





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से वर्णन करते हैं कि आपने फ़रमायाः जिसने किसी गुलाम में अपना भाग मुक्त किया तथा उसके पास इतना धन हो, जो उसकी पूरी क़ीमत को पहुँचता हो, तो उसकी न्यायसंगत क़ीमत लगाई जाए और अन्य साझेदारों को उनके हिस्सों की क़ीमत अदा कर दी जाए, तभी उसकी ओर से पूरा गुलाम मुक्त किया जाना समझा जाएगा। अन्यथा, उसकी ओर से जितना मुक्त हुआ, सो हुआ।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जिस व्यक्ति की किसी दास अथवा दासी में हिस्सेदारी हो, चाहे हिस्सेदारी कम हो या ज़्यादा, यदि वह उस दास का एक भाग मुक्त कर देता है, तो उसका हिस्सा मुक्त हो जाएगा। अब अगर वह संपन्न है और अपने साझीदार के हिस्से की क़ीमत भी दे सकता है, तो पूरा दास मुक्त हो जाएगा। मुक्त करने वाले का भाग भी और उसके साझीदार का भाग भी। वह अपने साझीदार के भाग की क़ीमत का अंदाज़ा बाज़ार के अनुसार करके अपने साझीदार को दे देगा। और अगर वह अपने साझीदार के हिस्से की क़ीमत देने में सक्षम न हो, तो उसके कारण उसके साथी का नुक़सान होने नहीं दिया जाएगा। मुक्त केवल उसी का भाग होगा और उसके साझीदार के भाग की दासता बरक़रार रहेगी।
अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिसने किसी दास में अपना भाग मुक्त कर दिया, उसे अपने धन से पूरा दास मुक्त करना होगा। परन्तु, यदि उसके पास पर्याप्त धन न हो, तो उस दास की न्यायसंगत क़ीमत लगाई जाएगी और उस दास से अपनी क़ीमत चुकाने का प्रयास करने को कहा जाएगा। हाँ, मगर उसे तंग नहीं किया जाएगा।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जो किसी साझे के दास में से अपना भाग मुक्त कर दे, यदि उसके पास इतना धन हो कि सभी साझीदारों को उनके हिस्सों की क़ीमत दे सकता है, तो उसे पूरा दास मुक्त करना होगा। लेकिन यदि उसके पास धन न हो अथवा सारे भागीदारों के भाग चुकाने के समान धन न हो, अथवा ऐसा करने से उसे क्षति होती हो, तो इस दशा में दास को दो अख्तयार होंगेः प्रथम, स्वयं को उतना आज़ाद रखे, जितना हुआ है। इस दशा में वह कुछ मुक्त और कुछ दास रहेगा। दूसराः जिसने आज़ाद नहीं किया है, उसका भाग देने के लिए परिश्रम करे। ऐसा मूल्य तय करने के पश्चात करेगा। इसी को 'इसतिसआ' कहा जाता है।
अब्दुल्लाह बिन अबू औफ़ा (रज़ियल्लाहु अनहु) कहते हैं कि हम अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ सात युद्धों में शरीक हुए और उनके दौरान हम टिड्डी खाते थे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने अपने रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथियों को सात युद्धों में खाने-पीने की चीज़ें न होने के कारण खाने को टिड्डियाँ प्रदान कीं। इसी तरह एक युद्ध में समुद्र से निकलने वाली अंबर मछली से सहायता फ़रमाई, जिसे उन्होंने खाया।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) वर्णन करते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मक्का में कदा की ओर से, बतहा की ऊँची घाटी से होते हुए दाखिल हुए और नीची घाटी से निकले।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब 'हज्जतुल वदा' के लिए निकले, तो चार ज़िल-हिज्जा की रात 'ज़ी तुवा' नामी स्थान में गुज़ारी। अगली सुबह ऊँची घाटी से होते हुए मक्का में दाखिल हुए। क्योंकि आप मदीने से आए थे और आपके लिए इधर से प्रवेश करना अधिक आसान था। फिर जब हज के सारे कार्य पूरे कर चुके, तो मक्का के निचले भाग से मदीने की ओर निकले। यह वही रास्ता है, जो 'जरवल' से होकर गुज़रता है। शायद रास्ता बदलने के पीछे यह उद्देश्य रहा हो कि अधिक से अधिक स्थानों में इबादत के अवसर प्राप्त हों। ऐसा आपने 'अरफ़ा' जाते-आते समय भी किया था। ईदगाह जाते-आते समय भी आप रास्ता बदल लिया करते थे और नफ़ल नमाज़ के लिए भी फ़र्ज़ नमाज़ के स्थान से हटकर खड़े होते थे। ताकि धरती उस दिन उन के अमल की गवाही दे, जिस दिन वह अपने सीने में दफ़न सारी बातें सामने रख देगी। और ऐसा भी हो सकता है कि आपने आने-जाने के लिए वही रास्ते चुने हों, जो यात्रा के लिए उचित थे। बाकी, अल्लाह अधिक जानता है।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) फ़रमाते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) (मदीने से) अल-शजरा के रास्ते से निकलते और अल-मुअर्रस के रास्ते से अंदर आते। और जब मक्का में प्रवेश करते, तो ऊँची घाटी से प्रवेश करते और निचली घाटी से निकलते।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू सुलैमान मालिक बिन हुवैरिस (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि हम लोग अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए। हम लोग उस समय लगभग समान आयु वाले जवान थे। हम आपके पास बीस दिन ठहरे। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) बहुत ही दयालु और नरम स्वभाव के मालिक थे। आपको लगा कि हम लोग अपने परिवार की ओर लौटने की इच्छा रखते हैं, इसलिए हमसे हमारे परिवार के बारे में पूछा, तो हमने आपको बताया। इसपर आपने फ़रमायाः "अपने परिवार ओर वापस जाओ, उनके बीच रहो, उन्हें शिक्षा प्रदान करो, आदेश दो और अमुक नमाज़ अमुक समय में तथा अमुक नमाज़ अमुक समय में पढ़ो। जब नमाज़ का समय आ जाए, तो तुममें से एक व्यक्ति तुम्हारे लिए अज़ान दे और तुममें सबसे अधिक आयु वाला व्यक्ति तुम्हारी इमामत करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैंः अल्लाह की किताब में 'तमत्तो' की आयत उतरी और हमने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ उसपर अमल भी किया। न तो कुरआन की कोई आयत उतरी है, जो उसे हराम बताए और न रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने जीवनकाल में उससे मना किया है। हाँ, एक व्यक्ति ने अपने मत से जो चाहा, कहा। इमाम बुख़ारी कहते हैंः कहा जाता है कि इमरान बिन हुसैन का इशारा उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) की ओर था। एक अन्य रिवायत में हैः 'तमत्तो' (अर्थात हज के अवसर पर उमरा करके एहराम खोल देने और नए सिरे से एहराम बाँधकर हज करने) की आयत उतरी और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हमें उसपर अमल करने का आदेश भी दिया। बाद में कोई ऐसी आयत नहीं उतरी, जो इस आयत के आदेश को निरस्त करती हो तथा रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने जीवनकाल में कभी इससे मना नहीं किया। बुख़ारी और मुस्लिम में इसी अर्थ की रिवायत मौजूद है।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इमरान बिन हुसैन (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने उमरा के बाद एहराम खोल लेने और हज के लिए नए सिरे से एहराम बाँधने का ज़िक्र करते हुए कहाः यह अल्लाह की किताब और रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की हदीस दोनों से साबित है। अल्लाह की किताब में हैः {فمن تمتع بالعمرة إلى الحج فما استيسر من الهدي} (तो जो व्यक्ति उमरे से ले कर हज्ज तक तमत्तो करे, वह जो कुरबानी उपलब्ध हो, पेश करे।) रही बात सुन्नत की, तो खुद अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसपर अमल किया और अपने साथियों के करने पर सहमति जताई। न कुरआन की किसी आयत में उससे मना किया गया है और न रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उससे मना किया है। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की मृत्यु के समय तक इसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। ऐसे में, कोई अपने मत से उससे कैसे रोक सकता है? उनका इशारा उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) की ओर था, जिन्होंने अपने इजतिहाद की बुनियाद पर हज के महीनों में इससे मना किया था, ताकि साल भर काबा की ज़ियारत करने वालों की संख्या अधिक हो। क्योंकि जब लोग हज के मौसम ही में उमरा कर लेंगे, तो अन्य महीनों में दोबारा नहीं आएँगे। दरअसल, उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) की ओर से यह मनाही हराम ठहराने के तौर पर या किताब व सुन्नत पर अमल करने से रोकने के लिए नहीं थी, बल्कि साधारण हित के तहत यह एक सामयिक निषेध था।
अबू जमरा (नस्र बिन इमरान ज़ुबई) कहते हैंः मैंने अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से 'हज्जे तमत्तो' के बारे में पूछा, तो उन्होंने मुझे उसका आदेश दिया। फिर मैंने उनसे क़ुरबानी के बारे में पूछा, तो बतायाः उसमें ऊँट, गाय, बकरी या जानवर का एक हिस्सा ज़बह करना है। वह कहते हैंः लेकिन ऐसा लगा कि कुछ लोग उसे नापसंद कर रहे हैं। ऐसे में मैं सोया, तो स्वप्न में देखा कि गोया एक आदमी पुकार रहा हैः तेरा हज शरीयत के अनुरूप है और तेरा 'तमत्तो' ग्रहण योग्य है। अतः मैंने अब्दुल्लाह बिन अब्बास के पास आकर स्वप्न के बारे में बताया, तो वह बोलेः अल्लाह सबसे बड़ा है। यह अबुल क़ासिम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू जमरा ने इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से, उमरे से लेकर हज तक लाभान्वित होने के बारे में पूछा, तो उन्होंने इसकी अनुमति दी। फिर कुरबानी के बारे में पूछा, जो उसीके साथ इस आयत में उल्लिखित हैः "فمن تمتع بالعمرة إلى الحج فما استيسر من الهدي", तो बताया कि उसमें ऊँट, जो सबसे उत्तम है, फिर गाय, फिर बकरी को ज़बह करना है। या फिर ऊँट या गाय का सातवाँ भाग कुरबानी करना है। यानी उस ऊँट या गाय की कुरबानी में शरीक हो सकता है, जिसमें कुल सात आदमी शरीक हों। लेकिन ऐसा लगा कि किसी ने अबू जमरा के तमत्तो करने पर एतराज़ जताया, तो उन्होंने स्वप्न में देखा कि कोई ग़ैब से उन्हें आवाज़ दे रहा हैः "तेरा हज शरीयत के अनुरूप है और तेरा तमत्तो ग्रहण योग्य है।" फिर क्या था, वे इब्ने अब्बास (रज़्यल्लाहु अंहुमा) के पास आए और उन्हें इस सुंदर स्वप्न की खुशख़बरी दी। चूँकि अच्छा स्वप्न नुबूवत का एक अंग होता है, इसलिए इब्ने अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) इससे प्रसन्न हुए और अपने फ़तवे के सही होने पर खुशी प्रकट करते हुए कहाः अल्लाह बहुत बड़ा है। यह अबुल कासिम (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सुन्नत है।
अबू क़तादा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हज के लिए निकले। आपके साथ और लोग भी थे। इसी बीच आपने कुछ लोगों का रास्ता बदला दिया, जिनमें अबू क़तादा भी शामिल थे। आपने उनसे कहा कि सागर के किनारे-किनारे चलते रहो, यहाँ तक कि हम दोबारा मिल जाएँ। सो, वे सागर के किनारे का रास्ता पकड़कर चल पड़े। फिर जब वे नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से मिलने के लिए मुड़े, तो सब लोगों ने एहराम बाँध लिया। अलबत्ता अबू क़तादा ने एहराम नहीं बाँधा। वे चल ही रहे थे कि उन्हें कुछ जंगली गधे नज़र आए और अबू क़तादा- रज़ियल्लाहु अन्हु- ने उनपर वार कर दिया तथा एक गधी को पकड़ भी लिया। फिर हम ने पड़ाव डाला और उस गधी का मांस खाया। फिर हमने कहाः क्या हम एहराम की हालत में शिकार का मांस खा सकते हैं? सो हमने बचा हुआ मांस रख लिया और रसूल - सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के पास पहुँचकर इस बारे में पूछा। आपने फ़रमायाः क्या तुम में से किसी ने उस पर वार करने को कहा था या उसकी ओर इशारा किया था? लोगों ने उत्तर दिया कि नहीं। तो फ़रमायाः तुम बचा हुआ मांस खा सकते हो। और एक रिवायत में है कि आपने फ़रमायाः क्या तुम्हारे पास कुछ बचा हुआ है? अतः, मैंने आपको एक बाज़ू दिया और आपने उसमें से खाया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) हुदैबिया के साल उमरा के इरादे से निकले। लेकिन, मदीना वालों के लिए एहराम बाँधने के निर्धारित स्थान यानी ज़ुल-हुलैफ़ा, जो उसके निकट ही है, तक पहुँचने से पहले ही आपको सूचना मिली कि सागर तट की ओर से कुछ दुश्मन आपकी ओर आ रहे हैं। ऐसे में, अपने कुछ साथियों को, जिनमें अबू क़तादा भी शामिल थे, आदेश दिया कि दाएँ ओर होकर सागर तट का रास्ता पकड़कर चल पड़ें, ताकि शत्रुओं को रोका जा सके। सो, वे चल पड़े। जब निर्धारित समय पर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का साथ पकड़ने के लिए मुड़े, तो अबू क़तादा को छोड़कर बाकी लोगों ने एहराम बाँध लिया। वे चल ही रहे थे कि कुछ जंगली गधे नज़र आए और उनके दिल में यह ख़्याल आया कि काश अबू क़तादा उन्हें देख लेते, क्योंकि उन्होंने एहराम नहीं बाँधा था। हुआ भी वैसा ही। अबू क़तादा ने उन्हें देख लिया और हमला कर दिया तथा एक जंगली गधी को पकड़ भी लिया। फिर सबने उसका मांस खाया। लेकिन बाद में यह संदेह पैदा हो गया कि क्या वे एहराम की अवस्था में उसका मांस खा सकते थे या नहीं? सो, उन्होंने बचा हुआ मांस रख लिया। जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से मिले, तो आपसे इसके बारे में पूछा। आपने पहले यह पता किया कि क्या उनमें से किसी ने जानवर को मारने का आदेश दिया था या इस कार्य में उसकी सहायता की थी, जैसे चिह्नित करना अथवा इशारा करना आदि? तो उन्होंने जवाब दिया कि उनसे इस प्रकार का कोई काम नहीं हुआ है। इतना जान लेने के बाद आपने उन्हें यह इतमीनान दिलाने के लिए कि यह हलाल है, बाकी मांस को खाने का आदेश दिया और खुद उसमें से खाया।