





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने एक बार (मस्जिद के अंदर) क़िबले की ओर थूक देखा, तो यह आपको बहुत बुरा लगा और इसका प्रभाव आपके चेहरे पर देखा गया। चुनांचे आप खड़े हुए और उसे अपने हाथ से साफ़ किया तथा फ़रमाया : "तुममें से कोई जब नमाज़ में खड़ा होता है, तो वह अपने रब से व्यक्तिगत रूप से बात कर रहा होता है या उसका रब उसके और क़िबले के बीच होता है। इसलिए, तुममें से कोई (नमाज़ की हालत में) क़िबले की ओर न थूके। बल्कि बाएँ तरफ़ या अपने क़दमों के नीचे थूके।" फिर आपने अपनी चादर के एक किनारे को पकड़कर उसमें थूका और उसे आपस में रगड़ दिया और कहा : "या फिर इस तरह करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने मस्जिद के क़िबले की ओर वाली दीवार में बलग़म लगा देखा, तो आपको बड़ा बुरा लगा, जिसका प्रभाव आपके चेहरे से झलकने लगा। अतः खुद खड़े हुए और अपनी उम्मत को सिखाने तथा अपने प्रभु के सामने अपनी विनम्रता प्रकट करने के लिए एवं उसके घर के प्रेम में स्वयं अपने हाथ से बलग़म को साफ़ कर दिया और उसके बाद बताया कि जब बंदा नमाज़ में खड़ा होता है तो अल्लाह के ज़िक्र, उससे दुआ और उसकी आयतों की तिलावत के माध्यम से उससे बात कर रहा होता है। अतः उसे चाहिए कि वह इस स्थान का ध्यान रखते हुए विनयपूर्ण तरीक़े से नमाज़ पढ़े और उस पवित्र अल्लाह की महानता को ध्यान में रखे जिससे वह वार्तालाप कर रहा है, दिल से उसकी ओर मुतवज्जेह रहे और कोई ऐसा कार्य न करे, जो अल्लाह के साथ बेअदबी ठहरे। इसलिए वह क़िबले की ओर न थूके। फिर आपने बताया कि यदि नमाज़ की हालत में थूकने की ज़रूरत पड़ जाए, तो इन्सान को क्या करना चाहिए। बताया कि वह अपनी बाएँ ओर या बाएँ क़दम के नीचे थूके या फिर कपड़े में थूके और उसके उसे मसल दे। नमाज़ पढ़ रहे व्यक्ति को हमेशा ज़ेहन में रखना चाहिए कि वह अल्लाह के सामने खड़ा है और अल्लाह उसकी ओर मुतवज्जेह है। यह और बात है कि पवित्र एवं उच्च अल्लाह आकाश में अपने अर्श के ऊपर है, लेकिन उसने हर चीज़ को अपने घेरे में ले रखा है। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "उसके जैसी कोई चीज़ नहीं है तथा वह सुनने वाला देखने वाला है।" (सूरा अश-शूरा : 11) अल्लाह के नमाज़ी के सामने होने का मतलब यह नहीं है कि वह लोगों के बीच रहता है या फिर उस स्थान में है जहाँ कोई व्यक्ति नमाज़ पढ़ रहा होता है। अल्लाह इन सारी बातों से ऊँचा है। अल्लाह नमाज़ी एवं पुकारने वाले से निकट तो होता है, लेकिन यह निकटता उसके प्रताप के अनुरूप है। यह निकटता एक सृष्टि की दूसरी सृष्टि से निकटता जैसी नहीं है। बल्कि यह प्रतापी एवं महान अल्लाह की, सृष्टि से निकटता है। अल्लाह की सृष्टि से इसका उदाहरण देना हो तो सूरज का उदाहरण दे सकते हैं, जो इन्सान से ऊपर होने के बावजूद निकलते तथा डूबते समय उसके सामने होता है।
अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) से रिवायत है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया : "मुझे ऊँची-ऊँची मस्जिदें निर्माण करने का आदेश नहीं दिया गया है।" अब्दुल्लाह बिन अब्बास कहते हैं : तुम मस्जिदों को ज़रूर उसी तरह सजाओगे, जैसे यहूदियों तथा ईसाइयों ने सजाया था।
इसे अबू दाऊद ने रिवायत किया है।यहाँ "تشييد المساجد" से मुराद ऊँची-ऊँची मस्जिदें बनाना और उन्हें सजाने-सँवारने में अतिशयोक्ति करना है। अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- के कथनानुसार मस्जिदों को सजाना-सँवारना यहूदियों एवं ईसाइयों का काम है। रही बात मस्जिदों को सजाए बिना उन्हें मज़बूत बनाने की, तो यदि अभिमान, दिखावा और शोहरत के लिए न हो, तो मकरूह नहीं है। क्योंकि उसमान बिन अफ़्फ़ान -रज़ियल्लाहु अनहु- से वर्णित हदीस में है : "जिसने अल्लाह के लिए मस्जिद बनाई, अल्लाह उसके लिए जन्नत में उसी प्रकार का घर बनाएगा।" अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की मस्जिद कच्ची ईंटों की थी, उसकी छत खजूर की शाखाओं की बनी हुई थी और उसके खंभे खजूर के तनों के थे। उसमें अबू बक्र -रज़यल्लाहु अनहु- ने कोई वृद्धि नहीं की। लेकिन जब उमर बिन ख़त्ताब -रज़ियल्लाहु अनहु- के ज़माने में उसकी लकड़ियाँ कमज़ोर हो गईं, तो उसे उसके पहले स्थान पर दोबारा बनवा दिया और लगे हाथों कुछ वृद्धि भी कर दी। फिर उसमान बिन अफ़्फ़ान -रज़ियल्लाहु अनहु- ने अपने ज़माने में उसमें बहुत ज़्यादा वृद्धि की। दीवारें पत्थर एवं चूने की बनवा दीं, खंभे पत्थरों के बनवा दिए और छत सागवान की लकड़ी की बनवा दी। इस तरह देखा जाए, तो उन्होंने मस्जिद के निर्माण में ऐसी चीज़ों का इस्तेमाल किया, जिनसे मज़बूती आए और सजावट न हो। जहाँ तक खुदे हुए पत्थरों के प्रयोग की बात है, तो उन्हें उनके आदेश से खुदा नहीं गया था, बल्कि उन्हें खुदा हुआ ही प्राप्त किया गया था और जिन सहाबा ने उनका खंडन किया था, उनके पास उनका प्रयोग न करने का एकमात्र प्रमाण यह था कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- और उमर -रज़ियल्लाहु अनहु- का अनुसरण करते हुए मस्जिद के निर्माण में फ़जूलखर्ची से काम न लिया जाए। जबकि यह मस्जिद को मज़बूत बनाने की मनाही या मकरूह होने का प्रमाण नहीं हो सकता।
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अन्हु से वर्णित है, वह कहते हैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : ''मेरे सहाबा को बुरा-भला मत कहो। तुममें से कोई यदि उहुद पर्वत के बराबर सोना ख़र्च कर दे, तब भी उनके एक या आधा मुद खर्च करने के बराबर नेकी प्राप्त नहीं कर सकता।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा को गाली देने से मना किया है। ख़ास तौर से सबसे पहले इस्लाम ग्रहण करने वाले मुहाजिरों और अंसार को। आपने आगे बताया कि अगर कोई व्यक्ति उहुद पर्वत के बराबर भी सोना खर्च कर दे, तो उतना सवाब प्राप्त नहीं कर सकेगा, जितना किसी सहाबी को एक मुद या आधा मुद खर्च करने पर मिल जाया करता था। याद रहे कि मुद मध्यम शरीर वाले इन्सान के एक लप भर को कहते हैं। सहाबा को इतना बड़ा सवाब उनकी निष्ठा, सच्ची नीयत और मक्का विजय से पहले ऐसे समय में खर्च करने तथा युद्ध में शामिल होने के कारण मिला, जब उसकी बहुत ज़्यादा ज़रूरत थी।
जाबिर -रज़ियल्लाहु अनहु- का वर्णन है, वह बयान करते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "कोई ऐसा व्यक्ति जहन्नम हरगिज़ नहीं जाएगा, जो बद्र एवं हुदैबिया में शामिल रहा हो।"
इसे इमाम अह़मद ने रिवायत किया है और इसकी असल (मूल) स़ह़ीह़ मुस्लिम में हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया कि ऐसा व्यक्ति हरगिज़ जहन्नम नहीं जाएगा, जिसने बद्र की लड़ाई में, जो सन 2 हिजरी में हुई थी, अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ रहकर युद्ध किया। इसी तरह ऐसा व्यक्ति भी हरगिज़ जहन्नम नहीं जाएगा, जो सुलह हुदैबिया में शामिल रहा, जो सन 6 हिजरी में हुई थी और जिस में बैअत-ए-रिज़वान भी हुई थी।
अनस रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा से फ़रमाया : "यह दोनों नबियों और रसूलों को छोड़ तमाम अगले और पिछले अधेड़ उम्र जन्नतियों के सरदार हैं।"
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि अबू बक्र और उमर रज़ियल्लाहु अनहुमा नबियों के बाद सबसे श्रेष्ठ इन्सान और नबियों तथा रसूलों के बाद जन्नत जाने वाले सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति हैं।
अबू सईद ख़ुदरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "हसन और हुसैन जन्नत के जवानों के सरदार हैं।"
इसे तिर्मिज़ी और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि आपके दोनों नवासे हसन और हुसैन रज़ियल्लाहु अनहुमा, जो अली बिन अबू तालिब रज़ियल्लाहु अनहु तथा नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की बेटी फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अनहा के बेटे हैं, मर्तबा और श्रेष्ठता के ऐतबार से, जवानी की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होने वाले और जन्नत में प्रवेश करने वाले तमाम लोगों के सरदार होंगे। इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि दोनों नबियों और ख़ुलफ़ा-ए-राशिदीन को छोड़कर तमाम जन्नती जवानों के सरदार होंगे।
अबू बकरा -रज़ियल्लाहु अंहु- कहते हैं कि एक दिन नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हसन -रज़ियल्लाहु अन्हु- को लेकर बाहर आए, उन्हें साथ लेकर मिंबर के ऊपर गए और फ़रमायाः "मेरा यह बेटा सरदार है। हो सकता है कि अल्लाह इसके द्वारा दो मुस्लिम गिरोहों के बीच सुलह करा दे।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।एक दिन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- हसन -रज़ियल्लाहु अनहु- को, जो उस समय छोटे बच्चे थे, अपने साथ मस्जिद ले आए। फिर उनको लेकर मिंबर पर चढ़ गए और लोगों को बताया कि उनका बेटा हसन सरदार है, सम्मानित कुल से है, शिष्ट नसब वाला है, धरती के ऊपर पाए जाने वाले सबसे उत्कृष्ट घराने से संबंध रखता है और उच्च एवं महान अल्लाह इसके ज़रिए मुसलमानों के दो युद्धरत समूहों के बीच सुलह करा देगा तथा इन दो समूहों में सुलह होने के बाद मुसलमानों को एक व्यापक बिखराव से मुक्ति मिल जाएगी। इस बात में किसी संदेह की गुंजाइश नहीं है कि यह हदीस अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के अल्लाह के नबी होने की एक बड़ी निशानी है। क्योंकि आपने अपने नवासे हसन बिन अली -रज़ियल्लाहु अनहु- के द्वारा मुसलमानों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने, उनके बिगड़े हुए रिश्तों को सुधारने और दो बहुत बड़े समूहों के बीच उत्पन्न झगड़े को ख़त्म करने का जो बड़ा काम बाद में होने वाला था, उसकी भविष्यवाणी पहले ही कर दी थी। इस महत्वपूर्ण भविष्यवाणी को धरा पर उतरते हुए उस समय देखा गया, जब सन 40 अथवा 41 हिजरी को हसन -रज़ियल्लाहु अनहु- ने खुद को ख़िलाफ़त से अलग कर लिया और मुआविया -रज़ियल्लाहु अनहु- को ख़िलाफ़त सौंप दी, जो एक बहुत बड़े बिखराव तथा रक्तपात की समाप्ति का कारण बना।
अबू हुरैरा -रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "जिसने हसन और हुसैन से मुहब्बत की, उसने मुझसे मुहब्बत की और जिसने उन दोनों से दुश्मनी की, उसने मुझसे दुश्मनी की।"
इसे इब्ने माजा ने रिवायत किया है । - इसे अह़मद ने रिवायत किया है।जिसने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के नवासों हसन एवं हुसैन से प्रेम रखा उसने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से प्रेम रखा और जिसने उन दोनों से नफ़रत की उसने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से नफ़रत की, अतः यह बात दोनों के मरतबे को दर्शाती है।
उमर जुमई -रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमायाः "जब अल्लाह किसी बंदे के साथ भलाई चाहता है, तो उसकी मृत्यु से पहले उस से अच्छे कार्य करवाता है।" क़ौम के एक व्यक्ति ने पूछा कि 'استعملَه' का क्या मतलब है? तो आपने फ़रमायाः "अल्लाह उसे मृत्यु से पहले अच्छे अमल करने की तौफ़ीक़ देता है और उसी हाल में दुनिया से उठाता है।"
इसे अह़मद ने रिवायत किया है।जब अल्लाह अपने बंदों में से किसी बंदे के साथ भलाई का इरादा करता है, तो उसे मृत्यु से पहले सत्कर्म का सुयोग प्रदान करता है, ताकि सत्कर्म पर मरने के कारण उसका अंत अच्छा हो और जन्नत नसीब हो जाए।