





























Hadeeth Cards
Da'wa cards that highlight great meanings from the noble prophetic hadiths in a simple style and attractive display that helps the Muslim to have a deeper understanding of his religion in an easy way
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अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अन्हु का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "एक व्यक्ति लोगों को क़र्ज़ देता और अपने सेवकों से कहा करता कि जब किसी ऋण चुकाने में असमर्थ व्यक्ति के पास जाओ तो उसके क़र्ज़ की अनदेखी करो। हो सकता है कि अल्लाह हमारे गुनाहों की अनदेखी करे। तो जब वह मरने के बाद, अल्लाह से मिला तो अल्लाह ने उसे क्षमा कर दिया।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम एक व्यक्ति के बारे में बता रहे हैं, जो लोगों को क़र्ज़ देता था या सामान उधार बेचता था तथा अपने गुलाम से, जो लोगों के पास क़र्ज़ वसूलने जाया करता था, कहता था : जब तुम किसी क़र्ज़दार के पास जाओ और उसके पास क़र्ज़ अदा करने के लिए कुछ न हो, तो उसके कर्ज़ की अनदेखी करो। यानी या तो उसे कुछ समय दे दो या फिर बहुत ज़ोर देकर न माँगो या फिर उसके पास जो कुछ हो, उसे ले लो चाहे वह कितना भी कम हो। ऐसा वह इस उम्मीद में कहा करता था कि हो सकता है कि इसी के कारण उसे अल्लाह क्षमा कर दे। चुनांचे जब उस व्यक्ति की मृत्यु हुई तो अल्लाह ने उसे माफ़ कर दिया।
अनस- रज़ियल्लाहु अन्हु- का वर्णन है कि अल्लाह के नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमायाः जो ज्ञान हासिल करने के लिए निकला, वह वापस आने तक अल्लाह के मार्ग में है।
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया है।हदीस का अर्थ यह है कि जो व्यक्ति अपने घर या नगर से धार्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए निकला, वह वापस आने तक अल्लाह के मार्ग में जिहाद के लिए निकले हुए व्यक्ति के समान है। क्योंकि वह धर्म के पुनरोद्धार, शैतान को नाकाम करने और नफ़्स को थकाने के मामले में जिहाद करने वाले ही की तरह है।
अबू ज़र जुन्दुब बिन जुनादा तथा अबू अब्दुर रहमान मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहु अन्हुमा का वर्णन है कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है : “जहाँ कहीं भी रहो, अल्लाह से डरते रहो, बुरे कर्म के बाद अच्छे कर्म कर लिया करो, अच्छे कर्म बुरे कर्म को मिटा देंगे तथा लोगों के साथ उत्तम आचरण वाला व्यवहार करो।”
इसे तिर्मिज़ी ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम तीन बातों का आदेश दे रहे हैं : पहली बात : तक़वा धारण करना। तक़वा धारण करने का मतलब है, अनिवार्य कार्यों को करना और हराम चीज़ों से बचना। स्थान, समय और परिस्थिति चाहे जो भी हो। गुप्त तथा व्यक्त दोनों रूप से। सुख एवं दुख दोनों अवस्थाओं में। दूसरी बात : अगर कोई बुरा काम हो जाए, तो उसके बाद कोई अच्छा काम, जैसे नमाज़ पढ़ना, सदक़ा करना, उपकार करना, रिश्तेदारों के साथ अच्छा व्यवहार करना तथा तौबा करना आदि कर लो। यह चीज़ें बुरे काम को मिटा देंगी। तीसरी बात : लोगों के साथ अच्छे आचरण वाला व्यवहार करो। मसलन उनसे मुस्कुराकर मिलना, विनम्रता धारण करना, भला करना और बुरा करने से बचना आदि।
अबू बकरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : मैंने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को कहते हुए सुना है : "जब दो मुसलमान अपनी-अपनी तलवारें लेकर आपस में भिड़ जाएँ तो मरने वाला और मारने वाला दोनों जहन्नमी हैं।" मैंने सादर कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल! यह तो मारने वाला है, (जिसका जहन्नमी होना तो समझ में आता है) लेकिन मरने वाला क्यों जहन्नमी होगा? आपने फ़रमाया : "उसकी नीयत भी दूसरे साथी को मारने की थी।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जब दो मुसलमान अपनी-अपनी तलवारें लेकर लड़ जाते हैं और दोनों एक-दूसरे की हत्या करना चाहते हैं, तो हत्या करने वाला अपने साथी की हत्या करने की वजह से जहन्नम जाएगा। लेकिन आगे अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के द्वारा कही गई यह बात सहाबा को समझ में नहीं आई कि जिसकी हत्या हुई है, वह भी जहन्नम में जाएगा। भला ऐसा कैसे हो सकता है। चुनांचे इसका उत्तर देते हुए आपने बताया कि उसे भी जहन्नम में इसलिए जाना पड़ेगा कि वह भी सामने वाले की हत्या करना चाहता था। यह और बात है कि वह अपने इरादे में सफल नहीं हो सका और सामने वाला उससे तेज़ निकल गया।
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया है : "सभी कार्यों का आधार नीयतों पर है और इन्सान को उसकी नीयत के अनुरूप ही प्रतिफल मिलेगा। अतः, जिसकी हिजरत अल्लाह और उसके रसूल के लिए होगी, उसकी हिजरत अल्लाह और उसके रसूल के लिए होगी और जिसकी हिजरत दुनिया प्राप्त करने या किसी स्त्री से शादी रचाने के लिए होगी, उसकी हिजरत उसी काम के लिए होगी, जिसके लिए उसने हिजरत की होगी।" सहीह बुख़ारी की एक रिवायत के शब्द हैं : "सभी कार्यों का आधार नीयतों पर है और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी नीयत के अनुरूप ही प्रतिफल मिलेगा।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि सारे कर्मों का एतबार नीयत पर है। यह हुक्म इबादात तथा मामलात रूपी सभी आमाल के लिए आम है। जो व्यक्ति अपने अमल से किसी लाभ का इरादा रखेगा, उसे केवल वह लाभ प्राप्त होगा, सवाब नहीं। इसके विपरीत जो अपने अमल से अल्लाह की निकटता प्राप्त करने का इरादा करेगा, उसे अपने अमल का सवाब मिलेगा, चाहे वह अमल खाने और पीने जैसा एक साधारम अमल ही क्यों न हो। फिर अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने आमाल पर नीयत के प्रभाव को बयान करने के लिए एक उदाहरण दिया, जिसमें हम देखते हैं कि अमल का ज़ाहिरी रूप एक होने के बावजूद प्रतिफल अलग-अलग है। आपने बताया कि जिसने अपनी हिजरत तथा मातृभूमि छोड़ने के पीछे नीयत अल्लाह की प्रसन्नता की प्राप्ति रखी, उसकी हिजरत (देश त्याग) धार्मिक हिजरत है और उसे उसकी सही नीयत की वजह से सवाब मिलेगा। इसके विपरीत जिसने अपनी हिजरत से सांसारिक लाभ जैसे धन, पद, व्यवपार और शादी आदि का इरादा रखा, उसे केवल वही लाभ प्राप्त होगा, जिसे प्राप्त करने की उसने नीयत की थी। अच्छा प्रतिफल तथा नेकी उसके हिस्से में नहीं आएगी।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है : एक व्यक्ति ने अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से कहा कि मुझे वसीयत कीजिए, तो आपने फ़रमाया : "गुस्सा मत किया करो।" उसने कई बार अपनी बात दोहराई और आपने हर बार यही कहा कि "गुस्सा मत किया करो।"
इसे बुख़ारी ने रिवायत किया हैएक सहाबी ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से आग्रह किया कि उनको कोई ऐसी बात बताएँ, जो उनके लिए लाभकारी हो। अतः आपने उनसे कहा कि वह ग़ुस्सा न किया करें। यानी एक तो ग़ुस्सा दिलाने वाली चीज़ों से बचें और दूसरा जब ग़ुस्सा आ जाए, तो अपने ऊपर नियंत्रण रखें। ऐसा न हो कि क्रोध में आकर हत्या कर दें, मार दे या गाली-गलौज आदि कर दें। उस सहाबी ने अपनी बात कई बार दोहराई और आपने हर बार इससे अधिक कुछ नहीं कहा कि ग़ुस्सा न किया करो।
उमर बिन ख़त्ताब रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है, उन्होंने कहा कि उन्होंने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को यह कहते हुए सुना : "अगर तुम अल्लाह पर वैसा ही भरोसा करने लगो, जैसा भरोसा उसपर होना चाहिए, तो वह तुम्हें उसी तरह रोज़ी दे, जैसे चिड़ियों को रोज़ी देता है; वह सुबह को खाली पेट निकलती हैं और शाम को पेट भरकर लोटती हैं।"
इसे तिर्मिज़ी, इब्न-ए-माजह और अह़मद ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम हमें इस बात की प्रेरणा दे रहे हैं कि हम दुनिया और दीन से संबंधित तमाम कामों में लाभ प्राप्त करने और हानि से बचने के मामले में अल्लाह पर भरोसा करें। क्योंकि देने वाला और रोकने वाला तथा नुक़सान करने वाला और लाभ देने वाला केवल अल्लाह है। इसी तरह हमें अल्लाह पर सच्चे भरोसे के साथ-साथ ऐसे काम करने चाहिएँ, जिनसे लाभ प्राप्त हो और हानि से बचा जा सके। जब हम ऐसा करेंगे, तो अल्लाह हमें उसी तरह रोज़ी देगा, जैसे पक्षियों को रोज़ी देता है, जो सुबह भूखे पेट निकलते हैं और शाम को पेट भरकर वापस होते हैं। दरअसल पक्षियों का सुबह और शाम निकलना रोज़ी तलाश करने के लिए किया जाने वाला काम ही तो है। ऐसा नहीं होता कि वह अल्लाह पर भरोसा करके बैठ जाएँ या सुस्ती से काम लें और उनको रोज़ी मिल जाए।
अबू हुरैरा रज़ियल्लाहु अनहु का वर्णन है कि अल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने सर्वशक्तिमान एवं महान रब से रिवायत करते हुए कहते हैं : "एक बंदे ने एक गुनाह किया और उसके बाद कहा : ऐ अल्लाह, मुझे मेरे गुनाह क्षमा कर दे! तो बरकत वाले एवं महान अल्लाह ने कहा : मेरे बंदे ने एक गुनाह किया, फिर उसने जाना कि उसका रब गुनाह माफ़ करता है और गुनाह के कारण पकड़ता भी है। फिर उसने दोबारा गुनाह किया और कहा : ऐ मेरे रब, मुझे मेरे गुनाह माफ़ कर दे! तो बरकत वाले एवं महान अल्लाह ने कहा : मेरे बंदे ने गुनाह किया और जाना कि उसका रब गुनाह माफ़ करता है और उसके कारण पकड़ता भी है। मैंने अपने बंदे को माफ़ कर दिया। अब वह जो चाहे, करे।"
इसे बुख़ारी एवं मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम अपने रब से रिवायत करते हुए कहते हैं कि बंदा जब कोई गुनाह कर बैठता है और उसके बाद कहता है कि ऐ मेरे अल्लाह! मुझे क्षमा कर दे! तो अल्लाह कहता है : मेरे बंदे ने गुनाह किया और उसका विश्वास है कि उसका रब है, जो गुनाह माफ़ करता है या उसका दंड देता है। अतः मैंने उसे माफ़ कर दिया। फिर जब बंदा दोबारा गुनाह करता है और कहता है कि ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे, तो अल्लाह कहता है कि मेरे बंदे ने गुनाह किया और उसका विश्वास है कि उसका रब है, जो गुनाह माफ़ करता है या उसकी सज़ा देता है, अतः मैंने अपने बंदे को माफ़ कर दिया। जब बंदा फिर गुनाह करता है और कहता है कि ऐ मेरे रब! मुझे क्षमा कर दे, तो अल्लाह कहता है कि मेरे बंदे ने गुनाह किया और उसका विश्वास है कि उसका रब है, जो गुनाह माफ़ करता है या उसकी सज़ा देता है, अतः मैंने अपने बंदे को माफ़ कर दिया। अब वह जो चाहे करे, जब तक स्थिति यह हो कि हर बार गुनाह करने के बाद वह फ़ौरन गुनाह को छोड़ दे, शर्मिंदा हो और दोबारा गुनाह न करने का इरादा कर ले, लेकिन नफ़्स के बहकावे में आकर फिर गुनाह कर बैठे। जब तक यह स्थिति बनी रहे, यानी गुनाह करे और तौबा करे, तो मैं उसे माफ़ करता रहूँगा। क्योंकि तौबा पहले किए हुए गुनाहों को ख़त्म कर देती है।
अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन आस रज़ियल्लाहु अनहुमा का वर्णन है, उन्होंने कहा : अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया : "न्याय करने वाले सर्वशक्तिमान एवं महान दयावान् (अल्लाह) के दाएँ जानिब, और उसके दोनों हाथ दाएँ हैं, प्रकाश के मिंबरों पर होंगे, जो अपने निर्णय में, घर वालों के बीच और उन कामों में जो उन्हें सोंपे जाएँ, न्याय करते हैं।"
इसे मुस्लिम ने रिवायत किया हैअल्लाह के नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बता रहे हैं कि जो लोग अपने मातहत (अधीन) लोगों तथा घर वालों के बीच एवं अपने फ़ैसलों में न्याय और सत्य के साथ निर्णय करते हैं, व क़यामत के दिन बैठने के ऐसे ऊँचे स्थानों में बैठे होंगे, जो नूर (प्रकाश) से बने होंगे। ये स्थान उनको उनके सम्मान में दिए जाएँगे। ये ऊँचे स्थान दयावान् अल्लाह के दाएँ ओर होंगे। ज्ञात रहे कि अल्लाह के दोनों हाथ दाएँ हैं।