





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) से रिवायत है कि मिना के दिनों में अबू बक्र (रज़ियल्लाहु अन्हु) उनके पास आए। उस समय उनके यहाँ दो लड़कियाँ डफ़ बजा रही थीं तथा नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अपने शरीर को एक कपड़े से ढाँपकर लेटे हुए थे। अबू बक्र ने उन दोनों को डाँटा, तो आपने चेहरे से कपड़ा हटाया और फ़रमायाः "जाने भी दो अबू बक्र! ये ईद के दिन हैं।" मालूम रहे कि वे मिना के दिन थे। आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) (एक और घटना को याद करते हुए) कहती हैं : मैंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को देखा कि आप मुझे छुपाए हुए हैं और मैं ह़बशियों की ओर देख रही थी, जो मस्जिद में खेल रहे थे। उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) ने उन्हें डाँटा, तो आपने कहा : "जाने भी दो! बनू अरफिदा! तुम निश्चिंत होकर खेलो।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अनस (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "क़यामत उस समय तक नहीं आएगी, जब तक कि लोग मस्जिदों के बारे में गर्व न करने लगें।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।रिफ़ाआ बिन राफे ज़ुरक़ी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से वर्णित है, जो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथियों में से थे, वह कहते हैं : रसूलुल्लाह (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) मस्जिद में बैठे हुए थे कि एक व्यक्ति आया और उसने आपके निकट ही नमाज़ पढ़ी। नमाज़ पूरी करने के बाद वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और सलाम किया, तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः "तुम अपनी नमाज़ को लौटाओ, क्योंकि तुमने नमाज़ ही नहीं पढ़ी है।" वर्णनकर्ता कहते हैं कि वह वापस गया और फिर उसी तरह नमाज़ पढ़ी, जैसे पहले पढ़ी थी। फिर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया, तो आपने फिर कहा : "तुम अपनी नमाज़ को लौटाओ, क्योंकि तुमने नमाज़ ही नहीं पढ़ी है।" यह सुन उसने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल, मुझे सिखा दीजिए कि मैं कैसे नमाज़ पढ़ूँ? आपने फ़रमाया : "जब क़िबला की ओर मुँह करो, तो अल्लाहु अकबर कहो, फिर सूरा फ़ातिहा पढ़ो, फिर क़ुरआन का जो भाग चाहो पढ़ो, फिर जब रुकू करो तो अपनी हथेलियों को अपने घुटनों पर रखो तथा अपनी पीठ को फैला दो और अच्छे ढंग से रुकू करो, फिर जब रुकू से सिर उठाओ तो अपनी पीठ सीधी कर लो, यहाँ तक कि सभी हड्डियाँ अपने जोड़ों पर लौट जाएँ, फिर जब सजदा करो तो ख़ूब अच्छे ढंग से सजदा करो, फिर जब सिर उठाओ तो अपनी बाईं रान पर बैठ जाओ। फिर हर रुकू और सजदा में ऐसा ही करो।" तथा एक रिवायत में है : "तुममें से किसी की नमाज़ उस समय तक पूरी नहीं होती, जब तक वह उसी प्रकार से अच्छी तरह वजू़ न करे, जिस प्रकार सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने आदेश दिया है। अतः, वह अपने चेहरे को और हाथों को कोहनी तक धोए, सिर का मसह करे तथा पाँव को टख़नों तक धोए, फिर सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की बड़ाई एवं प्रशंसा बयान करे, फिर क़ुरआन में से जितना पढ़ने का आदेश दिया गया है तथा जो उसके लिए सरल हो वह पढ़े, फिर अल्लाहु अकबर कहकर सजदा करे तथा ख़ूब अच्छे ढंग से अपने चेहरे को (तथा कभी फ़रमाया कि अपनी पेशानी को) ज़मीन पर टिकाए, यहाँ तक कि सभी जोड़ विश्राम मुद्रा में चले जाएँ एवं ढीले हो जाएँ, फिर तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहकर अपने नितंब पर सीधा होकर बैठ जाए और पीठ को सीधा रखे।" फिर इसी तरह अंत तक चारों रकातों का हाल बयान किया। "तुममें से किसी की नमाज़ उस समय तक पूरी नहीं होगी, जब तक कि वह इसी प्रकार न पढ़े।" तथा एक रिवायत में हैः "उसी प्रकार वज़ू करो, जिस प्रकार सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह ने आदेश दिया है, फिर वज़ू की दुआ पढ़ो, फिर इक़ामत कहो और फिर अल्लाहु अकबर कहो। फिर यदि क़ुरआन याद हो, तो उसे पढ़ो, अन्यथा अल-हमदुल लिल्लाह, अल्लाहु अकबर और ला इलाहा इल्लल्लाह कहो।"
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।मुहम्मद बिन अम्र बिन अता से रिवायत है, वह कहते हैं कि मैंने अबू हुमैद साइदी (रज़ियल्लाहु अंहु) को अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के दस सहाबा की उपस्थिति में, जिनमें अबू क़तादा भी थे, यह कहते हुए सुना कि मैं तुम लोगों में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नमाज़ को सबसे अधिक जानता हूँ। लोगों ने कहाः कैसे? जबकि तुम न तो हमसे अधिक आपका अनुसरण करते थे और न ही हमसे पहले नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आए थे? उन्होंने कहाः हाँ (तुम्हारी बात ठीक है)। उन लोगों ने कहा : अच्छा आप नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की नमाज़ का तरीका हमारे सामने रखिए तो सही। तो उन्होंने कहा :नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब नमाज़ के लिए खड़े होते, तो अपने दोनों हाथों को दोनों कंधों के बराबर उठाते, फिर तकबीर कहते यहाँ तक कि प्रत्येक हड्डी ठीक से अपने स्थान पर आ जाती, फिर (क़ुरआन) पढ़ते, फिर तकबीर कहते तथा अपने दोनों हाथों को कंधों के बराबर उठाते, फिर रुकू करते और अपनी हथेलियों को अपने घुटनों पर रखते और संतुलित रहते, न अपने सिर को ऊपर उठाकर रखते न बिलकुल झुका देते, फिर अपने सिर को उठाते और समिअल्लाहु लिमन हमिदह (अल्लाह ने उसकी प्रशंसा सुन ली जिसने उसकी प्रशंसी की) कहते, फिर अपने दोनों हाथों को कंधों के बराबर संतुलित अंदाज़ से उठाते, फिर अल्लाहु अकबर कहते, फिर ज़मीन की ओर झुकते तथा अपने दोनों हाथों को पहलू से दूर रखते, फिर अपने सिर को उठाते तथा अपने बाएँ पाँव को मोड़कर उसपर बैठते, और सजदा करते समय अपने पाँव की ऊँगलियों को खुला रखते, तथा सजदा करते, फिर अल्लाहु अकबर कहते और अपने सिर को उठाते तथा अपने बाएँ पाँव को मोड़कर उसपर बैठते, यहाँ तक कि प्रत्येक हड्डी अपने स्थान पर लौट जाती, फिर दूसरी रकात में भी ऐसा ही करते, फिर जब दो रकात के पश्चात खड़े होते तो अपने दोनों हाथों को दोनों कंधों के बराबर उठाते जिस प्रकार नमाज़ आरंभ करते समय तकबीर कहते हुए किया था, फिर ऐसा ही आप बाक़ी नमाज़ में किया करते थे, यहाँ तक कि जब उस सजदे से उठते जिसके पश्चात सलाम फेरना होत है, तो अपने बाएँ पाँव को पीछे करते तथा बाएँ नितंब पर तवर्रुक करते हुए बैठते (अर्थात, बाएं पाँव को दाएं पाँव के नीचे से निकाल लेते तथा नितंब पर बैठते)। सब लोगों ने कहा : आपने बिलकुल सही कहा है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ऐसे ही नमाज़ पढ़ा करते थे।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।अबू सईद ख़ुदरी (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब रात में उठते, तो तकबीर (अल्लाहु अकबर) कहते, फिर यह दुआ पढ़ते : "سبحانك اللهم وبحمدك وتبارك اسمك، وتعالى جدك، ولا إله غيرك" (ऐ अल्लाह, तू पवित्र है अपनी प्रशंसा समेत, तेरा नाम बड़ी बरकत वाला है, तेरी शान बड़ी बुलंद है और तेरे सिवा कोई सच्चा पूज्य नहीं।) ऐसा तीन बार कहते। फिर तीन बार «لا إله إلا الله» (तेरे सिवा कोई पूज्य नहीं।) कहते। फिर तीन बार «الله أكبر كبيرا» (अल्लाह सबसे बड़ा और बहुत बड़ा है।) कहते। फिर यह दुआ पढ़ते : «أعُوذُ بالله السَّميع العليم من الشَّيطان الرَّجيم من هَمْزِه، ونَفْخِه، ونَفْثِه» (ऐ अल्लाह, मैं धुतकारे हुए शैतान से तेरी शरण चाहता हूँ उसके जुनून से, उसके अहंकार पर उभारने से और उसके जादू से।) फिर क़ुरआन पढ़ते।
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे नसाई ने रिवायत किया है। - इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है। - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।मुसलमानों की माता आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा का वर्णन है, वह कहती हैं : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम नमाज़ तकबीर से और क़ुरआन पाठ "अल-ह़म्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" से आरंभ करते थे। जब आप रुकूअ करते, तो अपने सर को न उठाए रखते और न बहुत झुका देते, बल्कि इन दोनों के बीच रखते। जब रुकू से सर उठाते, तो उस समय तक सजदा नहीं करते, जब तक सीधे खड़े न हो जाते। जब सजदे से सर उठाते, तो दूसरा सजदा उस समय तक नहीं करते, जब तक ठीक से बैठ नहीं जाते। हर दो रकात पर "अत-तहिय्यात" पढ़ते और जब बैठते, तो अपने बाएँ पैर को बिछा देते और दाएँ पैर को खड़ा रखते तथा शैतान की तरह बैठने से मना फ़रमाते। आप इस बात से भी मना करते थे कि आदमी अपने दोनों बाज़ुओं को दरिंदे की तरह बिछा दे। आप नमाज़ का अंत सलाम से करते थे।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैउम्मुल मोमिनीन आइशा रज़ियल्लाहु अन्हा ने नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की नमाज़ के बारे में बताया कि आप अपनी नमाज़ का आरंभ तकबीर-ए-एहराम से करते और कहते : "अल्लाहु अकबर" और क़िरात का आरंभ सूरा फ़ातिहा से करते और कहते : "अल-हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन" (सारी प्रशंसा अल्लाह ही के लिए है, जो सारे संसारों का पालनहार है...।) और जब क़ियाम के बाद रुकू करते, तो रुकू के दौरान अपना सर न ऊँचा रखते और न बहुत ज़्यादा झुका देते, बल्कि बिल्कुल सीधा और बराबर रखते थे। और जब रुकू से अपना सर उठाते, तो सजदा करने से पहले सीधे खड़े हो जाते, और जब पहले सजदे से सर उठाते, तो तब तक दूसरा सजदा नहीं करते जब तक कि स्थिर होकर बैठ न जाते। हर दो रकात के बाद तशह्हुद के लिए बैठते और पढ़ते : «अत्तहिय्यातु लिल्लाहि वस्सलवातु वत्तय्यिबात...», तथा जब दोनों सजदों के दरमियान या तशह्हुद के लिए बैठते, तो अपने बाएँ पैर को बिछाकर उसपर बैठते और दाएँ पैर को खड़ा रखते। आप नमाज़ी को अपनी नमाज़ में शैतान की तरह बैठने से मना करते थे। शैतान की तरह बैठना इस प्रकार है कि आदमी अपने दोनों पैरों को ज़मीन पर बिछा दे और अपनी एड़ियों पर बैठे, या अपने नितंबों को ज़मीन से चिपका ले और अपनी पिंडलियों को खड़ा रखे तथा अपने हाथों को ज़मीन पर रखे जैसे कुत्ता बैठता है, या यह कि नमाज़ी सजदे में अपनी भुजाओं को दरिंदों की तरह ज़मीन पर बिछा दे। आप एक बार दायीं ओर और दूसरी बार बायीं ओर «السلام عليكم ورحمة الله» कहकर अपनी नमाज़ का समापन करते थे।