धन था, जो मुसलमानों को किसी संघर्ष के बिना प्राप्त हुआ था और उसके लिए उन्हें कोई युद्ध नहीं करना पड़ा था। इसलिए, उनका धन अल्लाह और उसके रसूल के लिए था। उससे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने परिवार के एक साल के खाने-पीने का ख़र्च रख लेते और बाकी मुसलमानों की भलाई के कामों में खर्च कर देते। दरअसल, उस समय सबसे प्रथम काम युद्ध के लिए हथियार और घोड़े की तैयारी का था। वैसे, प्रत्येक समय के अनुसार आम भलाई में खर्च करने का अपना एक उचित स्थान होता है।
अब्दुर्रहमान बिन अबू बकरा कहते हैं कि मेरे पिता ने अपने बेटे (अथवा खुद मैंने उनकी ओर से उनके बेटे) उबैदुल्लाह बिन अबू बकरा को, जो सीस्तान के क़ाज़ी थे, लिखा कि गुस्से की हालत में दो व्यक्तियों के बीच निर्णय न करना; क्योंकि मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को कहते सुना हैः कोई भी व्यक्ति ग़ुस्से की हालत में दो आदमियों के बीच निर्णय न करे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।प्रबुद्ध विधी बनाने वाले ने निर्णय करने वाले को क्रोध की अवस्था में लोगों के बीच निर्णय करने से मना किया है। इसलिए कि क्रोध इनसान की व्यक्तिगत संतुलन को प्रभावित करता है और इस बात की संभावना रहती है कि वह क्रोधावस्था में अत्याचार कर बैठे या ग़लत निर्णय दे डाले, जो प्रतिवादी पर ज़ुल्म हो तथा निर्णय करने वाले के लिए खेद एवं गुनाह का कारण।