Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way






























Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथीगण उनमें से किसी के जनाज़े में मदीने वालों की क़ब्रिस्तान में उपस्थित थे। आप भी उनके बीच बैठ गए। उस समय आपके हाथ में एक छड़ी थी। अपना सर धरती की ओर झुका लिया और छड़ी से धरती को खुरचने लगे। ऐसा मालूम हो रहा था कि कुछ सोच रहे हैं और चिंतित हैं। फिर फ़रमाया कि अल्लाह ने लोगों के भाग्य लिख रखे हैं और जन्नत एवं जहन्नम में उनका ठिकाना भी लिख रखा है। जब सहाबा -रज़ियल्लाहु अनहुम- ने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की यह बात सुनी, तो कहने लगे कि जब सारे निर्णय पहले ही हो चुके हैं और यह तय हो चुका है कि जो अभागा है वह अभागा ही रहेगा और जो भाग्यशाली है वह भाग्यशाली ही रहेगा, इसी तरह जिसे जन्नत जाना है वह जन्नत ही जाएगा और जिसे जहन्नम जाना है वह जहन्नम ही जाएगा, तो क्या हम कर्म करना छोड़ न दें? क्योंकि कर्म का कोई फ़ायदा तो है नहीं! हर चीज़ लिखी हुई और निश्चित है! सहाबा की इन बातों का उत्तर देते हुए आपने कहा कि तुम कर्म करते रहो और भाग्य में लिखी भलाई एवं बुराई पर भरोसा करके बैठ न जाओ। तुम्हें जिन बातों का आदेश दिया गया है, उनका पालन करते रहो और जिन कामों से रोका गया है, उनसे रुक जाओ। क्योंकि जन्नत भी कर्म से प्राप्त होती है और जहन्नम भी कर्म से प्राप्त होती है। जन्नत में प्रवेश का सौभाग्य उसी को प्राप्त होगा, जिसने जन्नत जाने योग्य कर्म किए होंगे और जहन्नम में प्रवेश की पीड़ा भी उसी को झेलनी पड़ेगी, जिसने जहन्नम की ओर ले जाने वाले कर्म किए होंगे। हर व्यक्ति के लिए वही आसान कर दिया जाता है, जिसके लिए उसे पैदा किया गया है। भलाई हो कि बुराई। जो भाग्यशाली होगा, अल्लाह उसके लिए भाग्यशाली लोगों का कर्म आसान करे देगा और जो भाग्यहीन होगा अल्लाह उसके लिए भाग्यहीन लोगों का कर्म आसान कर देगा।
अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने इस बात से सावधान किया है कि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से कहे कि : तुम फ़ासिक़ हो, या तुम काफ़िर हो। क्योंकि अगर सामने वाला व्यक्ति फ़ासिक़ या काफ़िर न हुआ, तो कहने वाला व्यक्ति ही इस विशेषण का हक़दार हो जाएगा और उसकी कही हुई बात उसी की ओर लौट जाएगी। लेकिन, अगर वह वैसा ही हो जैसा कि उसने कहा, तो कहने वाले का कोई नुक़सान नहीं होगा क्योंकि उसकी बात दुरुस्त है।
जो पुरुष अथवा स्त्री किसी की पत्नी को उसके खिलाफ़ भड़काए और इस काम के लिए उसके सामने उसके पति की बुराइयाँ और कुव्यवहार का बखान कुछ इस तरह करे कि वह अपने पति से घृणा करने लगे, उसकी अवज्ञा करने लगे और खुला एवं तलाक लेकर उससे अलग होने का प्रयास करने लगे, या फिर किसी के दास को उसके मालिक के खिलाफ़ इस तरह भड़का दे और उसके साथ कुछ ऐसे कार्य करे कि वह उसके विरुद्ध विद्रोह कर बैठे और उसके साथ बुरा व्यवहार करने लगे, इस हदीस में उसके बारे में यह बड़ी चेतावनी दी गई है, जो इस बात का प्रमाण है कि यह महा पाप है और धमकी तथा चेतावनी के योग्य है।
इस हदीस में अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने उन्हें बताया है कि यहूदी एवं ईसाई अपने सर एवं दाढ़ी के बालों को रंगने से गुरेज़ करते हैं और उन्हें अपने हाल पर सफ़ेद ही रहने देते हैं। अतः आपने आदेश दिया कि लोग उनकी मुख़ालफ़त करें और अपने दाढ़ी एवं सर के बालों को रंग लिया करें।
अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- किसी भी चीज़ का अपशगुन नहीं लेते थे। याद रहे कि यहाँ मुराद ऐसा अपशगुन है, जो इन्सान को किसी काम से रोक दे, जैसा कि अज्ञान काल में हुआ करता था। इस्लाम ने अपशगुन लेने, चिड़िया उड़ाकर शगुन मालूम करने और तीर के द्वारा किसी काम के करने योग्य होने या न होने का पता लगाने जैसी चीज़ों से मना किया है और इनके बदले में इसतिख़ारा जैसी चीज़ प्रदान की है।
जो लोग किसी प्राण वाली चीज़, जैसे इन्सान अथवा जानवर का चित्र बनाते हैं, चाहे चित्र तराशकर बनाएँ, पेंट एवं ब्रश से बनाएँ या फोटोग्राफ के रूप में बनाएँ, इसी तरह चाहे चित्र तुच्छ हो या न हो, उन्हें उनके इस कर्म के बदले में क़यामत के दिन यातना दी जाएगी। क्योंकि अपने इस काम द्वारा वे अल्लाह की रचना की बराबरी करना चाहते हैं। तथा उनसे कहा जाएगा : "उसे जीवित करो" यानी जिस प्रकार तुमने शरीर बनाया है, उसी प्रकार उसमें प्राण पैदा करो। "जिसे तुमने पैदा किया है" यानी जिसका तुमने चित्र बनाया है, जो अल्लाह की रचना के समान है। जब तुमने अल्लाह के समान सृष्टि करने का काम किया है, तो उसमें प्राण डालकर दिखाओ। यह दरअसल एक प्रकार की धमकी एवं डाँट-डपट है। सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से वर्णित है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : "जिसने दुनिया में कोई चित्र बनाया, उसे क़यामत के दिन उसमें प्राण डालने को कहा जाएगा और वह ऐसा कर नहीं सकेगा।" जबकि सहीह बुख़ारी की एक रिवायत में है : "जिसने कोई चित्र बनाया उसे अल्लाह उस समय तक यातना देता रहेगा, जब तक उसमें प्राण न डाल दे।" इमाम नववी कहते हैं : "उलेमा ने कहा है : किसी प्राणी का चित्र बनाना एक घोर अवैध कार्य तथा महा-पाप है। क्योंकि उसके बारे में वह चेतावनी दी गई है, जिसका उल्लेख इस हदीस में है। चाहे चित्र किसी ऐसी चीज़ पर बनाया जाए जो तुच्छ हो या ऐसी चीज़ पर बनाया जाए जो तुच्छ न हो। उसे बनाना हर अवस्था में हराम है। क्योंकि यह एक प्रकार से अल्लाह की रचना की बराबरी करना है।"
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि रहमत के फ़रिश्ते उस घर में प्रवेश नहीं करते, जिसमें कुत्ता तथा प्राण वाली चीज़ों की तस्वीर हो। क्योंकि प्राण वाली चीज़ों की तस्वीर बनाना एक बड़ा गुनाह, रचना कार्य में अल्लाह के समान होने का दावा और शिर्क का ज़रिया है। कुछ तस्वीरें तो उन चीज़ों की भी हुआ करती है, जिनको अल्लाह को छोड़कर पूजा जाता है। जिस घर में कुत्ता हो, उसमें फ़रिश्ते प्रवेश इसलिए नहीं करते कि कुत्ता गंदी चीज़ें बहुत ज़्यादा खाता है और इसलिए कि कुछ कुत्तों को शैतान भी कहा जाता है। जबकि फ़रिश्ते शैतान के विपरीत हैं। तीसरी बात यह है कि कुत्ते के शरीर से बदबू आती है और फ़रिश्तों को बदबू से नफ़रत है। चौथी बात यह है कि कुत्ता पालना मना है, इसलिए कुत्ता पालने वाले का दंड यह निर्धारित किया गया है कि रहमत के फ़रिश्ते उसके घर में प्रवेश नहीं करेंगे, उसके घर के दुआ नहीं मानेंगे, उसके लिए क्षमा नहीं माँगेंगे, उसके तथा उसके घर के लिए बरकत की दुआ नहीं करेंगे और उसे शैतान के द्वारा दिए गए कष्टों से बचाने का काम नहीं करेंगे।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने बताया है कि फ़रिश्ते उस क़ाफ़िले के साथ नहीं रहते, जिसके साथ कुत्ता या घंटी हो, जिसे जानवरों के गलों में बाँधा जाता है और जो हिलने पर बजती है।
अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम "तवाग़ी" की क़सम खाने से मना फ़रमा रहे हैं। "तवाग़ी" बहुवचन है, "ताग़ियह" का। मुराद ऐसे बुत हैं, जिनकी पूजा अल्लाह को छोड़कर मुश्रिक लोग किया करते थे। यही बुत उनकी सरकशी एवं अविश्वास का सबब थे। इसी प्रकार आप पूर्वजों की क़सम खाने से मना कर रहे हैं। क्योंकि इस्लाम-पूर्व युग में अरबों में अपने बाप दादाओं की क़सम खाकर गर्व और सम्मान की भावना रखने का प्रचलन था।