





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "जो लोग किसी सभा से अल्लाह का ज़िक्र किए बिना उठ जाते हैं, वे वैसे हैं जैसे मरे हुए गधे के पास से उठते हैं, और यह उनके लिए पछतावे का कारण बनेगा।"
इसे अबू दावूद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि जब कुछ लोग किसी जगह में बैठते हैं और अल्लाह का ज़िक्र किए बिना वहाँ से उठ खड़े होते हैं, तो वह उन लोगों की तरह होते हैं, जो किसी मरे हुए गंदे और बदबूदार गधे के शव के पास जमा हुए हों। कारण यह है कि वे बात में व्यस्त होकर अल्लाह के ज़िक्र से ग़ाफ़िल हो गए। ऐसी सभा क़यामत के दिन उनके लिए अफ़सोस, खेद और हानि का कारण सिद्ध होगी।
अबू ज़र- रज़ियल्लाहु अंहु- कहते हैं कि मैं अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के साथ मदीना के हर्रा (काले पत्थर वाली भूमि) में चल रहा था कि हमारे सामने उहुद पर्वत आ गया। आपने कहाः ऐ अबू ज़र! मैंने कहाः मैं उपस्थित हूँ, ऐ अल्लाह के रसूल! फ़रमायाः मुझे यह पसंद नहीं है कि मेरे पास इस उहुद पर्वत के बराबर सोना हो और तीन दिनों के बाद मेरे पास उसका एक दीनार भी शेष रह जाए, सिवाय उसके जिसे मैं क़र्ज़ अदा करने के लिए बचा रखूँ। बाक़ी पूरा का पूरा अल्लाह के बंदों के बीच इस तरह, इस तरह और इस तरह बाँट दूँ। यह कहते समय आपने दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर इशारा किया। फिर मुझसे कहाः आज अधिक धन-संपत्ति वाले क़यामत के दिन कम से कम सत्कर्म वाले होंगे, सिवाय उसके जिसने ऐसे, ऐसे और ऐसे ख़र्च किया। यह कहते समय भी आपने दाएँ, बाएँ और पीछे की ओर इशारा किया। हाँ, मगर ऐसे लोग बहुत कम होंगे। फिर मुझसे कहाः मेरे आने तक तुम यहीं रुके रहो। फिर रात के अंधेरे में चल दिए, यहाँ तक कि छिप गए। इसी बीच मैंने एक तेज़ आवाज़ सुनी और डर महसूस किया कि किसी ने अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) से छेड़छाड़ न की हो। मैंने आपके पास जाने का इरादा भी कर लिया, लेकिन आपकी यह बात याद आ गई कि मेरे आने तक यहीं रुके रहना, अतः, वहीं रुका रहा। आप आए तो मैंने कहा कि मैंने एक आवाज़ सुनी और डर महसूस किया तथा आगे की पूरी बात सुनाई तो पूछा: क्या तुमने सचमुच वह आवाज़ सुनी है? मैंने कहाः जी हाँ! तो फ़रमायाः दरअस्ल, मेरे पास जिबरील आए थे। उन्होंने कहाः आपकी उम्मत का जो व्यक्ति इस अवस्था में मर जाए कि किसी को अल्लाह का साझी न बनाता हो, वह जन्नत में जाएगा। मैंने कहाः चाहे वह व्यभिचार और चोरी में लिप्त हो? फ़रमायाः हाँ, चाहे वह व्यभिचार और चोरी में लिप्त हो।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।हदीस का अर्थ : अबूज़र -रज़ियल्लाहु अनहु- बता रहे हैं कि वह अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के साथ मदीने के हर्रा यानी काले पत्थरों वाली भूमि में चल रहे थे कि प्रख्यात उहुद पर्वत सामने आ गया। उसे देख अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया : मुझे इस बात से खुशी नहीं होगी कि मेरे पास इस उहुद पर्वत के बराबर सोना हो और तीन दिनों के बाद उसका कोई भी भाग, यहाँ तक कि एक दीनार भी मेरे पास शेष रह जाए, सिवाय उसके जिसे मैं क़र्ज़ अदा करने के लिए बचाकर रखूँ। यानी यदि मेरे पास उहुद पर्वत के बराबर भी शुद्ध सोना आ जाए, तो मैं उसे पूरा का पूरा अल्लाह के मार्ग में खर्च कर दूँगा और उसका केवल उतना भाग बचाकर रखूँगा, जिसकी ज़रूरत अधिकारों की अदायगी और क़र्ज़ चुकाने के लिए हो। मुझे इस बात से ख़ुशी नहीं होगी कि तीन दिन के बाद इससे अधिक एक दीनार भी मेरे पास शेष रहे। यह हदीस इस बात का प्रमाण है कि अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मानव समाज में दुनिया के मोह से सबसे अधिक विरक्त व्यक्ति थे। क्योंकि आपको उससे अधिक धन अपने पास बचाए रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, जितना क़र्ज़ की अदायगी के लिए पर्याप्त होता। जब आपकी मृत्यु हुई, तो आपका कवच थोड़े-से जौ के बदले में एक यहूदी के पास रखा हुआ था, जिसे आपने अपने परिवार के लिए लिया था। यदि सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह को दुनिया प्रिय होती, तो वह अपने नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को उससे वंचित न रखता। सच्चाई यह है कि दुनिया धिक्कारयोग्य है और उसकी सारी चीज़ें धिक्कारयोग्य हैं, सिवाय अल्लाह के ज़िक्र, उससे संबंधित चीज़ों, धर्म का ज्ञान रखने वाले और उसे अर्जन करने वाले और अल्लाह की इबादत के कार्यों के। फिर आपने फ़रमाया : "आज अधिक धन-संपत्ति वाले क़यामत के दिन कम से कम सत्कर्म वाले होंगे" क्योंकि आम तौर पर जिसके पास दुनिया में धन अधिक होता है, वह अभिमान का शिकार हो जाता है और अल्लाह की इबादत से विचलित हो जाता है। क्योंकि दुनिया उसे ग़फ़लत में डाल देती है और फलस्वरूप वह दुनिया में अधिक ध्यान देने लगता है और आख़िरत से ध्यान कम कर लेता है। "सिवाय उसके जिसने ऐसे, ऐसे और ऐसे धन खर्च किया" यानी सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह के मार्ग में धन खर्च किया। उसके बाद फ़रमाया : "मगर ऐसे लोग बहुत कम हैं।" यानी अल्लाह के मार्ग में धन खर्च करने वालों की संख्या बहुत कम है। फिर फ़रमाया : "जिस व्यक्ति की मृत्यु इस अवस्था में हुई कि उसने किसी को अल्लाह का साझी नहीं बनाया, वह जन्नत में प्रवेश करेगा। चाहे उसने व्यभिचार एवं चोरी ही क्यों न की हो।" इसका मतलब यह नहीं है कि व्यभिचार एवं चोरी छोटे गुनाह हैं, बल्कि दोनों तो बड़े गुनाह हैं ही। यही कारण है कि अबूज़र -रज़ियल्लाहु अनहु- ने इसपर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि उसने व्यभिचार एवं चोरी की हो, तब भी जन्नत में प्रवेश करेगा? तो आपने उत्तर दिया कि हाँ, व्यभिचार एवं चोरी की हो, तब भी। इसका कारण यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु ईमान की अवस्था में हुई और उसने बड़े गुनाह भी किए हों, तो अल्लाह कहता है : "निःसंदेह अल्लाह यह नहीं क्षमा करेगा कि उसका साझी बनाया जाए और उसके सिवा जिसे चाहे, क्षमा कर देगा।" अतः अल्लाह उसे क्षमा भी कर सकता है और सज़ा भी दे सकता है। लेकिन यदि सज़ा देता भी है, तब भी उसे अंत में जन्नत जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। क्योंकि अल्लाह का साझी न बनाने वाले और इनसान को काफ़िर घोषित करने वाला कोई कार्य न करने वाले हर बंदे को अंततः जन्नत जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा। लेकिन जिसने काफ़िर घोषित करने वाला कोई कार्य किया और उसी पर मर गया, उसे हमेशा जहन्नम में रहना पड़ेगा और उसके सारे सत्कर्म नष्ट हो जाएँगे। क्योंकि मुनाफ़िक़ लोग अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से कहा करते थे कि {हम गवाही देते हैं कि आप अल्लाह के रसूल हैं} और थोड़े ही सही लेकिन अल्लाह को याद भी करते थे। इसी तरह सुस्ती के साथ ही सही, लेकिन नमाज़ भी पढ़ते थे। लेकिन इसके बावजूद वे जहन्नम की सबसे निचली श्रेणी में होंगे। इस हदीस से मालूम हुआ कि इनसान को दुनिया के मोह में नहीं पड़ना चाहिए। दुनिया इनसान के दिल में नहीं बल्कि हाथ में होनी चाहिए। दिल से केवल सर्वशक्तिमान एवं महान अल्लाह की ओर मुतवज्जेह रहना चाहिए। यही दुनिया के मोह से मुक्ति का असल अर्थ है। इसका अर्थ हरगिज़ यह नहीं है कि तुम दुनिया का कोई भी भाग धारण न करो। बल्कि इसका अर्थ यह है कि उसकी हलाल चीज़ों को लो और उसमें से अपना हिस्सा लेना हरगिज़ न भूलो। लेकिन उसे अपने दिल में नहीं, बल्कि अपने हाथ में रखो। इस महत्वूर्ण बिंदु को ध्यान में रखना चाहिए।
तथा अबू मूसा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "उस व्यक्ति की मिसाल जो अपने रब को याद करता है और उसकी मिसाल जो अपने रब को याद नहीं करता, जीवित और मृत की सी है।" सही मुस्लिम के शब्द हैं : "उस घर की मिसाल जिसमें अल्लाह को याद किया जाता है और उस घर की मिसाल जिसमें अल्लाह को याद नहीं किया जाता, जीवित और मृत जैसी है।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने यहाँ अल्लाह का ज़िक्र करने वाले और न करने वाले का अंतर बयान फ़रमाया है। लाभ एवं सौंदर्य के मामले में दोनों के बीच में वही अंतर है, जो जीवित एवं मृत के बीच है। जो अपने रब को याद करता है, वह एक जीवित प्राणी की तरह है, जिसका बाहरी रूप जीवन से सुसज्जित और जिसका आंतरिक रूप ज्ञान के प्रकाश से सुसज्जित है, उसके अंदर लाभ प्रदान करने की क्षमता होती है। जबकि जो अल्लाह को याद नहीं करता, उसकी मिसाल एक मृत प्राणी की तरह है, जिसका बाहरी रूप जीवन से रहित है और जिसका आंतरिक रूप बेकार है, उसके अंदर लाभ देने की क्षमता नहीं होती। इसी तरह जब घर में रहने वाले लोग अल्लाह का ज़िक्र करते हैं, तो वह घर जीवित है और जब अल्लाह के ज़िक्र की अनदेखी करते हैं, तो वह घर मृत है। वैसे, यहाँ जीवित एवं मृत यद्यपि घर के लोगों को कहा गया है, लेकिन मुराद घर में रहने वाले लोग हैं।
तथा अबू सईद खुदरी रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं : एक दिन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मिंबर पर बैठे और हम भी आपके आस-पास बैठ गए। इस बीच आपने फ़रमाया : "मैं अपने बाद तुम्हारे बारे में जिन चीज़ों से डरता हूँ, उनमें से एक दुनिया की चमक-दमक और उसकी माया के दरवाज़ों का खुलना है।" यह सुन एक व्यक्ति ने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! क्या भलाई भी बुराई लाती है? यह सुन कर अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ख़ामोश हो गए। यह देख उनसे कहा गया : क्या बात है कि तुम अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- से बात कर रहे हो और वह तुमसे बात नहीं कर रहे हैं? इस बीच हमने देखा कि आपपर वह्य उतर रही है। फिर आपने पेशानी से पसीना पोंछा और उसके बाद फ़रमाया : "प्रश्न करने वाला कहाँ है?" एक तरह से आपने उसकी प्रशंसा की और उसके बाद फ़रमाया : "भलाई बुराई नहीं लाती। दरअसल जो घास मौसम-ए-बहार में पैदा होती है, वह जान ले लेती है या विनाश के निकट पहुँचा देती है। अलबत्ता, उस जानवर का नुक़सान नहीं होता, जो घास खाता है और जब उसकी दोनों कोख भर जाती है, तो सूरज की ओर मुँह करके जुगाली करना शुरू कर देता है, फिर लीद और पेशाब करता है और उसके बाद दोबारा खाता है। निस्संदेह यह धन हरा-भरा और मीठा है। एक मुसलमान के लिए वह धन बहुत अच्छा है, जो उसने निर्धन, यतीम और यात्री को दिया। (या फिर इसी तरह की कोई बात अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने कही।) लेकिन जिसने उसे अवैध रूप से लिया, वह उस व्यक्ति की तरह है, जो खाता तो है, लेकिन उसका पेट नहीं भरता। इस तरह का धन क़यामत के दिन इन्सान के विरुद्ध गवाही देगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैएक दिन अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- मिंबर पर बैठकर अपने साथियों से बात करने लगे। इसी दौरान आपने फ़रमाया : मेरे बाद तुम्हारे बारे में मुझे सबसे अधिक भय इस बात का है कि पृथ्वी की नेमतों, संसार के सुख-सुविधाओं, उसके वैभव और उसके विभिन्न उपकरणों, वस्त्रों और खेतों के द्वार तुम्हारे लिए खोल दिए जाएँ, जो हैं तो नश्वर, परन्तु जिनके आधार पर लोग एक-दूसरे पर अभिमान करते हैं। एक व्यक्ति ने कहा : सांसारिक सुख-सुविधाएँ भी तो अल्लाह का वरदान हैं। तो क्या यह नेमत अभिशाप और दण्ड में बदल जाएगी?! उसकी बात सुन कर अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ख़ामोश हो गए और लोगों को लगा कि आप नाराज़ हो गए हैं, अतः लोग उसे बुरा-भला कहने लगे। लेकिन कुछ ही क्षणों में स्पष्ट हो गया कि आपपर वह्य उतर रही थी। चुनांचे आप अपनी पेशानी से पसीना पोंछने लगे और फ़रमाया : प्रश्न करने वाला कहाँ है? प्रश्न करने वाले ने उत्तर दिया : मैं यहाँ हूँ। चुनाँचे आपने अल्लाह की प्रशंसा की और उसके बाद फ़रमाया : वास्तविक भलाई तो भलाई ही लाती है। लेकिन ये सुख-सुविधाएँ विशुद्ध रूप से भलाई नहीं हैं, क्योंकि यह फ़ितना एवं प्रतिस्पर्धा का कारण बनती हैं और आख़िरत पर पूर्ण रूप से ध्यान केंद्रित करने नहीं देतीं। फिर उसकी एक मिसाल बयान करते हुए फ़रमाया : बसंत ऋतु में उगने वाली हरियाली पशु को आकर्षित करती है और अतिभोजन से होने वाली बीमारी का शिकार बनाकर उसकी जान ले लेती है तथा उसे मृत्यु के करीब पहुँचा देती है। लेकिन ऐसा जानवर सुरक्षित रहता है, जो खाता है और जब उसकी दोनों कोख भर जाती हैं, तो अपना चेहरा सूरज की ओर कर लेता है, शौच या पेशाब करता है, फिर अपने पेट में मौजूद घास को अपने मुंह में लाता है, उसे चबाता है, फिर उसे निगल जाता है और फिर वापस खाने लगता है। निस्संदेह, यह धन उस हरी और स्वादिष्ट घास के समान है, जिसे अधिक खाने से मृत्यु हो जाती है या मृत्यु निकट आ जाती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति हलाल तरीके से प्राप्त धन के एक छोटे से हिस्से से, जो जीवन-यापन के लिए पर्याप्त हो, संतुष्ट हो जाता है, तो यह धन उसके लिए हानिकारक नहीं होता। एक मुसलमान का धन प्रशंसनीय है, जिसका कुछ हिस्सा वह गरीबों, यतीमों और मुसाफिरों को देता है। जो व्यक्ति उचित तरीक़े से धन अर्जित करता है, उसके लिए उसमें बरकत दी जाती है और जो अनुचित तरीक़े से धन अर्जित करता है, उसकी मिसाल उस व्यक्ति की तरह है, जो खा तो ले, मगर तृप्त न हो। यह धन क़यामत के दिन उसके विरुद्ध गवाही देगा।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- कहते हैं कि एक व्यक्ति अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के पास आया और कहाः ऐ अल्लाह के रसूल! लोगों के अंदर कौन मेरे अच्छे व्यवहार का सबसे अधिक हक़दार है? आपने कहाः तेरी माँ। उसने कहाः फिर कौन? फ़रमायाः तेरी माँ। उसने कहाः फिर कौन? फ़रमायाः तेरी माँ। उसने कहाः फिर कौन? फ़रमायाः तेरा बाप। (बुख़ारी एवं मुस्लिम) तथा एक रिवायत में हैः ऐ अल्लाह के रसूल! अच्छे व्यवहार का सबसे हक़दार कौन है? फ़रमायाः तेरी माँ, फिर तेरी माँ, फिर तेरी माँ, फिर तेरा बाप, फिर क्रमशः तेरा सबसे निकट का रिश्तेदार।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस से मालूम हुआ कि माता एवं पिता दोनों का अधिकार है कि बच्चे उनके साथ अच्छा व्यवहार करें और पूर्ण रूप से उनकी देखभाल करें। अल्लाह तआला का फ़रमान है : "तथा दुनिया में उनके साथ अच्छा व्यवहार करो।" लेकिन माता का अधिकार पिता की तुलना में कई गुना अधिक है। क्योंकि इस हदीस में अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने पिता के अधिकार का उल्लेख माता के अधिकार को अच्छी तरह उजागर करने के लिए उसका ज़िक्र तीन बार करने के बाद किया है। हालाँकि बच्चे के पालन-पोषण में माता एवं पिता दोनों की भूमिका होती है। पिता उसके लिए धन जुटाता है और उसकी देखभाल करता है तो माता उसे खिलाने, पिलाने, कपड़ा पहनाने और उसके लिए बिस्तर लगाने आदि कामों में स्वयं को व्यस्त रखती है। लेकिन इसके बावजूद माता का पद अधिक ऊँचा इसलिए है कि माता बच्चे के लिए जिस प्रकार का कष्ट उठाती है, पिता नहीं उठाता। वह नौ महीने तक कष्ट झेलते हुए उसे अपने पेट में रखती है, उसे जन्म देते समय इस क़दर कष्ट का समाना करती है कि उसे मौत सामने दिखाई देने लगती है, दो सालों तक उसे दूध पिलाती है, उसके आराम के लिए रातों की नींद क़ुरबान करती है और उसके हित के लिए जो कुछ किया जा सकता है, करती है, चाहे उसे जितनी भी परेशानियों का सामना करना पड़ा। इन्हीं बात का उल्लेख करते हुए अल्लाह तआला ने कहा है : "और हमने निर्देश दिया है मनुष्य को, अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का। उसे गर्भ में रखा है उसकी माँ ने दुःख झेलकर तथा जन्म दिया उसे दुःख झेलकर तथा उसके गर्भ में रखने तथा दूध छुड़ाने की अवधि तीस महीने रही।" आप देख सकते कि अल्लाह ने इस आयत में इनसान को अपने माता-पिता के साथ उपकार करने का निर्देश दिया है और इसके लिए कारण वही बताए हैं, जिनका सामना माता को करना पड़ता है, जो उसके अधिकार के महत्व को दर्शाता है। माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का एक पक्ष यह है कि यदि वे कंगाल हों तो उनके खाने-पीने, रहने-सहने और वस्त्र आदि के लिए धन खर्च किया जाए। बल्कि यदि वे निम्न अथवा मध्यम स्तर का जीवन व्यतीत कर रहे हों और तुम उच्च स्तर का जीवन गुज़ार रहे हो, तो उन्हें अपनी श्रेणी में ले आओ या अपने से भी उँची श्रेणी प्रदान करो, यह बात भी उनके साथ अच्छा व्यवहार करने में सम्मिलित है। याद कीजिए कि जब यूसुफ़ अलैहिस्सलाम को राज्य प्राप्त हो गया, तो अपने माता-पिता के साथ क्या किया? उन्हें देहात से लाने के बाद सिंहासन पर बिठाया। माता-पिता के साथ अच्छे व्यवहार का एक पक्ष, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह है, जिसका उल्लेख अल्लाह तआला ने अपने इस फ़रमान में किया है : "और (हे मनुष्य!) तेरे पालनहार ने आदेश दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो तथा माता-पिता के साथ उपकार करो, यदि तेरे पास दोनों में से एक वृद्धावस्था को पहुँच जाए अथवा दोनों, तो उन्हें उफ़ तक न कहो और न झिड़को और उनसे सादर बात बोलो। और उनके लिए विनम्रता का बाज़ू दया से झुका दो और प्रार्थना करो : हे मेरे पालनहार! उन दोनों पर दया कर, जैसे उन दोनों ने बाल्यावस्था में, मेरा लालन-पालन किया है।" अतः उनके साथ बदज़ुबानी न करो, उन्हें कोई कष्ट होने न दो, उनके साथ नर्मी से बात करो, उनके लिए अपना बाज़ू झुकाए रखो, उनके आज्ञापालन के सामने अपने अस्तित्व को कमतर जानो और दिल की गरहाई से उनके लिए दुआ करते रहो कि ऐ मेरे पालनहार, जिस तरह इन दोनों ने बचपन में लालन-पालन किया है, उसी तरह तू इन दोनों पर दया कर, और फिर हमेशा माता का ख़याल अधिक रखा करो कि आयत में इसी की ओर इशारा किया गया है और हदीस में भी तो स्पष्ट रूप से इसका उल्लेख कर दिया गया है।
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिसने अल्लाह के मार्ग में दो चीज़ें खर्च कीं, उसे जन्नत के द्वारों से पुकारा जाएगा कि ऐ अल्लाह के बंदे! यह बेहतर है। फिर तो नमाज़ियों को नमाज़ के द्वार से पुकारा जाएगा, जिहाद करने वालों को जिहाद के द्वार से आवाज़ दी जाएगी, रोज़ेदारों को रय्यान नामी द्वार से बुलाया जाएगा और सदक़ा करने वालों को सदक़ा के द्वार से अंदर आने को कहा जाएगा। अबू बक्र- रज़ियल्लाहु अन्हु- ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! आप पर मेरे माता-पिता क़ुरबान हों, जो व्यक्ति इन द्वारों से पुकारा जाएगा, उसे कोई ज़रूरत नहीं होगी, तो क्या कोई ऐसा भी होगा, जिसे इन सभी द्वारों से पुकारा जाएगा? फ़रमायाः हाँ, तथा मुझे उम्मीद है कि तुम उन लोगों में से होगे।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।जिसने अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति के उद्देश्य से किसी भी चीज़, जैसे खाने, पहनने, सवार होने की वस्तुओं अथवा नक़्दियों में से दो वस्तुएँ सदक़ा कीं, उसे फ़रिश्ते जन्नत के द्वारों से उनके आगमन का स्वागत करते हुए पुकार कर कहते हैं : तुम दुनिया से बहुत-से पुण्य के कार्य कर आए हो, जिनका आज तुम्हें बहुत ज़्यादा प्रतिफल दिया जाएगा। अधिक नमाज़ पढ़ने वालों को नमाज़ के द्वार से पुकारा जाएगा और वे उसी से अंदर प्रवेश करेंग, अधिक सदक़ा करने वालों को सदक़ा के द्वार से पुकारा जाएगा और वे उसी से अंदर प्रवेश करेंगे, अधिक रोज़ा रखने वालों का स्वागत फ़रिश्ते अर-रय्यान नामी द्वार के पास करेंगे और उन्हें उसी से अंदर जाने का आग्रह करेंगे। ज्ञात हो कि "الرَّيَّان" शब्द का अर्थ है वह चीज़ जो प्यास मिटाने का कार्य करे। चूँकि रोज़ादार पानी पीने से बचने के कारण प्यास झेलता है, विशेष रूप से लंबे गर्मी के दिनों में तो और अधिक, तो बदले में उन्हें जन्नत में दायमी सैराबी प्रदान की जाएगी, जिसमें वे "अल-रय्यान" नामी द्वार से प्रवेश करेंगे। जब अबू बक्र -रज़ियल्लाहु अनहु- ने यह हदीस सुनी, तो उन्होंने कहा : ऐ अल्लाह के रसूल! "मेरे माता-पिता आपपर क़ुरबान हों" जो व्यक्ति इन द्वारों से अंदर जाएगा, उसे न किसी कमी का सामना करना पड़ेगा और न कोई घाटा उठाना पड़ेगा। "भला कोई व्यक्ति ऐसा भी होगा, जिसे इन तमाम द्वारों से पुकारा जाएगा?" तो आपने फ़रमाया : "हाँ, ऐसे लोग भी होंगे और मैं आशा करता हूँ कि तुम उन लोगों में शामिल रहोगे।"
अबू हुरैरा- रज़ियल्लाहु अन्हु- से वर्णित है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जिसने स्वप्न में मुझे देखा, वह जागते हुए भी मुझे देखेगा या कहा कि मानो, उसने मुझे जागते में देखा, क्योंकि शैतान मेरा रूप धारण नहीं कर सकता।
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया है। - इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।उलेमा ने इस हदीस के कई अर्थ बयान किए हैं : पहला : इससे मुराद अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- के ज़माने के लोग हैं और मतलब यह है कि जिसने आपको स्वप्न में देखा और उसने अभी तक हिजरत नहीं की थी, उसे अल्लाह हिजरत और आपके पास उपस्थित होकर जागने की अवस्था में आपको देखने का सुयोग प्रदान करेगा। दूसरा : स्वप्न में जो नज़र आता है, वह सचमुच अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ही होते हैं। यानी आत्मा के जगत में। इनसान का इस प्रकार का स्वप्न सच्चा होता है। बस शर्त यह है कि उसने आपको उसी रंग-रूप के साथ देखा हो, जो हदीस की किताबों में बयान किए गए हैं। तीसरा : उसे उस स्वप्न का मूर्त रूप आख़िरत में जागने की अवस्था में नज़र आएगा, जब उसे आपकी निकटता एवं सिफ़ारिश आदि प्राप्त होगी। "या फिर कहा कि मानो, उसने मुझे जागते में देखा" यह मुस्लिम की रिवायत है, जिसमें इस बात में संदेह व्यक्त किया गया है कि आपने वह जागते हुए भी मुझे देखेगा कहा था या मानो उसने मुझे जागते में देखा कहा था। इसका अर्थ यह है कि जिसने अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को स्वप्न में आपकी असल शक्ल-सूरत में देखा, गोया उसने आपको जागते में देखा। इस प्रकार आपका यह वाक्य आपकी एक अन्य हदीस की तरह है, जो सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम में है : "जिसने मुझे स्वप्न में देखा, उसने मुझे ही देखा।" इसी तरह सहीह बुख़ारी एवं सहीह मुस्लिम की एक अन्य रिवायत में है : "जिसने मुझे स्वप्न में देखा, उसने सचमुच मुझे ही देखा।" आगे आपने कहा : "शैतान मेरा रूप धारण नहीं कर सकता।" जबकि एक रिवायत के शब्द हैं : "जिसने मुझे स्वप्न में देखा, उसने मुझे ही देखा। शैतान के वश में नहीं है कि वह मेरा रूप धारण कर सामने आए।" यानी शैतान के लिए अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की असल रूप धारण करना संभव नहीं है। वरना कभी-कभी शैतान आता है और कहता है कि वह अल्लाह का रसूल है। लेकिन उसकी शक्ल व सूरत अल्लाह के रसूल जैसी नहीं होती। अतः वह अल्लाह का रसूल नहीं होता। इसलिए जब इनसान स्वप्न में किसी व्यक्ति को देखे और उसके दिल में आए कि वह अल्लाह का नबी है, तो यह जानने का प्रयास करे कि उसके स्वप्न में आने वाले व्यक्ति की विशषताएँ अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- की विशेषताओं के अनुरूप हैं या नहीं? यदि अनुरूप हैं, तो उसने सचमुच अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को देखा है और अगर अनुरूप नहीं हैं, तो वह अल्लाह का रसूल नहीं हो सकता। दरअसल होता यह है कि शैतान सोए हुए व्यक्ति के दिल में यह भ्रम डालता है कि यह अल्लाह का रसूल है। हालाँकि वह रसूल होता नहीं है। इमाम अहमद ने मुसनद और इमाम तिरमिज़ी अश-शमाइल में यज़ीद अल-फ़ारसी से रिवायत किया है कि वह कहते हैं : मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को स्वप्न में देखा, तो अब्दुल्लाह बिन अब्बास -रज़ियल्लाहु अनहुमा- से कहा कि मैंने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को स्वप्न में देखा है, तो उन्होंने बताया कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- फ़रमाया करते थे : "शैतान मेरा रूप धारण नहीं कर सकता। अतः जिसने मुझे स्वप्न में देखा, उसने सचमुच मुझे ही देखा।" अतः तुमने जिस व्यक्ति को देखा है, क्या तुम उसका रंग-रूप बयान कर सकते हो? मैंने कहा कि अवश्य। फिर मैंने उसका हुलिया बयान किया, तो उन्होंने कहा : यदि तुमने अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को जागते में देखा होता, तब भी आपका हुलिया इससे अधिक बयान नहीं कर पाते। यानी उन्होंने सचमुच अल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- को देखा था।
नोमान बिन बशीर रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, वह कहते हैं कि अल्लाह के रसूल -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने फ़रमाया है : "क़यामत के दिन जहन्नमियों में से सबसे कम अज़ाब उस व्यक्ति को हो रहा होगा, जिसके पास आग की दो पट्टियाँ और आग ही के दो जूते होंगे, जिनके कारण उसका मस्तिष्क खौल रहा होगा। वह समझेगा कि उससे ज़्यादा सख़्त अज़ाब किसी को नहीं हो रहा है। हालाँकि उसे सबसे हल्का अज़ाब दिया जा रहा होगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी -सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम- ने बताया है कि क़यामत के दिन सबसे हल्के अज़ाब वाला व्यक्ति वह होगा, जिसके पैरों में आग के दो जूते होंगे और आग ही की दो पट्टियाँ होंगी , जिनकी गर्मी से उसका दिमाग़ पीतल की हांडी की तरह उबल रहा होगा। वह समझता होगा कि उससे सख़्त अज़ाब किसी को नहीं हो रहा होगा, हालाँकि उसे सबसे हल्का अज़ाब हो रहा होगा। ऐसा इसलिए होगा ताकि उसे शारीरिक और मानसिक दोनों तरह की तकलीफ़ हो।
अनस- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः मृतक के साथ तीन चीज़ें जाती हैं; उसके घर के लोग, उसका धन और उसका कर्म। फिर दो चीज़ें लौट आती हैं और एक साथ रह जाती है। उसके घर के लोग और धन वापस आ जाते हैं और उसका कर्म उसके साथ रह जाता है।
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया है।इस हदीस का अर्थ यह है कि जब इनसान मर जाता है, तो उसके साथ उसे विदा करने वाले जाते हैं। उसके घर वाले क़ब्र के पास तक उसके साथ जाते हैं, उसका धन यानी उसके दास भी उसके साथ जाते हैं और उसका कर्म भी उसके साथ जाता है। फिर उसके घर वाले और उसका धन दोनों वापस आ जाते हैं और उसका कर्म उसके साथ रह जाता है। अब अगर वह अच्छा है, तो सब कुछ अच्छा है और वह बुरा है, तो सब कुछ बुरा ही बुरा है।