





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः व्यवसायिक दलों से आगे बढ़कर न मिलो, तुममें से कोई अपने भाई के सौदे पर सौदा न करे, आपस में दाम न बढ़ाओ, नगर का रहने वाला देहात में रहने वाले का सामान न बेचे तथा दूध देने वाली ऊँटनी और बकरी को बेचने के लिए थन में उसका दूध रोक कर न रखो। यदि किसी ने इस तरह का जानवर ख़रीदा तो दोहने के बाद उसे दो बातों में से जो बेहतर हो, उसका अधिकार होगा; जानवर उसे पसंद आए तो अपने पास रख ले और पसंद न आए तो वापस कर दे तथा साथ में एक साअ खुजूर भी देगा।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने पाँच प्रकार की ख़रीद-बिक्री से मना फ़रमाया, जो हराम हैं। इनसे मना करने का कारण यह है कि इनसे ख़रीदने वाले, बेचने वाले या किसी और को नुक़सान होता है। 1. आपने इस बात से मना किया है कि जो लोग खाने-पीने की वस्तु या पशु आदि को बेचने के लिए बाज़ार ला रहे हों, उनके बाज़ार पहुँचने से पहले ही कोई आगे बढ़कर उनसे मिले और उनका सामान ख़रीद ले। इससे मना करने का कारण यह है कि बेचने वाले को भाव का पता नहीं होता। अतः संभव है कि धोखे में कम क़ीमत देकर उनसे सामान ख़रीद लिया जाए और बाज़ार आकर अधिक दाम पाने का उनका प्रयास निष्फल हो जाए। 2. इसी तरह किसी के बेचने पर बेचने और किसी के ख़रीदने पर ख़रीदने से मना किया है। इसकी सूरत यह है कि कोई खरीदने वाले से ख़रीद-बिक्री की मजलिस में या सामान रखने अथवा लौटाने के अधिकार की अवधि में कहेः मैं तुम्हें इससे अच्छा सामान दूँगा या इससे कम दाम में दूँगा। या फिर बेचने वाले से कहे कि मैं तुमसे इससे अधिक दाम में ख़रीद लूँगा। उद्देश्य यह हो कि उह मामले को निरस्त करके उससे मामला कर ले। इसी तरह बाद में इस तरह की बात करने से भी मना किया है। क्योंकि इस तरह के उकसावे से आपसी द्वेष और शत्रुता पैदा होती है। इसके साथ ही यह किसी को उसकी रोज़ी से वंचित करने का सबब भी है। 3. इसी तरह ख़रीदने का इरादा न होने के बावजूद, बेचने वाले को लाभ पहुँचाने अथवा ख़रीदने वाले का नुक़सान करने के उद्देश्य से सामान का भाव बढ़ाने से मना किया है। क्योंकि यह ख़रीदने वाले को झूठ बोलने और उसके साथ धोखा करने तथा फ़रेब के सहारे सामान का दाम बढ़ाने का ज़रिया है। 4. इसी तरह इस बात से भी मना किया है कि कोई नगर का रहने वाला किसी देहाती का सामान बेचे, क्योंकि वह सामान का पूरा-पूरा भाव वसूल लेगा और उसमें कोई कमी नहीं रहने देगा कि ख़रीदने वालों को कुछ लाभ हो। इसी संदर्भ में नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया हैः "लोगों को अपने हाल पर छोड़ दो कि अल्लाह उनमें से किसी को किसी के ज़रिए रोज़ी दे।" 5. किसी दूध देने वाले जानवर को बेचने से पहले उसके थन में दूध रोकना, ताकि ख़रीदने वाला यह समझे कि यह जानवर आम तौर पर इतना ही दूध देता है और उसे उसके वास्तविक दाम से अधिक दाम देकर ख़रीद ले। दरअसल, यह ख़रीदने वाले के साथ धोखा और उसपर अत्याचार है। यही कारण है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़रीदने वाले को तीन दिन का समय दिया है, ताकि वह चाहे तो उसे अपने पास रखे और चाहे तो वास्तविकता से अवगत होने के बाद बेचने वाले को लौटा दे। अगर उसने दूध दुहा है, तो जानवर के साथ दूध के बदले में एक सा खजूर भी देगा।
अली बिन अबू तालिब (रज़ियल्लाहु अंहु) कहते हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़ैबर के दिन निकाहे-मुताह (अस्थायी निकाह) तथा घरेलू गधे के मांस से मना किया था।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।शरीयत निकाह के ज़रिए सदा के लिए एक डोरी में बाँधना, प्रेम पैदा करना और परिवार का निर्माण करना चाहती है तथा उसने निकाह की कई ऐसी सूरतों को हराम क़रार दिया है, जो उसके उद्देश्य से मेल नहीं खातीं। यही कारण है कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़ैबर के ज़माने में निकाह-ए-मुताह को हराम घोषित किया है। निकाह-ए-मुताह यह है कि आदमी किसी स्त्री से कुछ समय के लिए निकाह करे। वैसे शुरू-शुरू में इसे, कुछ मसलहतों के तहत, जायज़ रखा गया था। इसी तरह आपने घरेलू गधे, जो पाले जाते हैं, उनका मांस खाने से भी मना किया है।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) का वर्णन है कि उन्होंने अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को फ़ज्र की अंतिम रकात में, रुकू से सिर उठाने और 'سَمِعَ الله لمن حَمِدَه رَبَّنا ولك الحَمْدُ' कहने के बाद कहते हुए सुनाः ऐ अल्लाह! अमुक, अमुक और अमुक पर लानत कर। इसी पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारीः (لَيْسَ لَكَ مِنَ الأَمْرِ شَيْءٌ) (ऐ रसूल! आपका इसमें कुछ बस नहीं)। तथा एक रिवायत में हैः आप सफ़वान बिन उमय्या, सुहैल बिन अम्र और हारिस बिन हिशाम पर बददुआ कर रहे थे। फिर यह आयत उतरीः (لَيْسَ لَكَ مِنَ الأَمْرِ شَيْءٌ) (ऐ रसूल! आपका इसमें कुछ बस नहीं)।
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया है।इस हदीस में अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अनहुमा) बता रहे हैं कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) जब फ़ज्र की अंतिम रकात में रुकू से सिर उठाते, तो "سمِع اللهُ لمن حَمِده" कहने के बाद कुछ मुश्रिक सरदारों के विरुद्ध दुआ-ए- क़ुनूत पढ़ते, जिन्होंने उहुद युद्ध के दिन आपको कष्ट पहुँचाया था। कभी-कभी उनका नाम लेकर भी लानत करते थे। ऐसे में अल्लाह ने इससे रोकने के लिए यह आयत उतारीः "ليس لك من الأمر شيء" इसका कारण यह है कि अल्लाह को पता था कि वे एक दिन ईमान ले आएँगे और अच्छे मुसलमान बन जाएँगे।
फ़तिमा बिंत क़ैस (रज़ियल्लाहु अंहा) से वर्णित है कि अबू अम्र बिन हफ़्स ने उन्हें तीन तलाक़ों में से अंतिम तलाक़ दे दिया, जबकि उस समय वह घर से बाहर थे। (एक दूसरी रिवायत में है उन्होंने उनको तीन तलाक़ दे दिया।) फिर उनके प्रतिनिधि ने फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अंहा) को कुछ जौ भेजा तो वह अबू अम्र पर बिगड़ गईं। यह देख, अबू अम्र ने कहाः अल्लाह की क़सम! तुम्हारा हमारे ऊपर कोई अधिकार नहीं है। इसलिए, वह अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आईं और आपके सामने इसका ज़िक्र किया तो फ़रमायाः वह तुम्हारे भरण-पोषण का उत्तरदायी नहीं है। (तथा एक रिवायत में है कि वह तुम्हें इद्दत के दिनों में रहने के लिए निवासस्थान देने का भी उत्तदायी नहीं है।) अतः, उन्हें उम्मे शरीक के घर में इद्दत गुज़ारने का आदेश दिया और फिर फ़रमायाः वह एक ऐसी स्त्री है कि उसके यहाँ मेरे सहाबियों का आना-जाना रहता है, इसलिए अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम के यहाँ इद्दत गुज़ारो। वह एक दृष्टिहीन व्यक्ति है। तुम वहाँ कपड़े उतार सकती हो। फिर जब हलाल हो जाओ तो मुझे बताना। वह कहती हैं कि जब मैं हलाल हो गई तो आपको बताया कि मुआविया बिन अबू सुफ़यान और अबू जह्म ने मुझे शादी का संदेश दिया है। अतः, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः अबू जह्म तो कभी अपनी गर्दन से लाठी नीचे रखता ही नहीं और मुआविया एक निर्धन व्यक्ति है, उसके पास माल नहीं है। तुम उसामा बिन ज़ैद से शादी कर लो। लेकिन मैंने उन्हें पसंद नहीं किया तो आपने फिर फ़रमायाः उसामा बिन ज़ैद से शादी कर लो। सो, मैंने उनसे शादी कर ली और अल्लाह ने उनके अंदर भलाई रख दी और मैंने उनपर रश्क किया।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है।अबू अम्र बिन हफ़्स (रज़ियल्लाहु अंहु) ने अपनी पत्नी फ़ातिमा बिंत क़ैस (रज़ियल्लाहु अंहा) को तीन तलाक़ों में से अंतिम तलाक़ दे दिया। वैसे तो तीन तलाक़ प्राप्त स्त्री को उसके पति की ओर से 'नफ़क़ा' नहीं मिलता, लेकिन उन्होंने उनको कुछ जौ भेजे। फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अंहा) को लगा कि जब तक वह 'इद्दत' में हैं, उनके पति पर 'नफ़क़ा' वाजिब है, इसलिए उन्होंने इस जौ को नाकाफ़ी समझकर ठुकरा दिया। इसपर, अबू अम्र ने क़सम खाकर बताया कि उनके ऊपर कुछ देने की कोई ज़िम्मेवारी नहीं है। फ़ातिमा (रज़ियल्लाहु अंहा) ने इसकी शिकायत अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से की, तो आपने उन्हें बताया कि उनको न 'नफ़क़ा' मिलना है, न रहने के लिए मकान। तथा आपने उन्हें आदेश दिया कि उम्मे शरीक के घर में 'इद्दत' गुज़ारें। फिर, जब आपको बताया गया कि उम्मे शरीक के यहाँ सहाबा का आना-जाना लगा रहता है, तो उन्हें आदेश दिया कि अब्दुल्लाह बिन उम्मे मकतूम के यहाँ 'इद्दत' गुज़ारें। क्योंकि वह एक दृष्टिहीन व्यक्ति हैं। जब वह कपड़े उतारेंगी, तो वह उन्हें देख नहीं सकते। आपने उनको यह आदेश भी दिया कि जब 'इद्दत' समाप्त हो जाए, तो आपको बताएँ। जब वह 'इद्दत' गुज़ार चुकीं, तो मुआविया और अबू जह्म (रज़ियल्लाहु अंहुमा) ने उन्हें विवाह-संदेश भेजा। अतः, उन्होंने नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से प्रामार्श लिया। चूँकि सामने कोई भी हो, उसका भला चाहना ज़रूरी है, (विशेष रूप से उसका तो कुछ अधिक ही, जो प्रामर्श माँगे) अतः, नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उनको दोनों में से किसी से शादी करने का आदेश नहीं दिया; क्योंकि अबू जह्म के तेवर स्त्रियों के प्रति कड़े रहते थे और मुआविया एक निर्धन व्यक्ति थे। आपने उन्हें उसामा से निकाह करने का आदेश दिया, लेकिन वह चूँकि एक मुक्त किए हुए दास थे, इसलिए फ़ातिमा वह नहीं भाए। लेकिन नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेश का पालन करते हुए उनसे शादी कर ली और बाद में उनके ऊपर नाज़ किया तथा अल्लाह ने उनके अंदर बहुत-सी भलाई रखी।
अनस बिन मालिक (रज़ियल्लाहु अन्हु) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने सफ़िय्या (रज़ियल्लाहु अंहा) को गुलामी से मुक्त किया और उनकी मुक्ति को उनका महर बनाया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।बनू नज़ीर के सरदार हुयय की पुत्री सफ़ीया, किनाना बिन अबुल हुक़ैक़ के विवाह में थीं। वह ख़ैबर के दिन मारा गया और नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़ैबर को फ़त्ह करके स्त्रियों और बच्चों को क़ैद कर लिया, जिनमें सफ़ीया भी शामिल थीं। वह देहया ख़लीफ़ा कलबी के हिस्से में आईं, तो आपने देहया कलबी को उनके बदले एक दासी दी और उनका दिल रखने के लिए तथा उनपर दया करते हुए उन्हें अपने लिए चुन लिया। आपके सदव्यवहार का एक नमूना यह है कि आपने उन्हें दासी के तौर पर रखने की बजाय सम्मान दिया और मुक्त करके विवाह कर लिया तथा उनकी मुक्ति को ही उनका महर बनाया।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहु) का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने ख़ैबर वालों से फल तथा अनाज आदि वहाँ की पैदावारों के आधे भाग पर मामला तय किया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।ख़ैबर का इलाक़ा खेती-बाड़ी का इलाक़ा था और वहाँ कुछ यहूदी रहा करते थे। जब नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने हिजरत के सातवें साल उसे फ़त्ह किया, तो उसकी ज़मीनों को युद्ध में शामिल सहाबा के बीच बाँट दिया। लेकिन चूँकि सहाबा अल्लाह के मार्ग में जिहाद और उसकी ओर बुलाने के महत्वपूर्ण कार्य में व्यस्त थे और उनके पास खेती-बाड़ी के लिए समय नहीं था तथा ख़ैबर के यहूदी लंबे समय से खेती-बाड़ी से जुड़े होने के कारण, इस मामले में उनसे अधिक जानकारी रखते थे, इसलिए अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उन्हें आधी पैदावार के बदले बटाई पर दे दिया। वहाँ पैदा होने वाली फ़सलों और फलों का आधा भाग उनको, उनकी मेहनत के बदले मिलता और आधा भाग मुसमानों को मिलता था, क्योंकि वही ज़मीन के मालिक थे।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) कहते हैं कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जीवनकाल में एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया और उसके बच्चे को अपनी संतान मानने से इनकार कर दिया। अतः, अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के आदेश पर, दोनों ने क़ुरआन के बताए हुए तरीक़े के मुताबिक़ एक-दूसरे पर लानत की। फिर आपने बच्चे को औरत के हवाले कर दिया और दोनों को अलग-अलग कर दिया।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस में अब्दुल्लाह बिन उमर वर्णन करते हैं कि एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया और उसके बच्चे को अपना बच्चा मानने से इनकार कर दिया। लेकिन उसकी पत्नी ने उसके दावे का खंडन किया और उसे मानने से इनकार कर दिया। ऐसे में, दोनों ने 'लेआन' किया। अर्थात पहले पति ने चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दी कि वह अपनी पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाने के मामले में सच्चा है और पाँचवीं बार अपने ऊपर लानत की। फिर चार बार पत्नी ने अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दी कि उसका पति झूठा है और पाँचवीं बार अपने ऊपर अल्लाह के क्रोध की बददुआ की। जब उनके बीच 'लेआन' संपन्न हो गया, तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दोनों को सदा के लिए एक-दूसरे से अलग कर दिया और बच्चे को पति की बजाय पत्नी की ओर मंसूब करके उसी के हवाले कर दिया।
अब्दुल्लाह बिन उमर (रज़ियल्लाहु अंहुमा) से मरफूअन वर्णित है कि अमुक के बेटे अमुक ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! इस मामले में आपका क्या ख़याल है कि यदि हम में से कोई अपनी पत्नी को व्यभिचार करते हुए पाए तो वह क्या करे? यदि कुछ कहता है तो बहुत बड़ी बात कहता है और यदि ख़ामोश रहता है तो उसी तरह का जघन्य कृत्य देखते हुए भी ख़ामोश रहता है। वर्णनकर्ता कहते हैंः अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) चुप रहे और कोई उत्तर नहीं दिया। फिर जब वह उसके बाद आया तो कहने लगाः जो प्रश्न मैंने आपसे किया था, वह मेरे साथ हो चुका है। तो अल्लाह ने सूरा नूर की यह आयतें अवतरित कींः والذين يرمون أزواجهم...? "और जो लोग अपनी पत्नियों पर व्यभिचार का आरोप लगाते हैं..." तो आपने इन आयतों को पढ़कर सुनाया और नसीहत की तथा बताया कि दुनिया की सज़ा आख़िरत के अज़ाब से कहीं हलकी है। लेकिन उसने कहाः नहीं, उस ज़ात की क़सम, जिसने आपको सत्य के साथ भेजा है, मैंने उसके बारे झूठ नहीं बोला है। फिर आपने उस स्त्री को बुलाकर फ़रमाया कि दुनिया की सज़ा आखिरत की यातना से कहीं आसान है। लेकिन उसने भी कहाः नहीं, उस ज़ात की क़सम, जिसने आपको सत्य के साथ भेजा है, वह निश्चय ही झूठा है। अब आपने पुरुष से आरंभ किया। इसलिए उसने अल्लाह को साक्षी बनाकर चार बार कहा कि वह निश्चय ही सच्चा है और पाँचवी बार कहा कि यदि वह झूठा है तो उसपर अल्लाह की लानत (धिक्कार) हो। फिर उस स्त्री से भी क़सम खाने को कहा तो उसने भी चार बार अल्लाह को साक्षी बनाते हुए कहा कि वह (अर्थात उसका पति) झूठा है और पाँचवीं बार कहा कि यदि वह सच्चा है, तो उस (अर्थात स्वंय उस स्त्री) पर अल्लाह का ग़ज़ब (प्रकोप) हो। फिर आपने दोनों के बीच जुदाई करा दी और फ़रमायाः अल्लाह निश्चय ही जानता है कि तुम दोनों में से एक झूठा है तो क्या तुममें से कोई तौबा करना चाहता है? तथा एक रिवायत में हैः अब उसपर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं रहा। उस पुरुष ने कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मेरा धन? आपने फ़रमायाः तुम्हें (महर के रूप में दिया हुआ) तुम्हारा धन वापस नहीं मिलेगा। यदि तुमने उसके बारे में सच कहा है तो तुमने उस धन से उसकी शर्मगाह (गुप्तांग) को हलाल किया था और यदि झूठ कहा है तो वह तुमसे, उससे भी कहीं अधिक दूर है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इसलाम ने एक सामाजिक समस्या हल करने के लिए 'लेआन' का आदेश दिया है। दरअसल, जब पति अपनी पत्नी के साथ किसी को व्यभिचार में लिप्त देखे और उसके पास गवाह न हो, तो वह 'लेआन' का सहारा लेगा। लेकिन केवल संदेह के आधार पर इसकी अनुमति नहीं है। इसकी इजाज़त केवल उस स्थिति में दी गई है, जब वह अपनी आँख से देख ले। क्योंकि 'लेआन' के बारे में जो धमकी दी गई है, वह बहुत बड़ी है। यहाँ जिस व्यक्ति की घटना का उल्लेख है, उसे एक तरह से अपनी पत्नी पर संदेह था और उसे डर था कि कहीं वह कुकर्म में लिप्त न हो जाए। ऐसे में वह द्विधा में पड़ गया। यदि अपनी पत्नी पर आरोप लगाता है और प्रमाण प्रस्तुत नहीं कर पाता है, तो ख़ुद उसी पर हद जारी होगी और अगर ख़ामोश रहता है, तो यह भी बड़ी शर्म और आर की बात है। उन्होंने इन बातों को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के सामने रखा भी, लेकिन आपने उनका कोई जवाब नहीं दिया। इसके कई कारण थे। एक तो यह कि उन्होंने मामला सामने आने से पहले ही उसके बारे में पूछा था, जो आपको पसंद नहीं था। दूसरी बात यह है कि वह एक बुरी चीज़ के बारे में पूछने में जल्दी दिखा रहे थे और अंतिम बात यह कि इस मसले में आपपर कोई वह्य भी नहीं उतरी थी। लेकिन इसके बाद, पूछने वाले को जिस बात का डर था, उसे अपनी आँखों से देख लिया, तो अल्लाह ने उस दंपति के बारे में सूरा नूर की यह आयतें उतारींः "وَالَّذِينَ يَرْمُونَ أزواجهم" (सूरा नूरः 6) चुनांचे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसे यह आयतें पढ़कर सुनाईं और समझाया कि अगर उसने अपनी पत्नी पर झूठा आरोप लगाया है, तो दुनिया का अज़ाब (झूठा आरोप लगाने की हद) आख़िरत के अज़ाब से हल्का है। लेकिन उसने क़सम खाकर कहा कि उसने अपनी पत्नी पर व्यभिचार का जो आरोप लगाया है, वह झूठा नहीं है। फिर आपने इसी तरह उसकी पत्नी को समझाया और बताया कि दुनिया का अज़ाब (व्यभिचार की हद अर्थात संगसार) आख़िरत के अज़ाब से हल्का है। लेकिन उसने भी क़सम खाकर बताया कि उसका पति झूठा है। इसके बाद नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने उसी से आरंभ किया, जिससे अल्लाह ने आरंभ किया था। यानी पति से। चुनांचे उसने चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दी कि वह अपनी पत्नी पर आरोप लगाने के मामले में सच्चा है और पाँचवीं बार कहा कि यदि वह झूठा है, तो उसपर अल्लाह की लानत हो। फिर स्त्री से कहा और उसने भी चार बार अल्लाह की क़सम खाकर गवाही दी कि उसका पति झूठा है और पाँचवीं बार कहा कि यदि उसका पति अपने दावे में सच्चा है, तो उसपर अल्लाह का क्रोध हो। फिर आपने दोनों को सदा के लिए एक-दूसरे से अलग कर दिया। चूँकि दोनों में से एक निश्चित रुप से झूठा था, इसलिए नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने दोनों से तौबा करने को कहा। उसके बाद पति ने महर वापसी का मुतालबा किया, तो आपने फ़रमायाः तुझे महर नहीं मिलना है। तूने उसपर व्यभिचार को जो आरोप लगाया है, अगर वह सच्चा है, तो महर के बदले तूने उसकी शर्मगाह को हलाल रखा है। क्योंकि संभोग से महर साबित हो जाता है। और अगर तूने उसपर झूठा आरोप लगाया है, तो इतना संगीन आरोप लगाने के बाद तुम हरगिज़ उसके हक़दार नहीं रह जाते।
उम्मे सलमा- रज़ियल्लाहु अनहा- से मरफ़ूअन वर्णित हैः एक महिला अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आई और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! मेरी बेटी का पति मर गया है और उसकी आँख भी आई हुई है, तो क्या मैं उसकी आखों में सुरमा लगा दूँ? तो अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फरमायाः नहीं- दो या तीन बार कहने के बाद फ़रमायाः ऐसा ही चार मास दस दिन तक करना होगा। जाहिलिय्यत में तुम में से कुछ महिला अपने ऊपर साल पूरा होने के पश्चात मेंगनी फेंका करती थी। तो ज़ैनब ने कहाः जब किसी महिला का पति मृत्यु को प्राप्त हो जाता तो महिला छोटे से घर में बहुत ही खराब वस्त्र पहन कर रहती, न खुश्बू लगाती न कुछ और, यहाँ तक कि एक साल बीत जाता। फिर एक जानवर- गधा अथवा चिड़या अथवा बकरी- लाया जाता और उस से अपने जिस्म को रगड़ती, कम ही ऐसा होता कि जिस जीव से वह अपने शरीर को रगड़ती, वह जीवित रहता। फिर वह निकलती तो उसे मेंगनी दी जाती , जिसे अपने सिर पर डाल कर फेंकती, उसके पश्चात जो सुगंध लगाना चाहती, लगाती।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इसलाम ने लोगों और विशेष रूप से स्त्रियों के कंधों से जाहिलियत का बोझ उतारा है। जाहिलियत के ज़माने में लोग स्त्री जाति के साथ बुरा बर्ताव तथा उसपर अत्याचार करते थे। इसलाम ने ही उसके अधिकार की रक्षा की। चुनांचे इस हदीस में है कि एक स्त्री अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास यह बताने के लिए आई कि उसकी बेटी के पति का निधन हो गया है और वह उसका सोग मना रही है। सोग मनाने वाली स्त्री को सिंगार से बचना होता है, लेकिन उसकी आँखों में तकलीफ़ है। ऐसे में, क्या वह आँखों में सुरमा लगा सकती है? नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः नहीं! आपने ताकीद के तौर पर इस शब्द को कई बार दोहराया। फिर आपने चार महीना दस दिन की इस अवधि को, जो एक स्त्री अपने पति के सोग में गुज़ारती है, बहुत कम बताते हुए कहा कि क्या वह इस थोड़ी-सी अवधि में सब्र नहीं कर सकती, जिसमें कुछ आसानियाँ भी रखी गई हैं? जाहिलियत के ज़माने में तो स्त्रियों का हाल यह था कि सोग मनाने वाली स्त्री एक छोटे-से घर में प्रवेश कर जाती और सिंगार, ख़ुशबू, पानी तथा लोगों से लोगों से मेल-जोल से दूर रहती और एक साल तक इस हाल में रहने के कारण उसके शरीर पर गंदगियाँ जम जातीं। जब वह एक साल गुज़ार लेती, तो उसके हाथ में एक मेंगनी दी जाती, जिसे वह इस बात के संकेत के तौर फेंक देती कि उसने एक साल तक जिस परेशानी का सामना किया है, वह (उसके पति का अधिकार अदा करने की तुलना में) इस मेंगनी के बराबर भी नहीं है। इसलाम ने इस मशक़्क़त को नेमत और इस तंगी को आसानी में बदल दिया। इसके बावजूद भी क्या वह आँख में सुरमा लगाने से बच नहीं सकती? उसे इसकी अनुमति नहीं है। ताकि यह सोग मनाने वाली स्त्री के लिए सिंगार का चोर दरवाज़ा न साबित हो।