





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू मूसा अशअरी- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है, वह कहते हैंः अल्लाह के रसूल- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के समय में सूर्य ग्रहण हुआ, तो आप घबरा उठे, डर रहे थे कि कहीं क़यामत न आ जाए, यहाँ तक कि मस्जिद आए और सब से लंबे क़याम तथा सजदे के साथ नमाज़ पढ़ाई। मैंने आपको इतनी लंबी नमाज़ पढ़ाते कभी नहीं देखा था। फिर फ़रमायाः "निश्चय यह निशानियाँ, जिन्हें अल्लाह भेजता है, किसी के मरने या जीने से सामने नहीं आतीं। बल्कि उन्हें वह अपने बंदों को डराने के लिए भेजता है। अतः जब उनमें से कोई चीज़ देखो, तो अल्लाह के ज़िक्र, दुआ और क्षमा याचना की ओर भागो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के काल में जब सूर्य ग्रहण हुआ, तो घबराए हुए खड़े हुए क्योंकि आपकी अपने रब से पूर्ण आगाही यह अनिवार्य करती थी कि आप इनसानों की गुमराही एवं सरकशी के कारण अल्लाह से हद दरजा भयभीत रहें। भयभीत होने का एक कारण यह भी था कि शायद सूर में फूँक मारने का समय निकट आ गया हो। अतः आप मस्जिद गए और लोगों को सूर्य ग्रहण की नमाज़ पढ़ाई। तौबा और क्षमा याचना के इज़हार के लिए इतनी लंबी नमाज़ पढ़ी कि जो पहले देखी नहीं गई थी। फिर जब अपने रब से मुनाजात और फ़रियाद से फ़ारिग़ हो गए, तो लोगों की ओर मुतवज्जे हुए और उन्हें नसीहत की तथा यह स्पष्ट कर दिया कि इन निशानियों को अल्लाह, अपने बंदों की शिक्षा, याद दिहानी और चेतावनी के तौर पर भेजता है, ताकि लोग दुआ, क्षमा याचना और नमाज़ में जुट जाएँ।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से रिवायत करते हैं कि आपने फ़रमायाः "एक व्यक्ति ने दूसरे व्यक्ति से जायदाद खरीदी। फिर ख़रीदने वाले ने उसमें एक सोने का घड़ा पाया। अतः उसने बेचने वाले से कहा कि अपना सोना ले लो। मैं ने तुम से केवल ज़मीन खरीदी है, सोना नहीं। लेकिन बेचने वाले ने कहाः मैंने तुम्हें ज़मीन, उसमें जो कुछ है, उसके साथ बेच दी है। अंत में दोनों निर्णय के लिए एक व्यक्ति के पास गए। उस ने कहा कि क्या तुम्हारी कोई संतान है? एक ने उत्तर दिया कि मुझे एक बेटा है और दूसरे ने कहा कि मेरी एक बेटी है। उसने कहाः दोनों का निकाह कर दो और इस धन का कुछ भाग दोनों पर खर्च करो और कुछ भाग सदक़ा कर दो।"
इसकी विभिन्न रिवायतों को बुख़ारी एवं मुस्लिम ने नक़ल किया है।अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से रिवायत है कि उन्होंने नबी- सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को कहते हुए सुनाः "दो औरतें थीं। साथ में उनके बेटे भी थे। इतने में भेड़िया आया और उनमें से एक के बच्चे को ले भागा। ऐेसे में एक ने दूसरी से कहा कि भेड़िया तेरे बच्चे को लेकर गया है, जबकि दूसरी ने कहा कि तेरे बच्चे को लेकर गया है। अंततः, दोनों मामला लेकर दाऊद- अलैहिस्सलाम- के पास पहुँचीं और उन्होंने बड़ी औरत के हक़ में निर्णय दिया। फिर दोनों सुलैमान बिन दाऊद- अलैहिस्सलाम- के पास गईं और घटना सुनाईं। उन्होंने कहाः छुरी लाओ, मैं बच्चे को काट कर दोनों में बाँट देता हूँ। इसपर छोटी ने कहाः ऐसा न करें, अल्लाह आप पर दया करे, यह उसी का बेटा है। यह सुनकर सुलैमान- अलैहिस्सलाम- ने छोटी औरत के हक़ में निर्णय दे दिया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से मरफूअन रिवायत है किः "नबियों में से किसी नबी (अल्लाह का दरुद व सलाम उनपर नाज़िल हो) ने जिहाद किया, तो अपनी क़ौम से कहाः मेरे साथ कोई ऐसा व्यक्ति न आए, जिसने अभी विवाह किया है तथा वह अपनी पत्नी से मिलना चाह रहा है, लेकिन अभी तक मिला नहीं है। न ही वह व्यक्ति आए, जिसने घर बनाया है, किन्तु अब तक उसपर छत नहीं डाली है। न ही ऐसा व्यक्ति निकले, जिसने गाभिन बकरी या ऊँटनी ख़रीदी है एवं वह उसके बच्चा जन्ने की प्रतीक्षा कर रहा है। चनांचे, वह युद्ध के लिए निकले तथा एक गाँव के पास अस्र की नमाज़ के समय या उसके समीप पहुँचे, तो सूर्य से कहाः तू भी आदेश का पाबंद है तथा मुझे भी आदेश दिया गया है। ऐ अल्लाह, तू इसको हमारे ऊपर रोक ले। सो वह रोक लिया गया, यहाँ तक कि अल्लाह ने उनको विजय प्रदान की। फिर उन्होंने ग़नीमत धन इकट्ठा किया तथा आग आई, ताकि उसको जला डाले, परन्तु उसको जलाई नहीं। ऐसा देख, नबी ने कहाः तुममें से किसी ने ग़नीमत का धन छिपाया है। अतः, प्रत्येक क़बीले का एक व्यक्ति मेरे हाथ में हाथ रखकर बैअत करे। चुनांचे, एक व्यक्ति का हाथ उनके हाथ से चिपक गया। तब नबी ने कहाः तुम्हारे क़बीले ही में ख़यानत है। अतः, तुम्हारे क़बीले का प्रत्येक व्यक्ति मेरे हाथ में हाथ रखकर बैअत करे। चुनांचे उस क़बीले के दो या तीन व्यक्तियों के हाथ उनके हाथ से चिपक गए। तब नबी ने कहाः तुमने ख़यानत की है। अतः वह गाय के सर के जैसा एक सोने का सर लेकर आए और उसे रख दिया। तब आग आई और उसे खा गई। दरअसल, हमसे पहले किसी समुदाय के लिए ग़नीमत का धन हलाल नहीं किया गया था। फिर अल्लाह ने जब हमारी दुर्बलता तथा असमर्थता देखी, तो उसे हमारे लिए हलाल कर दिया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हज्जतुल वदा के अवसर पर, हज के साथ उमरा किया और कुरबानी की। आप ज़ुल-हुलैफ़ा से अपने साथ क़ुरबानी के जानवर लाए थे। अल्लाह के रसूल (सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पहले उमरा का तलबिया पुकारा और फिर हज का तलबिया पुकारा। चुनांचे लोगों ने भी अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ हज के साथ उमरा किया। अलबत्ता, कुछ लोग ज़ुल-हुलैफ़ा से क़ुरबानी के जानवर साथ लाए थे और कुछ लोग नहीं भी लाए थे। अतः, जब आप मक्का पहुँचे, तो लोगों से कहाः "जो लोग क़ुरबानी साथ लाए हैं, वे हज से फ़ारिग़ होने तक किसी चीज़ को हलाल न समझें, जो एहराम के कारण हराम हो चुकी है। मगर जो लोग क़ुरबानी साथ नहीं लाए हैं, वे काबा का तवाफ़ कर लें और सफ़ा-मरवा का चक्कर लगा लें तथा बाल छोटे करवाने के बाद हलाल हो जाएँ। फिर उसके बाद हज का एहराम बाँधें और क़ुरबानी करें। फिर, जो क़ुरबानी न कर सके, वह हज के दिनों में तीन और घर जाने के बाद सात रोज़े रखे।" चुनांचे अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने मक्का पहुँचने के बाद तवाफ़ किया, तो सबसे पहले अपने हाथ से रुक्न का स्पर्श किया, फिर सात में से तीन चक्कर दुलकी चाल से और चार चक्कर साधारण चाल से चले। फिर, तवाफ़ पूरा करने के बाद मक़ामे इबराहीम के पास दो रकात नमाज़ पढ़ी। फिर मुड़कर सफ़ा आए और सफ़ा-मरवा के सात चक्कर लगाए। फिर एहराम ही की अवस्था में रहे, यहाँ तक कि हज कर लिया, क़ुरबानी के दिन क़ुरबानी की और काबा का अंतिम तवाफ़ किया। फिर वह सारी चीज़ें आपके लिए हलाल हो गईं, जो एहराम के कारण हराम हो गई थीं। रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने जो कुछ किया, वह उन सारे लोगों ने भी किया, जो अपने साथ कुरबानी लाए थ। मैंने अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा कि जब मक्का आते और (तवाफ़ शुरु करते समय) हजरे असवद को छूते, तो तीन चक्कर दुलकी चाल से चलते।
इसे दोनों रिवायतों के साथ बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उस हज के लिए निकले, जिसमें पवित्र काबा और हज के प्रमुख स्थानों सहित आम लोगों को अलविदा कहा, उन्हें अल्लाह का संदेश पहुचाँया और उन्हें इसका गवाह भी बनाया, तो आपने हज और उमरा का एहराम बाँधा। इस तरह आप क़िरान हज कर रहे थे। और क़िरान भी तमत्तो कहलाता है। अतः, लोगों ने भी आपके साथ तमत्तो किया। कुछ लोगों ने हज और उमरा दोनों का एहराम बाँधा, तो कुछ लोगों ने केवल उमरा का एहराम बाँधा और उसे पूरा करने के बाद हज की नीयत कर ली। जबकि कुछ लोगों ने केवल हज का एहरा्म बाँधा। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें हज की तीन किस्मों में से जो कोई भी करने का एख़्तियार दिया था। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) और आपके कुछ साथियों ने ज़ुल-हुलैफ़ा से क़ुरबानी के जानवर साथ ले लिए थे और कुछ साथियों ने नहीं भी लिए थे। जब वे मक्का के निकट पहुँच गए, तो कुरबानी न ले जाने वाले मुफ़रद और क़िरान हज करने वाले साथियों से कहा कि हज की नीयत तोड़कर उमरा की नीयत कर लें। जब वे तवाफ़ और सफ़ा मरवा के बीच सई कर चुके, तो उन्हें आदेश दिया कि अपने बाल छोटे करके उमरा से हलाल हो जाएँ और बाद में हज का एहराम बाँधें तथा क़ुरबानी करें, क्योंकि उन्होंने एक ही यात्रा में उमरा और हज दोनों किया है। जो कुरबानी न कर सके, उसे दस रोज़े रखने हैं। तीन हज के दिनों में, जिसका समय उमरा का एहराम बाँधने से शुरू होता है और सात घर वालों की ओर लौटने के बाद। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब मक्का पहुँचे, तो रुक्न को छुआ और सात तवाफ़ किए। तीन चक्करों में दुलकी चाल से चले, क्योंकि यह मक्का आने के बाद का तवाफ़ है। बाकी चार चक्करों में साधारण चाल से चले। फिर मक़ामे इबराहीम के पास दो रकअत नमाज़ पढ़ी। फिर सफ़ा पहाड़ी के पास आए और उसके तथा मरवा के बीच सात चक्कर लगाए। दो निशानों के बीच दोड़ते थे और बाक़ी साधारण चाल से चलते थे। फिर एहराम ही में रहे, यहाँ तक कि हज कर लिया और क़ुरबानी के दिन क़ुरबानी करके सिर मुंडवा लिए। यही प्रथम बार हलाल होना है। फिर चाश्त के समय काबा के पास गए और उसका तवाफ़ किया। फिर वह सारी चीज़ें आपके लिए हलाल हो गईं, जो हज के दिनों में हराम थीं, यहाँ तक स्त्रियाँ भी। ऐसा ही उन सारे लोगों ने किया, जो आपके साथ क़ुरबानी का जानवर लाए थे।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि ख़ंदक़ के दिन सूरज डूबने के बाद उमर बिन ख़त्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) आए और क़ुरैश के काफ़िरों को बुरा-भला कहने लगे तथा कहाः ऐ अल्लाह के रसूल, ऐसा लग रहा था कि मैं अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ा सकूँगा, यहाँ तक सूरज डूबने लगा, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अल्लाह की क़समः मैंने तो अभी तक अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ी है। वर्णनकर्ता कहते हैं कि फिर हम लोग बुतहान की ओर निकले, आपने नमाज़ के वज़ू किया, हमने भी वज़ू किया, फिर सूरज डूबने के बाद अस्र की नमाज़ पढ़ी और उसके बाद मग़रिब की नमाज़ पढ़ी।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उमर बिन खत्ताब (रज़ियल्लाहु अंहु) ख़ंदक़ कि दिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास सूरज डूबने के बाद क़ुरैश के काफ़िरों को बुरा-भला कहते हुए आए, क्योंकि उन्होंने उनको अस्र की नमाज़ पढ़ने का कोई अवसर नहीं दिया था और वह सूरज डूबने के निकट हो जाने तक अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ सके थे। उनकी बात सुन, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने क़सम खाकर फ़रमाया कि मैंने भी अभी तक अस्र की नमाज़ नहीं पढ़ी है, ताकि उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) को कुछ तसल्ली मिल जाए, जिन्हें नमाज़ पढ़ने में देर होने से बड़ी तकलीफ़ हुई थी। फिर नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उठकर वुज़ू किया और सारे सहाबा ने भी आपके साथ वुज़ू किया और सूरज डूबने के बाद अस्र की नमाज़ पढ़ी और उसके बाद मग़्रिब की नमाज़ पढ़ी।
जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि जब उहुद युद्ध का समय आ गया, तो मेरे पिता ने मुझे बुलाकर कहाः मुझे लगता है कि मैं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के उन साथियों के साथ क़त्ल कर दिया जाऊँगा, जो शूरु में ही शहीद होंगे। मैं अपने बाद अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सिवा किसी ऐसे व्यक्ति को छोड़कर नहीं जा रहा हूँ, जो मुझे तुमसे अधिक प्रिय हो। देखो, मुझपर कुछ क़र्ज़ है, तुम उसे उतार देना तथा अपनी बहनों के साथ अच्छे व्यवहार की वसीयत को क़बूल करना। (जाबिर कहते हैं कि) हमने सुबह की, तो सबसे पहले वही शहीद हुए और मैंने उनके साथ एक और व्यक्ति को एक ही क़ब्र में दफ़न कर दिया। फिर मेरे दिल को इस बात पर संतुष्टि नहीं मिली कि मैं उन्हें किसी और के साथ रहने दूँ। अतः, छह महीने बाद मैंने उन्हें निकाला, तो देखा कि कान के सिवा उनका पूरा शरीर वैसा ही था, जैसा मैंने उन्हें दफ़न करते समय रखा था। फिर मैंने उन्हें अलग क़ब्र में दफ़न कर दिया।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पत्नी हफ़सा- रज़ियल्लाह अन्हा- का वर्णन है कि उन्होंने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! क्या बात है कि लोगों ने उमरा करने के बाद एहराम खोल दिया है और आपने उमरा के बाद भी एहराम नहीं खोला? तो आपने फ़रमायाः मैंने अपने बाल जमा लिए थे और क़ुर्बानी के जानवरों को निशान लगा दिए थे। अतः, जब तक कुर्बानी न कर लूँ, एहराम नहीं खोल सकता।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हज्जतुल-वदा के अवसर पर उमरा तथा हज दोनों का एहराम बाँधा था, क़ुरबानी का जानवर भी साथ ले आए थे तथा यह देखते हुए कि लंबे समय तक एहराम की हालत में रहना है, अपने सर के बालों को किसी वस्तु से चिपका लिया था, ताकि वे बिखरने न पाएँ। आपके कुछ साथियों ने आप ही की तरह एहराम बाँधा था, तो कुछ ने केवल उमरा का एहराम बाँधा था, ताकि उमरा और हज के बीच में कुछ लाभ उठा सकें। अधिकतर लोग क़ुरबानी का जानवर साथ नहीं लाए थे, जबकि कुछ लोग लाए भी थे। जब मक्का पहुँचे और तवाफ़ तथा सफ़ा एवं मरवा के बीच दौड़ने का कार्य संपन्न कर लिया, तो आपने क़ुरबानी का जानवर साथ न लाने वाले लोगों को, जो हज-ए-इफ़राद और हज-ए-क़िरान करना चाहते थे, आदेश दिया कि वे हज के इरादे को निरस्त करके उसे उमरा के इरादे में बदल दें और हलाल हो जाएँ। लेकिन जहाँ तक ख़ुद आपकी और आपके उन साथियों की बात है, जो क़ुरबानी का जानवर साथ लाए थे, उन्होंने अपना एहराम बरक़रार रखा और हलाल नहीं हुए। यह देख आपकी पत्नी हफ़सा (रज़ियल्लाहु अन्हा) ने आपसे पूछा : क्या बात है कि लोग हलाल हो गए और आप हलाल नहीं हुए? तो आपने उत्तर दिया : मैंने सर के बालों को लेसदार वस्तु से चिपका लिया है, क़ुरबानी के जानवरों पर पट्टे डाल दिए हैं और उन्हें साथ ले आया हूँ, इसलिए मैं क़ुरबानी के जानवरों के, उनके स्थान तक पहुँचने, यानी क़ुरबानी के दिन हज पूरा होने से पहले एहराम उतार नहीं सकता।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास- रज़ियल्लाहु अन्हुमा- कहते हैं कि मैंने अपनी खाला मैमूना के पास रात बिताई। अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) रात की नमाज़ के लिए खड़े हुए तो मैं आपकी बाएँ ओर खड़ा हो गया। ऐसे में, आपने मेरा सिर पकड़ा और अपनी दाहिनी ओर खड़ा कर दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।पराक्रमी सहाबी अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि एक बार उन्होंने अपनी ख़ाला तथा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की पत्नी मैमूना (रज़ियल्लाहु अंहा) के यहाँ एक बिताई, ताकि स्वयं नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की रात की नमाज़ का हाल जान सकें। अतः, जब आप रात में नमाज़ के लिए खड़े हुए, तो अब्दुल्लाह भी आपके साथ नमाज़ पढ़ने के लिए आपकी बाईं ओर खड़े हो गए। लेकिन, चूँकि दाहिनी ओर खड़ा होना उत्तम है और यदि इमाम के साथ एक ही मुक़तदी हो, तो उसे इधर ही खड़ा होना चाहिए, इसलिए आपने उन्हें घुमाकर दाहिनी जानिब खड़ा कर दिया।