Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way






























Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
आइशा (रज़ि अल्लाहु अन्हा) कहती हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कपड़ों में जनाबत के कारण वीर्य लग जाता। कभी वीर्य गीला होता, तो उसे वह पानी से धो देतीं और आप भीगे हुए कपड़े ही में नमाज़ के लिए चल देते और कभी वीर्य सूखा होता, तो उसे आपके कपड़े से खुरच देतीं और आप उसी कपड़े में नमाज़ पढ़ लेते।
इस हदीस़ में फ़ज्र की दो रकअत सुन्नत का महत्व और उसकी ताकीद का उल्लेख है। आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) वर्ण करती हैं कि नबी (सल्लाल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इन दो रकअतों को अपने कार्य द्वारा महत्व देते हुए इन्हें पाबंदी से पढ़ा है तथा अपने मुँह से इनके महत्व का उल्लेख करते हुए कहा है कि यह दुनिया तथा उसकी तमाम वस्तुओं से बेहतर हैं।
यह हदीस़ जमाअत के साथ पढ़ी गई नमाज़ के अकेले पढ़ी गई नमाज़ से उत्तम होने का उल्लेख करते हुए कहती है कि जमाअत वाली नमाज़ (अन्य महत्वपूर्ण फ़ायदों और लाभों के अतिरिक्त) अकेले की नमाज़ से सत्ताईस गुना अधिक सवाब रखती है। क्योंकि दोनों नमाज़ों के बीच उद्देश्य की पूर्ति के मामले में ज़मीन आसमान का अंतर है तथा इस बात में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है कि जिसने इस बड़े लाभ को नष्ट कर दिया, वही वास्तव में वंचित व्यक्ति है।
मुआज़ा ने आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) से पूछा कि आख़िर क्या कारण है कि अल्लाह ने मासिक धर्म के दिनों में छूटे हुए रोज़ों को बाद में रख लेने आदेश दिया है, लेकिन इस अवधि में छूटी हुई नमाज़ों को बाद में पढ़ने का आदेश नहीं दिया, जबकि दोनों फ़र्ज़ इबादतें हैं, बल्कि नमाज़ रोज़े की तुलना में अधिक बड़ी इबादत है? चूँकि दोनों के बीच अंतर न करने का कठिनता पर आधारित निर्णय ख़्वारिज का है, इसलिए आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने उनसे कहा कि क्या तुम हरूरी अर्थात ख़ारिजी हो कि उन्हीं जैसी आस्था रखती हो और उन्हीं जैसी उग्रता दिखा रही हो? उन्होंने कहाः मैं हरूरी नहीं हूँ, मैं केवल जानने और मार्गदर्शन प्राप्त करने के लिए पूछ रही हूँ। यह सुन, आइशा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने कहाः नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के ज़माने में हम माहवारी के दिनों से गुज़रते, तो रोज़ा और नमाज़ दोनों छोड़ देते, फिर आप हमें बाद में रोज़ा रख लेने का आदेश देते, लेकिन नमाज़ पढ़ने का आदेश नहीं देते। अगर ऐसा करना ज़रूरी होता, तो आप हमें ज़रूर आदेश देते और ख़ामोश नहीं रहते। एक तरह से वह कहना चाहती थीं कि हिकमत और हिदायत की बात यही है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेशों का पालन किया जाए और आपकी ओर से निर्धारित सीमाओं को पार न किया जाए।
अबू जाफ़र मुहम्मद बिन अली और उनके पिता महान सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्लाह (रज़ियल्लाहु अंहुमा) के पास थे। उनके यहाँ कुछ और लोग भी मौजूद थे। इसी बीच एक व्यक्ति ने जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) से पूछा कि जनाबत से स्नान के लिए कितना पानी काफ़ी है? उन्होंने कहाः तेरे लिए एक साअ काफ़ी है। उस समय जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) के पास अन्य लोगों के साथ हसन बिन मुहम्मद बिन हनफ़िया भी बैठे थे। उन्होंने कहाः इतना-सा पानी जनाबत के स्नान में मेरे लिए पर्याप्त नहीं है। यह सुन जाबिर ने कहाः परन्तु, उनके लिए काफ़ी था, जो तुझसे अधिक तथा घने बाल वाले थे और तुझसे उत्तम भी थे, अतः उन्हें तुमसे अधिक स्वच्छता तथा इस्लाम के अनुपालन का ख़याल था। (उनकी मुराद नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से थी।) यह दरअसल, सुन्नत के अनुसरण और वुज़ू के समय आवश्यकता से अधिक पानी न बहाने की ओर प्रेरित करने का एक तरीका था। फिर, जाबिर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने इमाम बनकर उन्हें नमाज़ पढ़ाई।
गाय तथा बकरी इत्यादि को ज़बह करने का सुन्नत तरीक़ा यह है कि उन्हें बाएँ पहलू के बल, क़िबला की ओर मुँह करके लिटाकर उनके गले को काटा जाए। जबकि ऊँट को ज़बह करने का सुन्नत तरीक़ा यह है कि उसे खड़े करके, अगले बाएँ पाँव को बाँधकर, उसके सीने में छुरी डाली जाए। क्योंकि इससे जल्दी जान निकलने के कारण कष्ट कम होता है। इसी कारण जब अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) एक व्यक्ति के पास से गुज़रे, जो एक ऊँट को लिटाकर ज़बह करना चाहता था, तो फ़रमाया कि इसे खड़ा करके अगली बाईं टाँग को बाँधकर ज़बह करो। यही अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का तरीक़ा है, जिसका उल्लेख क़ुरआन की इस आत में हैः "فإذا وجبت جنوبها" (अर्थात, फिर जब उनके पहलू गिर जाएँ)। क्योंकि गिरने की बात उसी समय आएगी, जब खड़ा हो।
आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) बताती हैं कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) उनकी गोद में सर रखकर क़ुरआन पढ़ा करते, जबकि वह मासिक धर्म मे होतीं। यह इस बात का प्रमाण है कि मासिकधर्म वाली महिला का शरीर पाक है, नापाक नहीं।